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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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हरकतों को पिता के रूप में एक बार नजरअन्दाज कर दूँ तो भी राजा को अपना राज दंड ममता के गहरे पानी में फेंक देना सम्भव नहीं।" गम्भीर मन्त्रघोष की तरह महाराज की आवाज गूँजने लगी। येसूबाई एक भी शब्द बोल नहीं सकी। युवराज संभाजी के चेहरे पर अपमान का भाव झलकने लगा। असाधारण तनाव के कारण उनकी गर्दन नीचे झुक गयी। इस स्थिति के कारण ऐसा लगा कि त्र्यम्बकराव और निवासराव का साहस कुछ बढ़ गया है। पिता-पुत्र साहस के साथ खड़े हो गये। त्र्यम्बकराव ने अपना उत्तरीय झटक दिया। वह पीपल के पत्ते की तरह काँप रहा था। उसने कहा, "महाराज मुझे अपनी पुत्रवधू चाहिए।" "महाराज मुझ गरीब की पत्नी मुझे वापस दे दो न।" निवासराव ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। महाराज ने एक तीखी नजर संभाजी राजा की ओर घुमायी—"दुर्भाग्य केवल दुर्भाग्य। आज इस स्वराज में किसी भी स्त्री की इज्जत सुरक्षित नहीं है। हमारी प्रजा यदि खुलकर ऐसा बोलने लगी तो हम किसका मुँह देखेंगे।" महल में पूरी स्तब्धता छा गयी। महाराज की कठोर वाणी से युवराज और युवराज्ञी की वाणी कुंठित हो गयी। वाड़कर पिता पुत्र के झूठ को बढ़ावा मिला किन्तु गोदू की साँस अटक गयी। इससे आगे उससे चुप न रहा गया। वह सीधे आकर महाराज के पैरों पर गिर पड़ी और व्याकुल होकर कहने लगी— "महाराज, मैं माँ भवानी की कसम खाकर कहती हूँ कि ये दोनों स्वराज्य के दुश्मन और धोखेबाज हैं। आज रंगपंचमी की भीड़ का लाभ उठाकर रायगढ़ किले पर ही महाराज की हत्या का षड्यन्त्र इन दुष्टों ने रचा था।" हमारे ऊपर शस्त्र उठाना ! वह भी यहाँ रायगढ़ में, यहाँ आकर हमारे ऊपर ? उस गम्भीर परिस्थिति में भी महाराज अपनी हँसी नहीं रोक सके। राजा के नौकर और पहरेदार भी हँस पड़े। त्र्यम्बकराव का साहस इससे और बढ़ गया। वह हाथ जोड़कर दीनता से बोला, "देखा न महाराज, आपके युवराज ने इस गरीब की पुत्रवधू पर कैसा जादू डाला है। महाराज ! युवराज तो रंग उठाते हैं किन्तु इस गरीब की इज्जत तो धूल में मिल गयी।" महाराज ऊपर से थोड़ा ही विचलित दिखायी पड़ रहे थे किन्तु भीतर से उनका धैर्य छूट चुका था। महाराज को शम्भुराजा के पराक्रम के सम्बन्ध में तनिक भी सन्देह नहीं था किन्तु उनके चरित्र में आजकल उनका विश्वास डगमगा गया था। अष्टप्रधान ने, नौकरों ने, सरदारों ने महाराज को अनेक बार यह संकेत दिया था कि किसी सुन्दर स्त्री पर निगाह पड़ जाने पर युवराज किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। 22 . सम्भाजी