भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 219

शम्भूराजा ने तुरन्त कहा, "यह कोई पुण्य भी तो नहीं है। सत्ता और सम्पत्ति की पालकी के सामने ये सम्बन्धी विदूषक की तरह नाचेंगे, किन्तु यदि एक बार बुरा समय आ गया तो ये रिश्तेदार मुँह छिपाकर दूर भाग जाएँगे, येसूरानी। मैं एक बात तुम्हें स्पष्ट बताना चाहता हूँ। पिताजी ने इन सम्बन्धियों की भीड़ जानबूझकर दूर ही रखी थी। उन्होंने मिट्टी में से मुहरें चुनी थीं। इसीलिए स्वराज्यमन्दिर का यह कलश इतना चमक रहा है।" सहजता से बात करते करते चुटकियाँ बजाते हुए शम्भूराजा ने पूछा— "युवराज्ञी, क्या आपको मालूम है कि बड़े महाराज ने सह्याद्रि की घाटी-पहाड़ियों से घिरे इस रायगढ़ को राजधानी बनाने के लिए क्यों चुना?" प्रश्न सुनकर येसूबाई राजा की ओर देखती रहीं। तब राजा ने ही कहा, "मिर्जाराजा जयसिंह और दिलेरखान ने पुरन्दर पर आक्रमण किया था। उस समय पिताजी मुगलों के आक्रमण को कोई महत्त्व नहीं दे रहे थे। दिल्ली का दबाव बढ़ता गया। राजगढ़ के आसपास के साठ-सत्तर गाँवों को उन्होंने तहस-नहस कर दिया। भविष्य में प्रजा की कभी ऐसी हालत न हो, इसलिए अपनी राजधानी मैदानी इलाके से दूर बनाने का निश्चय किया। रायगढ़ के चारों ओर बस्ती बहुत कम है और ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा किला अपनी प्राकृतिक सुरक्षा में सिर ऊँचा किये खड़ा है। रायगढ़ पहुँचने के लिए बस एक छोटी-सी राह। रायगढ़ की चोटी पर केवल तूफानी हवाएँ और बरसाती पानी की धाराएँ ही पहुँच पाती हैं।" शम्भूराजा रुके। फिर विषमण्डता से हँसते हुए बोले, "रायगढ़ को राजधानी बनाने का एक और भी महत्त्वपूर्ण कारण है। यहाँ की प्रकृति भरोसेमन्द है। स्वराज्य के पीछे खड़े रहने वाले कुनबी, कोली, भंडारी जैसी सामान्य जातियों के लोग बहुत ईमानदार हैं। इसके विपरीत घाट पर रहने वाले अपने भाई बन्धुओं और नाते रिश्तेदारों में आपसी झगड़े और द्वेषभाव बने रहते हैं। वहाँ के विद्रोही, अलगाववादी, स्वार्थी और अभिमानीवृत्ति के मराठों से दूर रहने के लिए रायगढ़ सर्वोत्तम स्थान है। शम्भूराजा की बात पर येसूबाई को हँसी आ गयी। उन्होंने कहा, "महाराज! दरबार मे यहाँ आने के पहले आपने बालाजी पन्त चिटणीस, अण्णाजी दत्तो, हिरोजी फर्जन्द जैसे जिन जिन लोगों ने अपराध किये थे उन्हें बड़ी दिलेरी से क्षमा कर दिया, यह अच्छा ही हुआ। इसमें हरजीराजा ने कोई गुनाह नहीं किया उनकी स्लेट अभी कोरी है।" "इतना भरोसा है आपको महाडिक पर?" "हाँ, क्यों नहीं? वे बुद्धि से कुशाग्र हैं, उनमें कुछ कर दिखाने का आत्मविश्वास है।" शम्भूराजा खुलकर हँसे और कहने लगे—"चलो ठीक है सम्भाजी 217