छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहौद, पालकी, ढोल-तेजिम की आवाज आदि की ओर लोगों का ध्यान अधिक नहीं गया। उत्सव के दर्शक और रिश्तेदार तरह-तरह की बातें कर रहे थे। आपस में बड़बड़ा रहे थे। "कैसा है यह युवराज का साहस! देखा दूसरे की स्त्री को घोड़े पर बिठाया और खींच लाये अपने राजमहल में और वह भी दिन दहाड़े।" रंगपंचमी का उत्सव किसी प्रकार समाप्त हो गया। सूर्य पश्चिम दिशा में ढल गया। शिवाजी महाराज बैठे थे। उनकी मुखमुद्रा अत्यन्त तनावपूर्ण थी। ऐसा लगता था वे किसी बड़े बोझ के दबाव से बेचैन हो रहे हैं। "शम्भूराजा को तुरन्त उपस्थित होना है।" ऐसे सन्देश नहीं बल्कि सख्त आदेश उन्होंने भेजा था। बैठक के सामने नीचे की गद्दी पर त्र्यम्बकराव और निवासराव अल्लाह की गाय की तरह असहाय की तरह उदाम बैठे थे। वे अब भी इसी अभियोग की मुद्रा में थे कि उनके साथ बड़ा अन्याय हुआ था। इसी समय बाहर किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। अपने गले में पड़ी पाँच लड़ की माला के साथ खेलते हुए धीमी गति से किन्तु बड़े आत्मविश्वास के साथ शम्भूराजा वहाँ पर आ पहुँचे। एक दम गोरा रंग हल्की लाल मुद्रा, उन्नत भाल, कमानीदार भौंहें, काली-काली गहरी और बोलती हुई आँखें। राजकुमारों के बीच सभी से अलग दिखाई देनेवाला शम्भूराजा का व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षक था। उन्होंने महाराज की नजर से नजर मिलायी। किन्तु बड़े महाराज की आँखों में उमड़ते दुख के सागर को देखकर युवराज की आँखें नीचे झुक गयीं। पिता-पुत्र की उपस्थिति में उनकी शोभा से पूरा महल दमक रहा था। दोनों को ही विधाता ने अपार सौन्दर्य का उपहार दिया था। दोनों को एकत्र देखकर ऐसा लगता था मानो सूर्य से मिलने के लिए चाँद आकर खड़ा हो। बैठक में तनाव बहुत बढ़ गया था। युवराज पर लगाये इस आरोप से उनके यार दोस्त भी हैरान थे। उनका बचपन का दोस्त रायप्पा महार और जोत्याजी केसकर महल के बाहर दुखी मन से मुँह लटकाए खड़े थे। युवराज के पीछे पीछे उनकी पत्नी येसूबाई भीतर आयीं। उनके अचानक वहाँ आने से बड़े महाराज आश्चर्यचकित हो गये। महाराज ने देखा कि येसूबाई के पीछे साफ सुथरे कपड़ों में एक अपरिचित नवयुवती खड़ी थी। उस नवयुवती की ओर वाड़कर पिता पुत्र की भी नजरें गयीं। महाराज ने अनुमान लगाया कि शम्भूराजा के अन्याय की शिकार यही अपरिचित युवती होगी। किन्तु येसुबाई जैसी समझदार पुत्रवधू की वहाँ उपस्थिति से महाराज की हैरानी बढ़ गयी थी। उन्होंने कहा- "ध्यान से सुनो, बहूरानी ! शम्भूराजा के अपराध और उनकी बढ़ती जा रही सम्भाजी :: 21