छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण देखकर माँ पुतलीबाई आश्चर्य से हतवाक हो गयीं। बड़े महाराज के साथ पूजा के लिए सोयराबाई बाहर निकलने वाली थीं। गले में रत्नहार, सोने की करधनी पहनकर, जरीदार शाल ओढ़े वे पूरी तरह तैयार खड़ी थीं। पर बाहर के इस अप्रत्याशित प्रकरण को देखकर वे भी आश्चर्य से ठगी-सी रह गयीं। वे प्रयत्न कर रही थीं कि उनके चेहरे पर उभरने वाले भावों को कोई समझ न पाये। कुछ दिन पहले अण्णाजी दत्तो की पुत्री हंसा और शम्भूराजा के सम्बन्ध में कुछ ऐसी ही अफवाहें फैली थीं। शम्भूराजा के साथ ऐसा क्यों होता है? त्योहार के मांगलिक अवसर पर ऐसी बदनामी का प्रसंग क्यों आता है। यह सोचकर महाराज को दुःख हो रहा था। औरंगजेब के साथ अन्य शत्रुओं के सामने सदैव उन्नत रहने वाला उनका सिर आज शर्म से झुका हुआ था। किन्तु उनके भीतर एक समझदार राजा बैठा था। उन्होंने भावना की बाढ़ को भीतर-ही भीतर नियन्त्रित कर लिया महाराज के मन में शम्भूराजा के लिए ममता का प्रवाह सूखने लगा था। कर्तव्य पालन वाला राजदंड महाराज ने अपने हाथ में कसकर पकड़ रखा था। वे शान्त भाव और धीमी आवाज में केवल इतना ही बोले, "देखा त्र्यम्बकराव। बाहर पालकी का उत्सव समाप्त होने दीजिए। तब तक तुम यहीं पर निश्चिन्त होकर बैठे रहो। गुनहगार चाहे जितना भी महान हो, उसकी पूछताछ ठीक ठीक करवाई जाएगी। तुमको न्याय अवश्य मिलेगा।" बाहर निकलते हुए महाराज के कदम डगमगाये। उन्होंने काजी मुल्ला साहब को अपने पास बुलाया। उनकी सफेद लम्बी दाढ़ी पर महाराज को अत्यधिक विश्वास था। राज्य के एक नेक न्यायदाता के रूप में मुल्ला साहब मुसलमानों से भी अधिक मराठी प्रजा में लोकप्रिय थे। महाराज ने उन्हें कुछ सूचनाएँ दीं। मुल्ला साहब ने महाराज को बड़े आदर से कोर्निस की और अगली कार्यवाही के लिए तुरन्त बाहर निकल गये। राजदरबार से बाहर निकलते हुए पुतलीबाई ने शम्भूराजा के महल पर एक नजर डाली, उनकी आँखों से गर्म आँसू ढल पड़े। रायगढ़ की यह रंगपंचमी बदरंग हो गयी थी। आज की शोभायात्रा में हाथियों के 20 :: सम्भाजी