छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन्दिर के पास लाखों यात्री एकत्र होते हैं, उसी उत्साह के साथ रायगढ़ पर सप्त महल से होली के मैदान तक, राजाबाजार जगदीश्वर मन्दिर से काले हौद तक लाखों लोगों की भीड़ एकत्र थी। जगह-जगह पर सेना की टुकड़ियाँ तैनात की गयी थीं। गंगासागर के पास की द्वादशकोणी मनोर और किले के बुर्जी को रंगीन पताकों से सजाया गया था। शम्भूमहाराज सभा मंडप की ओर जाने लगे। उसी समय प्रवेश द्वार के पास पन्द्रह बीस मुसलमानों का जत्था खड़ा दिखाई पड़ा। वे सभी लम्बे, कटी नुकीली दाढ़ी वाले और मैले कपड़ों में थे। शम्भूराजा समीप आने लगे उसी समय सोमाजी दत्तो और जोत्याजी आदि चिल्लाए- "पीछे हटो, महाराज को आगे जाना है।" मुहूर्त के लिए विलम्ब न हो जाय, इसलिए शम्भूराजा जल्दी में थे। शनिस्तोत्र के शब्द उनके कानों में पड़े- नीलांजनं समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम् । छाया मार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।। शम्भूराजा ठिठक गये। भयभीत स्वर में शनि का स्मरण कौन कर रहा है? कौन है इतने संकट में? उन्होंने शनि का स्तोत्र बोलने वाले उस गरीब मुसलमान लड़के की ओर देखा। महाराज वहाँ एकत्र लोगों के पास चले गये। अन्य लोग बगल हट गये। महाराज ने पूछा- "कौन हैं ये लोग?" "महाराज, हम जाति के ब्राह्मण हैं- कोल्हटकर, श्रीबागचे, गंगाधर पन्त, कुलकर्णी। हम सब को जंजीरे के हब्शियों ने जबरदस्ती मुसलमान बना दिया। "महाराज, आप हम लोगों को फिर धर्म में सम्मिलित करने की कृपा करें। इसी प्रकार घोर अन्याय के सताए हमारे जैसे इस राज्य में असंख्य लोग हैं।" रसूलकर ने विनय के स्वर में कहा। महाराज ने वहीं पर चिटणीस से पूछा- "बालाजी पन्त प्रत्येक व्यक्ति को धर्माचरण स्वेच्छा से करना चाहिए न ?" "जी महाराज ?" "इनकी समस्या का शीघ्रातिशीघ्र समाधान कीजिए। चिटणीसजी समारोह की व्यवस्था में व्यस्त हैं। इस समस्या की ओर मैं स्वयं देखता हूँ।" सोमाजी दत्तो ने आगे बढ़कर कहा। महाराज और महारानी के मंडप में आने में बिलम्ब होने से लोग बेचैन होने लगे। सिंहासन की दाहिनी ओर दृष्टि टिकाए लोग वहीं पर बैठ गये। उस दरबार की शान-शौकत बादशाह के दरबार को भी मात देने वाली थी। समारोह के लिए राजा ने खुले हाथ मुहरें लुटाई थीं। मराठों की राजगद्दी पर दूसरा छत्रपति विराजमान हुआ। इस बात का दशों दिशाओं में फैलना स्वाभाविक था। दरबार की दीवारें 230 :: सम्भाजी