छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंरामायण और महाभारत के प्रसंग चित्रों से सजाई गयी थीं। स्फटिक जैसे सुन्दर शीशों से बनाए गये झूमर दरबार की शान बढ़ा रहे थे। सम्मानित अतिथियों के लिए मखमली तख्तों की व्यवस्था की गयी थी। रायगढ़ का वह स्वर्ण सिंहासन कब से शम्भुराजा कर प्रतीक्षा कर रहा था। उस सिंहासन के साथ मावले मर्दों का खून पसीना, प्रेम और आदर का रिश्ता था। अचानक दाहिनी ओर मंगलवाद्य बजने लगे, नगाड़े भी जोर जोर से बजने लगे साथ ही चोबदारों की घोषणाएँ गूँजने लगीं—"महाराज धीरे धीरे महाराजऽऽ। सफल शास्त्र विचारशील, धर्मज्ञ, शास्त्रकोविद, क्षत्रिय कुलावतंस श्री शम्भू महाराज आ रहे हैंऽऽ।" चोबदारों के पीछे पीछे धीरे धीरे किन्तु दृढ़ता से कदम रखते हुए शम्भुराजा का आगमन हुआ। दरबार में हर्षोल्लास फैल गया। केवल बाईस तेइस वर्ष के ऊँचे, बलिष्ठ रेख उठान चेहरे वाले सपनीली आँखों और सुतवाँ नाक वाले गौरांग शम्भूमहाराज सभी के सामने प्रस्तुत हुए। उनकी नुकीली दाढ़ी शिवाजी का स्मरण दिला रही थी। उनके गले में मणियों और मोतियों की मालाएँ चमक रही थीं। किन्तु उनके मन के भीतर कुछ और ही सक्रिय था। शम्भुराजा के पीछे पीछे छरहरी और अभिजात सौन्दर्य से मंडित येसूबाई आयीं। उनके शरीर पर अंजीरी रंग शालू था। गले में पीली पीली चमकती कोल्हापुरी माला, कमर पर स्वर्ण करधनी, भाल पर कुंकुम की लम्बी लकीर, चन्द्रमा के निकलते समय आसपास झिलमिलाते बादलों का घेरा दिखाई पड़ता है, वैसे ही सिर पर पल्लू था। मदुरई के पुजारियों द्वारा घंटों के परिश्रम से सजाई गयी मीनाक्षी देवी की भाँति येसूबाई अत्यन्त सुन्दर लग रही थीं। उनके चेहरे पर विलसने वाली मधुर मुस्कान उनके सभी वस्त्रालंकारों को मात देती थी। येसूबाई के पीछे पीछे जानकी बाई और शम्भुराजा की सौतेली माँ सोयराबाई आती हुई दिखाई पड़ीं। शम्भुराजा के साथ एक ग्यारह वर्ष का सुन्दर राजकुमार आते हुए दिखाई पड़ा। उसके शरीर पर मूल्यवान रेशमी जाली वाला कुर्ता था और विशेष प्रकार के आभूषण चमक रहे थे। लोगों को यह पहचानते देर न लगी कि वे राजाराम हैं। धीमी गति से एक एक कदम रखते शम्भुराजा सिंहासन के पास पहुँचे। उन्होंने उस खचाखच भरे दरबार पर नजर डाली और फिर मुड़कर सिंहासन की ओर देखा। उस समय उनके पैर कुछ लडखड़ाये। मन कुछ सम्भ्रमित हुआ। वे सोचने लगे—उस स्वर्ण से सिंहासन पर बैठें या उसे त्याग दें, भरे दरबार से पीछे चले जायें? शम्भुराजा उसी स्थान पर स्तम्भवत खड़े रहे। वेणुवन की गूँजती हवा के समान पन्हाला की भेंट के समय शिवाजी महाराज द्वारा कहे गये शब्द उनके कानों में गूँजने लगे—"बेटे जब अपने पाँच सोपानों वाले पवित्र सिंहासन पर बैठने का सम्भाजी 231