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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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हरजीराजा तकदीर का धनी है।'' वह कैसे?'' येसूबाई ने उत्सुकता से पूछा। कल ही जासूसों के पत्र मिले। आपने सुना होगा कि बंगलूर की चौकी सही अर्थों में हमारे दादा शहाजीराज भोसले ने कायम की थी। उसे विराटनगरी का रूप दिया हमारे पिताजी ने और एकोजी राजा ने दक्षिण में मराठी शासन को सुदृढ़ बनाया। परन्तु हमारे उसी दक्षिणी उपजाऊ प्रान्त के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।'' किससे?'' मैसूर के चिक्कदेवराजा से। युवराज्ञी कर्नाटक की ओर तंजौर मदुरई से मैसूर और बंगलूर तक जगह जगह हमारी जागीरदारियाँ हैं। किन्तु उसी क्षेत्र में चिक्कदेवराज नीचे त्रिचनापल्ली की ओर से घुस आया है। समय रहते उस पर अंकुश लगाना आवश्यक है। ऐसे समय में अपनी तेज बुद्धि और तेज तलवार का उपयोग करके दक्षिण का क्षेत्र सँभालने वाले एक समर्थ पुरुष की आवश्यकता थी।'' इसीलिए अपने बहनोई साहब को .'' नहीं येसूरानी, बहनोई के नाते नहीं, एक सुयोग्य, कर्तव्यपरायण और साहसी मराठा सूबेदार के नाते हम हरजी राजा को कर्नाटक की ओर भेजने का मन बना रहे हैं।'' शम्भूराजा बिछौने पर विचारमग्न अवस्था में पड़े थे। इसी बीच येसूबाई के सुबह निकले सहज उद्गारों का स्मरण हो आया। 'महाराज गुनाह किससे नहीं होता? गलतियाँ कौन नहीं करता?' उन शब्दों का स्मरण करते हुए शम्भूमहाराज ने दुखी मन से कहा, रानी साहिबा आपके वे शब्द मेरे कलेजे में बाणों की तरह गहराई से घुस गये हैं। यदि आपने वैसा न कहा होता तो अच्छा था।'' क्षमा करें महाराज! किसी भी रूप में मेरा आशय आप पर आक्षेप करना नहीं था।'' येसूबाई शान्तिपूर्वक बोली, महाराज, शिवाजी महाराज जैसे महान पिता को छोड़कर दिलेरखान के पास जाना, भले थोड़े दिनों के लिए क्यों नहीं, आपका अपराध ही था।'' नहीं येसू, वह अपराध नहीं था। वह यौवन का नशा था, एक प्रकार की बेहोशी थी। उस दिलेरखान के पास जाकर मिलने का नाटक करना, उसे बेवकूफ बनाकर शत्रु के पेट में घुसना, फिर उसका पेट फाड़कर बाहर निकलना, कर्तृत्व का नया कीर्तिमान स्थापित करना, दूसरे प्रदेश से संचित धन प्राप्त करके सुयश चन्द्रज्योत्स्ना से पिताजी की आँखों को चकाचौंध कर देना ही उस बेहोशी के पीछे 218 : सम्भाजी