छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमय आएगा तो केवल जन्मजात उत्तराधिकार से नहीं बल्कि अपने आत्मविश्वास से, मराठी मिट्टी के प्रति अटल निष्ठा से रायगढ़ के सिंहासन पर आसीन हो जाना। किन्तु यदि स्वराज्य के प्रति निष्ठा में थोड़ी भी दुविधा या शंका आये तो उस सिंहासन की हवा भी स्वयं को नहीं लगने देना। उसके बदले कफनी पहनकर, साधु बनकर प्रसन्नतापूर्वक वन की ओर चले जाना।" शम्भुराजा ने एक बार पुनः सभा मंडप की ओर देखा। हजारों मावल वीरों की आँखों के जादू ने उनमें एक नव-चैतन्य स्फुरित किया। अभिमान से उनका सीना तन गया। वे फिर सिंहासन की ओर ध्यान से देखने लगे। उन्हें आभास हुआ कि बड़े महाराज सिंहासन पर विराजमान हैं। इस कल्पना मात्र से उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे। उन आँसुओं पर झूमरों की तेज रोशनी पड़ने से वे स्फटिक के समान चमकने लगे। वे स्वयं से ही अस्पष्ट शब्दों में कुछ कहने लगे। उनके धीरे बोले गये शब्दों को अगली पंक्ति के कुछ सम्मानित लोगों ने सुना—'पिताजी! आपकी मुहर की, पवित्र पादुका की, तलवार की और परम्परा की मैं अपने प्राणों से भी अधिक हिफाजत करूँगा।' "वाह महाराज, वाहऽऽ!" कवि कलश, जोत्याजी, प्रहलाद निराजी जैसे सहकारियों ने आनन्द का उद्घोष किया। शम्भू महाराज ऐसे ओजस्वी स्वर में बोले मानो बड़े महाराज के सामने शपथ ले रहे हों। "जिस प्रकार जसवंती के कोमल फूल को नाखून से कुतर दिया जाता है वैसे ही यदि मेरे सिर को छाँटकरं काल के चरणों में फेंक दिया जाय तो भी मुझे स्वीकार है किन्तु अपने सह्याद्रि के हीरे मोतियों मे लाख गुना मूल्यवान किलों को किसी के भी हाथ में नहीं जाने दूँगा। हिन्दवी स्वराज्य पर आँच नहीं आने दूँगा।" इसी दृढ़ निश्चय के साथ शम्भुराजा सिंहासन पर विराजमान हुए। सिंहासन पर बैठते ही किले के सभी बुर्जों से तोपों के धड़ाके छूटने लगे। पिछले कई सालों में इस तरह नगाड़े नहीं बजे थे। शम्भुराजा पर पुष्पों की वृष्टि हुई ऐसा लगा मानो देवता उन पर वृष्टि कर रहे हों। येसूबाई की आँखों में आनन्द के आँसू उमड़ आए। छोटे राजाराम, जानकीबाई, राजा के सभी मित्र आनन्द विभोर हो गये थे। मन्त्रपाठ, जयघोष, राज्यारोहण विधि सब कुछ साथ-साथ चल रहा था। समारोह के प्रथम चरण की समाप्ति पर राजा को भेंट समर्पित की गयी। उस समारोह में स्वामी रामदास की ओर से उनके शिष्य दिवाकर गोसावी उपस्थित थे। उन्होंने स्वामीजी की ओर से आशीर्वाद प्रदान किया। समारोह में सन्त तुकाराम के चिरंजीव महादोबा और नारायण स्वामी उपस्थित थे। उन दोनों का सम्मानपूर्वक गौरव किया गया। दूसरे राज्यों के वकीलों ने झुककर अभिवादन किया। समारोह के 232 :. सम्भाजी