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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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इन्हीं सूचनाओं के कारण महाराज बहुत खिन्न थे। इसी बीच दरवाजे के बाहर कुछ गड़बड़ी की आहट मिली। अपना जरी के किनारे वाला उत्तरीय सँभालते हुए, ऊँचे कद, मजबूत हड्डियों वाले अण्णाजी अचानक अन्दर आये। उनकी घनी मूँछें, बोलती आँखें, कानों के हिलते कुंडल, तेजस्वी साँवला रंग आदि अहंकारी व्यक्तित्व का प्रमाण दे रहे थे। पैंसठ वर्ष के अण्णाजी ने महाराज के साथ अनेक ग्रीष्म और वर्षा ऋतुएँ देखी थीं। पन्त कुछ रुके। आगे का शब्द बोलने से पहले अण्णाजी दत्तो ने संभाजी राजा को गौर से देखा। युवराज ने भी क्रुद्ध होकर उनकी आँख से आँख मिलायी। युवराज की चमकती पुतलियाँ पन्त को बरछी के नोक जैसी धारदार और चमकदार दिखायी पड़ीं। ये दोनों एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे। अण्णाजी पन्त ने अपने माथे का पसीना उत्तरीय से पोंछ दिया। अपनी बात सँवारते हुए वे बोले, "महाराज यह बेचारी गोदू मेरी पत्नी की बहन की बेटी है। ये त्र्यम्बक मेरे करीबी रिश्तेदार हैं, महाराज!'' कहते कहते अण्णाजी की नजर गोदू के निश्छल निष्पाप चेहरे पर पड़ी और उनका मन फूट फूट कर रोने लगा। उनकी इकलौती बेटी हंसा की छवि उनकी कल्पना में नाचने लगी। हंसा वस्तुतः एक जीती-जागती जीवन-लीला थी। पंछियों की तरह क्रीड़ाशील, मोर की तरह नाचने वाली, तितली की तरह पन्त के इर्द-गिर्द घूमने वाली हंसा और उसकी स्मृतियाँ अण्णाजी का पीछा छोड़ने को तैयार न थीं। रायगढ़ के परिसर में होने वाली बारिश और वर्षा के पानी से पग पग पर बहने वाले झरने और इन्हीं पवित्र झरनों की तरह हंसा यौवन के उत्सव में सदैव नाचती रहती थी। अण्णाजी पन्त ने हंसा की शादी कुछ जल्दीबाजी में रचा दी थी। वह अपनी ससुराल पेण से पहली बार मायके आयी थी। एक दिन मंगला गौर के बहाने हंसा राजमहल में गयी। वहाँ से दुखी नहीं घायल होकर वापस लौटी। दो तीन दिन के बाद पाचाड़ के एक भरे हुए कुएँ में लोगों ने उसका तैरता हुआ शव देखा। उसके इस तरह अचानक जाने से सारा परिसर व्यथित हो गया। इस घटना के सम्बन्ध में जितने लोग उतनी बातें कर रहे थे। कोई कहता था कि हंसा पर बलात्कार हुआ। कोई कहता था कि उसके मन पर कोई गहरा आघात हुआ जिसके कारण उसने स्वयं ही मृत्यु को गले लगा लिया। किन्तु अण्णाजी पन्त तो अभी भी अपनी लाड़ली बेटी की याद में पागल हो जाते थे। पन्त के आगमन से वातावरण और भी गम्भीर हो गया न्यायाधीश प्रह्लाद निगजी घबरा गये। त्र्यम्बकराव ने अपनी पगड़ी उतारकर शिवाजी महाराज के पैरों पर रख दी। वह दुखी स्वर में चिल्लाया—"महाराज! गरीब की बहू को वापस उसे करो।" सम्भाजी :. 23