छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोले-बारूद के लिए अंग्रेजों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। गत बीतती रही और विचार विमर्श होता रहा। सोने के लिए बहुत देर हो गयी थी, फिर भी शम्भूमहाराज बहुत सवेरे जाग गये। उन्होंने अपने शयनकक्ष से दूर तक निगाह दौड़ाई। उन्होंने जैसे ही हल्के से खिड़की खोली वैसे ही ठंडी हवा का एक झोंका अन्दर आया। पूरा किला अँधेरे और कुहरे से भर गया था। शम्भूमहाराज सवेरे-सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर बाहर निकले। कार्यों की व्यस्तता में सवेरे बाहर निकलकर टहलने का अवसर बहुत कम मिलता था। शम्भुराजा पालकी दरवाजे की सीढ़ियाँ उतरकर बाहर निकले। उनके पीछे पीछे बारह पन्द्रह हाथ की दूरी पर शस्त्रधारी सेवक चल रहे थे। अब अँधेरा कम होने लगा था। सावन का महीना अभी-अभी बीता था। किले पर चारों ओर हरियाली छायी हुई थी। पूरा रायगढ़ लाल और सफेद फूलों से भर गया था। समुद्र के पीछे, आँखों के सामने कोंकण के द्वीपों से किले का ऊपरी हिस्सा चमक रहा था। शम्भुराजा के सामने गंगासागर फैला था। उसका पानी शंख की तरह शुभ्र दिख रहा था। नाम के अनुसार न वह गंगा थी और न ही सागर। वह सचमुच कमल पुष्पों से सजा एक सुन्दर जलाशय था। उस जलाशय की सतह को देखते ही शम्भुराजा का मन भयभीत हो गया। वे आगे न जाकर पालकी दरवाजे की सीढ़ियाँ चढ़कर किले के भीतर आ गये। वहाँ रत्नमहल के समीप से बनी पगडंडी से होते हुए एक मनोर के पास पहुँच गये। गंगासागर के समीप होने से रायगढ़ की शोभा और भी बढ़ गयी थी। किले बारह कोणी और पाँच मंजिली मनोर किले की अद्भुत शोभा हो रही थी। संभाजी राजा मनोर की तीसरी मंजिल पर चढ़कर आये। पतला सा पर्दा हटाकर, गुंबज वाले छत के नीचे खड़े होकर वे बाहर का दृश्य देखने लगे। इस समय तक कुहरा पूरी तरह साफ हो चुका था। सावन के बाद की चारों ओर फैली हरियाली पर सूर्य की कोमल किरणें छोटे बच्चों की तरह दौड़ लगा रही थीं। प्रकृति के उस रमणीय सौन्दर्य से संभाजी राजा का कवि मन भी सचेत होने लगा। किन्तु उनकी बावरी दृष्टि जलाशय पर जाकर रुक गयी। उस काले नीले पानी में दुर्गाबाई और राणू दीदी की आँखें दिखाई देने लगीं। वे बहुत भावुक होने लगे। उन्होंने बलपूर्वक अपनी दृष्टि वहाँ से हटा ली। किले के नीचे पश्चिम की ओर फैले समुद्र की ओर देखने लगे। वहाँ दिखाई दिया कोंकण का तथा और पानी से उठने वाला धुआँ। ऐसा लगता था मानो धुएँ के ढेर एक दूसरे पर गिर रहे थे, और दिख रहा था मगरमच्छ की पीठ की तरह दिखने वाला जंजीरे का कगार। शम्भुराजा की आत्मा को मानो डंक लग गया। राजकार्य को सँभाले अभी केवल तीन महीने ही बीते थे। अभी तक जंजीरे के निवासियों की ओर से जंजीरे के सम्भाजी :: 221