भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

समय आएगा तो केवल जन्मजात उत्तराधिकार से नहीं बल्कि अपने आत्मविश्वास से, मराठी मिट्टी के प्रति अटल निष्ठा से रायगढ़ के सिंहासन पर आसीन हो जाना। किन्तु यदि स्वराज्य के प्रति निष्ठा में थोड़ी भी दुविधा या शंका आये तो उस सिंहासन की हवा भी स्वयं को नहीं लगने देना। उसके बदले कफनी पहनकर, साधु बनकर प्रसन्नतापूर्वक वन की ओर चले जाना।" शम्भुराजा ने एक बार पुनः सभा मंडप की ओर देखा। हजारों मावल वीरों की आँखों के जादू ने उनमें एक नव-चैतन्य स्फुरित किया। अभिमान से उनका सीना तन गया। वे फिर सिंहासन की ओर ध्यान से देखने लगे। उन्हें आभास हुआ कि बड़े महाराज सिंहासन पर विराजमान हैं। इस कल्पना मात्र से उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे। उन आँसुओं पर झूमरों की तेज रोशनी पड़ने से वे स्फटिक के समान चमकने लगे। वे स्वयं से ही अस्पष्ट शब्दों में कुछ कहने लगे। उनके धीरे बोले गये शब्दों को अगली पंक्ति के कुछ सम्मानित लोगों ने सुना—'पिताजी! आपकी मुहर की, पवित्र पादुका की, तलवार की और परम्परा की मैं अपने प्राणों से भी अधिक हिफाजत करूँगा।' "वाह महाराज, वाहऽऽ!" कवि कलश, जोत्याजी, प्रहलाद निराजी जैसे सहकारियों ने आनन्द का उद्घोष किया। शम्भू महाराज ऐसे ओजस्वी स्वर में बोले मानो बड़े महाराज के सामने शपथ ले रहे हों। "जिस प्रकार जसवंती के कोमल फूल को नाखून से कुतर दिया जाता है वैसे ही यदि मेरे सिर को छाँटकरं काल के चरणों में फेंक दिया जाय तो भी मुझे स्वीकार है किन्तु अपने सह्याद्रि के हीरे मोतियों मे लाख गुना मूल्यवान किलों को किसी के भी हाथ में नहीं जाने दूँगा। हिन्दवी स्वराज्य पर आँच नहीं आने दूँगा।" इसी दृढ़ निश्चय के साथ शम्भुराजा सिंहासन पर विराजमान हुए। सिंहासन पर बैठते ही किले के सभी बुर्जों से तोपों के धड़ाके छूटने लगे। पिछले कई सालों में इस तरह नगाड़े नहीं बजे थे। शम्भुराजा पर पुष्पों की वृष्टि हुई ऐसा लगा मानो देवता उन पर वृष्टि कर रहे हों। येसूबाई की आँखों में आनन्द के आँसू उमड़ आए। छोटे राजाराम, जानकीबाई, राजा के सभी मित्र आनन्द विभोर हो गये थे। मन्त्रपाठ, जयघोष, राज्यारोहण विधि सब कुछ साथ-साथ चल रहा था। समारोह के प्रथम चरण की समाप्ति पर राजा को भेंट समर्पित की गयी। उस समारोह में स्वामी रामदास की ओर से उनके शिष्य दिवाकर गोसावी उपस्थित थे। उन्होंने स्वामीजी की ओर से आशीर्वाद प्रदान किया। समारोह में सन्त तुकाराम के चिरंजीव महादोबा और नारायण स्वामी उपस्थित थे। उन दोनों का सम्मानपूर्वक गौरव किया गया। दूसरे राज्यों के वकीलों ने झुककर अभिवादन किया। समारोह के 232 :. सम्भाजी

समाप्त होते ही शम्भूराजा ने कहा, "कुछ दिन पहले मैंने एक निर्णय लिया था। बालाजी पन्त, अण्णाजी और हिरोजी के घर से चौकी पहरे उठा लिए थे। भाइयो, मैं बड़े महाराज के समय के इन अनुभवी पुराने लोगों पर नयी जिम्मेदारियाँ सौंपने वाला हूँ।" राजा के इन उद्गारों को सुनकर दरबार में शहनाई आदि मंगल वाद्य बजने लगे। बुजुर्गों को सम्मानित करने के उपलक्ष्य में राजा की बड़ी प्रशंसा की। इसी समय बाई ओर झिलमिलाते पर्दे की आड़ से पहले बालाजी पन्त उनके बाद अण्णाजी दत्तो हिरोजी, राहुजी जैसे कर्मचारी आकर सभा मंडप में खड़े हो गये। उनके सिर की कलीदार पगड़ियां, पट्टे, महँगे कपड़े गले में पड़े रत्नहार सब कुछ बहुत शानदार लग रहे थे। उन सभी ने आकर पहले शम्भूराजा का और दरबार का अभिवादन किया। दरबार में उपस्थित प्रजावर्ग ने जोर से जय घोष किया। शम्भूराजा ने सन्तोष व्यक्त करते हुए कहा, "महानुभावो! भ्रमों और गलतफहमियों का गन्दा पानी बह गया है। मेरे मन में कोई भी शंका या द्वेष नहीं है। बताइए राज्य का चिटणीस पद हम किसे सौंपें?" दरबार के लोग चुप्पी साध गये। तब शम्भूराजा ने हँसकर स्वयं कहा, "एक निष्ठा और सेवा भाव का ही दूसरा नाम बालाजी पन्त है। क्या उन्हें छोड़कर दूसरा कोई चिटणीस हो सकता है?" शम्भूराजा के भावपूर्ण शब्दों से सभी के मन भर आए। सम्मान का वस्त्र देने के लिए उन्होंने चिटणीस को पास बुलाया। इसी समय कल्याण और भिभंडी के सूबों की जिम्मेदारी मोरोपन्त को सौंपने की घोषणा की। पास में खड़े हंबीरराव मोहिते की ओर शम्भूमहाराज ने बड़े गर्व से देखा। उन्होंने कहा, "ऐसा कहा जाता है कि वीरों का पोवाड़ा वीरों को ही गाना चाहिए। उसी न्याय से वीरों के शस्त्र महावीर ही चलाया करते हैं। प्रतापराव गूजर के स्वर्गवासी होने के बाद मामाजी ने ही साहसपूर्वक फौलादी शस्त्र सँभाला है। इसके बाद सेनापति का पदभार हंबीरराव मामा ही सँभालेंगे।" हंबीरराव के बाद प्रहलाद निराजी को न्यायाधीश के वस्त्र मिले। इसी प्रकार मोरोपन्त पंडित दानाध्यक्ष, आबाजी सोनदेव सुरनवीस और दाजी पन्त वाकेनवीस बने। काफी समय से कोने में खड़े भारी डीलडौल के अण्णाजी दत्तो परेशान से दिख रहे थे, उनके माथे पर घर्म बिन्दु एकत्र हो गये थे। उनकी दृष्टि स्थिर नहीं थी। उनका चित्त अशान्त था। अण्णाजी की शान्त किन्तु तीखी दृष्टि डालते हुए शम्भूराजा ने कहा, "पन्त इस नयी राज्य व्यवस्था में भी आपका स्थान सम्मानजनक ही होगा। हम बड़ी प्रसन्नता से स्वराज्य के मजूमदार पद पर आपकी नियुक्ति करते सम्भाजी :: 233

हैं।'' मजूमदारी मिलने से अण्णाजी प्रसन्नता का ऊपरी दिखावा करने का प्रयास कर रहे थे, किन्तु सुरनवीसी जाने का दुख उनसे छुपाते नहीं बन रहा था। राजा ने सोयराबाई और धाराऊ इन दोनों माताओं का सम्मान किया। अपने आजीवन साथी रायप्पा महार का सत्कार करना भी शम्भूराजा नहीं भूले। शम्भूराजा की दृष्टि समारोह में पीछे बैठे दरिया सारंग और दौलतखान पर पड़ी। तुर्की शैली में बनाए गये उनके आकर्षक फेटे, हरे रंग के कुर्ते, मेहंदी लगी दाढ़ियाँ सभा मंडप में अलग आकर्षण पैदा कर रहे थे। उनके पास ही मराठी लिबास में भायनाक भंडारी बैठा था। उन तीनों की ओर हँसती नजर डालते हुए शम्भूराजा ने कहा, "भविष्य में अपने गढ़-किलों को सँभालकर, पूरी दुनिया में अपना झंडा फहराना हो तो पानी पर शासन करना सीखो, ऐसा हमारे पिताजी कहते थे। इसलिए अपने समुद्री सेनानियों को सम्मानित करना हम अपना कर्तव्य समझते हैं।" उन समुद्री वीरों को सम्मान वस्त्र दिये गये। राजा ने अपनी तीनों बहनों और तीनों बहनोइयों को मूल्यवान वस्त्र और आभूषण देकर सम्मानित किया। दरबार की ओर अपनी दृष्टि घुमाते हुए शम्भूराजा ने कहा "किसी कुटुम्ब या राज्य को कोई स्त्री किस जादुई शक्ति से सँभालती और आगे बढ़ाती है, इसकी श्रेष्ठ उदाहरण हमारी दादी साहिबा अर्थात् जीजा माता थीं। उन्होंने शिवराय को बनाया, शिवराय ने हिन्दवी स्वराज्य को बनाया। यशस्वी पुरुष के मुकुट की कौस्तुभ मणि उसकी स्त्री होती है। शम्भूराजा ने अपनी दृष्टि जब येसूबाई की ओर घुमाई तो दरबार में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। उन्होंने कहा, "शत्रु का मुकाबला करने के लिए अनेक बार हमें अपने अष्टप्रधानों के साथ बाहर जाना पड़ता है। इसलिए गृह विभाग का सूत्र हम येसूबाई के हाथों में सौंप रहे हैं। यह स्वर्णमुद्रा और उस पर अंकित शब्दलेख 'स्त्री सखी राज्ञी जयति' सदा ही महारानी की पहचान बना रहेगा।" उधर होली के मैदान पर अखंड दक्षिणा वितरण और दान धर्म चल रहा था। देश के कोने-कोने से आये याचकों की वहाँ भीड़ लगी थी। राजा ने दरबार में भी खूब दान-पुण्य किया। राजा ने कहा, "हमारे पिताजी दुनिया के सबसे बड़े रत्नपारखी रहे होंगे। इसीलिए उन्होंने अकूत द्रव्यों में खेलने वाले अमीरों को किनारे करके तानाजी, येसाजी, मुरारबाजी, दौलतखान, दरियासारंग जैसे सामान्य जनों को अपनाया और उन्हें अवसर दिया। ऐसा करने से राजा का ही गौरव बढ़ा। आज हम भी अपने एक अत्यन्त निष्ठावान स्वराज्य सेवक का सम्मान कर रहे हैं जिसने कभी प्यादे के पद की भी माँग नहीं की। अपने उस कवि कलश को हम 'छन्दोगामात्य' की उपाधि दे रहे हैं और उनका अपने अष्टप्रधानों में समावेश कर रहे हैं।" 234 :: सम्भाजी

शम्भूराजा की बात सुनते ही कवि कलश उठकर खड़े हो गये। राजा के सामने झुकते हुए विनम्रता से बोले, "महाराज, आपके मुकुट के मोतियों में हम कोई कमी नहीं आने देंगे। हम मरते दम तक साथ रहेंगे।" हिन्दवी स्वराज्य के दूसरे छत्रपति के राज्याभिषेक-समारोह पूरी गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। गढ़ पर एक लाख से अधिक लोग उपस्थित थे। नीचे उतरने के लिए केवल एक सँकरा रास्ता था। इसलिए भीड़ अधिक हो गयी। होली के मैदान पर भी दान प्राप्त करने के लिए याचकों में खूब हो-हल्ला हुआ। विशेष रूप से तैयार किया गया लकड़ी का चबूतरा भी टूट गया। हजारों याचक एक साथ टूट पड़े। ठेलमठेल और अनियन्त्रित भीड़ में दम घुटने से सौ दो सौ याचक मृत्युमुखी हो गये। भीड़ की असीम बाढ़ के कारण लौटते समय खूब कसा कमी हुई। कुछ अफवाहें भी फैलीं। जिन्हें दान नहीं मिल पाया वे छटपटाकर बड़े-बड़े शाप दे रहे थे। मार्ग में कवि कलश और उनकी मातृभूमि कन्नौज को लांछित किया जा रहा था। एक शास्त्रीजी बड़े ताव से बता रहे थे—"समझ में आया तुम लोगों की? यह सारी गड़बड़, यह सारी नरबलि उस दुष्ट कलश की करामात है। पूरे चौदह सौ मनुष्य और चार हजार भेड़ें काटी हैं उसने। ऐसा उस नराधम ने किया है।" "किन्तु किस लिए?" "ऐसे बच्चों जैसा प्रश्न क्या पूछते हो? उस कलुष के प्रियतम शम्भूराजा सिंहासनाधीश हो गये न? इसीलिए इस शाक्तपन्थी चांडाला का यह कारनामा हुआ है। वह मानता है कि जितनी नर बलि होगी, जितनी भेड़ों के प्राण जाएँगे उतने ही शम्भूराजा के शत्रु नष्ट होंगे।" लोगों ने अनियन्त्रित भीड़ और अति उत्साह के कारण प्राण गँवाए थे और सारा दोष कवि कलश के माथे मढ़ा जा रहा था। चार शम्भूराजा के निजी कक्ष में कुछ समीपी लोग एकत्र हुए थे। मध्यरात्रि में आवभगति हो रही थी। उनमें बालाजी चिटणीस म्हालोजी घोडपड़े कोंडाजी, फर्जन्द जैसे बुजुर्गों सहित कवि कलश कृष्णाजी कंक, निलोपन्त पेशवा जैसे तरुण भी सम्भाजी :: 235

सम्मिलित थे। हंबीर मामा, सब कुछ निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो जाने के लिए सन्तोष व्यक्त कर रहे थे। भोजन समाप्त हुआ। पानी परसने वाले परिचारक एक ओर हो गये। महल के पिछवाड़े छत पर अच्छी खासी भीड़ थी। हंबीर मामा से शम्भूराजा ने कहा, "हंबीर मामा! पिताजी के समय में सिंहगढ़, राजगढ़, प्रतापगढ़ ने खूब यश कमाया। अब हमारे शासन काल में नासिक, बगलाण की तरफ के साल्हेर, अहिवन्त रामरोज और त्र्यम्बकेश्वर को भी कुछ नया इतिहास रचना चाहिए।" बोलते-बोलते शम्भूराजा ठिठक गये। अपना निचला पतला ओंठ दबाते हुए और मुट्ठियाँ भींचते हुए बोले, "यह औरंगजेब महाराष्ट्र पर चढ़ाई करेगा। ऐसा समाचार है न ? आने दीजिए। शुरू में ही उसे ऐसा जवाब दें कि—" हंबीर मामा हँसते हुए बोले, "शम्भू महाराज, राजा का राज्याभिषेक अर्थात् भूमि के साथ उसका विवाह।" "हाँऽऽ वह सब तो धार्मिक विधि का ही हिस्सा है।" "वैसे तो कुछ नहीं, सहज ही याद आया। मारवाड़ियों के लड़कों के विवाह में लड़के के मामा को खूब खर्च करके महँगी भेंट देनी पड़ती है। इस भेंट को 'मामेरा' कहते हैं। क्या ऐसा कह रहे हो कि तुम्हारे इस विवाह के लिए मैं भी भरपूर 'मामेरा' दूँ?" किन्तु मामाजी आप किस ओर संकेत कर रहे हैं? दिशा तो बताइए?" "सूरत।" धीमी आवाज में किन्तु सभी को सुनाते हुए मामा बोले। "तीसरी बार सूरत की लूटऽऽ?" सभी ने एक साथ प्रश्न किया। "हाँऽऽ क्यों नहीं? अभी भी बहुत सम्पत्ति है वहाँ।" सूरत के अभियान की अधिक चर्चा न करने की बात निश्चित की गयी शत्रु की अनवधानता में आक्रमण करना उचित होगा। किन्तु इस नयी योजना की बात बहुत लोगों को अवगत हो गयी। जगदीश्वर की पूजा पूर्ण होने में रात को बहुत विलम्ब हो गया। अण्णाजी दत्तो और हिरोजी फर्जन्द देवता को चाँदी का मुकुट चढ़ाकर मुक्त हुए। कुछ महीने पहले राजबन्दी के रूप में वे जब रायगढ़ की सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे तो उन्हें एक-एक कदम पर आभास हो रहा था कि फाँसी के तख्ते पर ही जा रहे हैं। उसी समय उन्होंने मन्नत मानी थी कि यदि बच जाएँगे तो जगदीश्वर को चाँदी का मुकुट चढ़ाएँगे। उनकी जान ही नहीं बची बल्कि शम्भूराजा ने उनके सारे अपराध माफ करके उन्हें पुनः अष्टप्रधानों में सम्मिलित कर लिया। पूजन-अर्चन समाप्त हुआ। राहुजी सोमनाथ ने नौकरों को आगे जाने के लिए कहा। अण्णाजी और राहुजी की पालकियाँ और हिरोजी का घोड़ा ब्राह्मणबाड़ी में 236 :: सम्भाजी

रुके। देव-देव करते पीछे आते हुए काशी पंडित ने इन विशिष्ट लोगों को भोजन का निमन्त्रण दिया था। राज्याभिषेक के अवसर पर गोवा के डिचोली से वहाँ के सूबेदार मोरो दादा आये थे। वे आते समय महाड से चाँदी का मुकुट लेते आये थे। इसलिए अण्णाजी और उनके साथियों को खरीद करने की जहमत नहीं उठानी पड़ी थी। भोजन समाप्त हुआ। काशी पन्त की हवेली मे लोग आधीरात गप्प लड़ाने के लिए बैठे। वहाँ से रायगढ़ का बालेकिला, राजगृह और पीछे अष्टप्रधानों के आवास दिखाई पड़ रहे थे। राजगृह का सारा परिसर प्रकाश से लकलका रहा था। थोड़ी देर बाद उस प्रकाश सज्जा की ओर देखते हुए राहुजी बोले, "हिरोजी, पेशवाओं के बाड़ों के बाईं ओर वह तैयार किया हुआ बाड़ा देखा?" "बताइए, किसका है?" "शम्भूराजा ने ही बनवाया है, किन्तु अपने लिए नहीं, ब्रजभाषा पंडित कविगज कलुष के लिए, भई।" हिरोजी कुछ अजीब-सा चेहरा बनाकर बोला, "जाने दो राहुजी, एक मित्र तो मित्र का ध्यान रखेगा ही।" "भाई हिरोजी, तुम्हारे इस ठंडे खून पर मुझे बहुत क्रोध आता है। कैसा भी क्यों न हो? आप शहाजी महाराज की सन्तति हैं। आप रिश्ते मे बड़े महाराज के बन्धु और सभा के चाचा ही हैं न?" "जाने दो राहुजी।" "क्यों जाने दें? कौन है? किस जाति का है? गंगा के किनारे से आया यह भड़भूजा। उसके लिए शम्भूराजा ने बाड़ों में व्यवस्था करवाई और अपने चाचा के लिए होली के मैदान के उधर एक साधारण सा दुमंजिला मकान, यह भी कोई न्याय है?" बहुत देर से चुप बैठे अण्णाजी हँसते हुए बोले, "यार हिरोजी, तुम्हारे द्वारा किये गये उपकार क्या अनदेखा करने योग्य है? आगरा से बड़े महाराज जब निकले तो अपनी जगह पर उन्होंने तुम्हें बिस्तर में सुला दिया था। कितना धोखा था? तुम तो मर ही गये थे। इतने बड़े त्याग का यह उपहार?" हिरोजी का मस्तिष्क अब चक्कर खाने लगा। उन्होंने सामने रखे मदिरा के पात्र को उठा लिया और खाली कर दिया। वे जोर से छींकते हुए बोले, "कुछ भी हो खजाना चुराने का अपराध तो मुझसे ही हुआ था। शम्भू बेटा बड़े कलेजे का है। उसने हमारे गुनाह पर पर्दा ही डाला न?" "ठीक है, हम कहते हैं खजाना चुराया। लेकिन किसका खजाना? क्या अकेले शम्भूजी राजा का? अरे भोले हिरोजी, उसमें तुम्हारा भी आधा हिस्सा है।" राहुजी और अण्णाजी के फुलाने से हिरोजी जैसे फौजी व्यक्ति का सिर सम्भाजी 237

एकदम घूम गया। मदिरा का प्याला खाली करते हुए मोरो दादा के साथ आये हुए कारकुन गला फाड़कर लगभग रो पड़े। “अण्णाजी, आपको सुरनवीसी न देकर शम्भुराजा ने बहुत बड़ा गुनाह किया है। “हाँ, अब राजधानी में हमारी धाक कहाँ रही? कुछ भी करना पड़े किन्तु पन्त के दिन बदलने चाहिए।” अण्णाजी को दुबारा न मिलने वाली 'सुरनवीसी' को शिष्यों ने स्मरण करा दिया। अण्णाजी दत्तो बेचैन हो गये। वे कठोर स्वर में बोले, “आजकल यहाँ न्याय-नीति से कोई लगाव ही नहीं रहा। साक्षी के लिए कहता हूँ। जाँच करके देखो, बताओ, कार्तिक सुदी सप्तमी, शक संवत् सोलह सौ एक के दिन, यह हमारा हिन्दवी स्वराज्य का दूसरा छत्रपति कहा गया था?” “कहाँ?” “केलशी के याकूब फकीर बाबा के मठ में। उसके पैरों में लोटने के लिए।” “इसमें क्या नयी बात है? यह फकीर तो शिवाजी महाराज का भी गुरु था। महाराज भी वहाँ अनेक बार...।” “हिरोजी, अरे मूर्ख! कहाँ वे महाप्रतापी शिवाजी और कहाँ यह शम्भू संकट? किसकी कहाँ और किससे तुलना करते हो? यार हिरोजी कहते हैं कि बुरा नहीं बोलना चाहिए किन्तु जब तक यह घमंडी, बदमिजाज राजा और उसी के जैसा कुपात्र कलुषा, रायगढ़ पर जीवित रहेंगे तब तक हम जैसे वफादार सेवकों का ठिकाना नहीं लगेगा। हमारे देश-धर्म पर आया यह शाक्त संकट समाप्त होने पर ही कल्याण होगा।” 238 :: सम्भाजी

खंड-दो सम्भाजी :: 239

240 :: सम्भाजी

अशुभ मोड़ एक आगरा और दिल्ली के बाद बुरहानपुर ही मुगलों का सर्वाधिक समृद्ध नगर था। दक्षिण का प्रवेशद्वार होने के कारण, मध्यकालीन भारत के सबसे बड़े व्यापार के रूप में उसकी ख्याति थी। यह सैनिक गतिविधियों की दृष्टि मे बड़े महत्त्व का स्थान था। इसलिए बुरहानपुर का सूबेदार बादशाह का कोई करीबी रिश्तेदार ही बनाया जाता था। खानजहान बहादुरखान बादशाह का दूधभाई था। इसीलिए उसकी नियुक्ति इस जिम्मेदारी के पद पर की गयी थी। बुरहानपुर से ही दक्षिण का शासन चलाया जा रहा था। तापी नदी के तट पर बसी यह ऐश्वर्यनगरी उस शाम को भी नित्य की भाँति आनन्द और विलास में डूबी थी। नदी के तट पर अनेक सुन्दर महल, राजप्रासाद व्यापारियों की बड़ी-बड़ी पीढ़ियाँ, मदरसे आदि विद्यमान थे। शहर के बीच में ऊँचे और मजबूत गुम्बदों वाली मस्जिद खड़ी थी। बहादुरखान कोकल्तास अपने भतीजी की शादी में सम्मिलित होने, चार दिन पहले औरंगाबाद चला गया था। उसका समधी भी हैदराबाद के नवाब का भाई था। बारात बड़ी धूमधाम से गोलकुंडा से आने वाली थी। अपनी शौकत में कमी न पड़े, इसके लिए बहादुरखान बहुत सचेत था। बुरहानपुर में नियुक्त आठ हजार फौजियों में से तीन हजार फौजी अपने साथ लेकर वह औरंगाबाद के लिए रवाना हुए। शाही विवाह में अपना प्रभाव दिखाने के लिए ही उसने अपने साथ फौज ली थी। उसके जाने के बाद नायबसूबेदार फाकरखान बुरहानपुर का सर्वेसर्वा था। जगह-जगह पर मशालें और बत्तियाँ जलाने का कार्य आरम्भ हुआ। तापी की धारा में उठने वाली तरंगें, रात के अन्धकार में लुप्त होने लगी थीं। शहर के सामने बहुत बड़ी दीवार थी। उसके साथ इधर हाल के दिनों में अनेक नयी बस्तियाँ बन गयी थीं। नवाबपुर, करणपुर, शाहजहाँपुर, खुर्रमपुर जैसे सम्भाजी :. 241

कुल सत्रह 'पुर' बस गये थे। किन्तु इन सभी पुरों में बहादुरपुर सर्वाधिक समृद्ध 'पुर' के रूप में बहादुरपुर में सूरत और हैदराबाद जैसे शहरों के व्यापारी रहते थे। वहाँ रेशम, मलमल, सोना-चाँदी आदि के व्यापार में करोड़ों रुपयों का लेन-देन होता था। वैभव से भरी बुरहानपुर नगरी उस 30 जनवरी, 1681 की शाम बाहर से हमेशा की तरह ही लग रही थी। नायब सूबेदार काकरखान ने सन्ध्याकाल की नमाज पढ़ी। हिन्दू प्रजा के साथ किए गये दुर्व्यवहार के कारण वह बहुतों के रोष का कारण बन गया था। इसलिए दो सौ सशस्त्र सैनिक उसके बाड़े के बाहर हमेशा तैनात रहते थे। आज की दोपहर विशेष रूप से घटना प्रधान बन गयी थी। सूरत के सूबेदार की ओर से हरकारे आये थे। उन्होंने बताया कि सूरत के आसपास के जंगलों में वहाँ के ग्रामीणों ने अनेक मराठा घुड़सवारों को देखा है। इसलिए किसी भी क्षण सूरत पर मराठों का आक्रमण हो सकता है। इस आशंका से वहाँ की प्रजा बहुत भयभीत हो गयी है। विशेष रूप से गोदामों वाले विदेशी व्यापारी। इसके पूर्व पहली बार लगभग बीस वर्ष पहले और दूसरी बार बारह वर्ष पहले शिवाजी ने सूरत में लूटपाट की थी। अब ठीक बारह वर्ष बाद उनका बेटा सम्भाजी सूरत लूटेगा। इस कल्पना मात्र से लोगों की कँपकँपी छूट रही थी। सूरत के थानेदार ने बुरहानपुर से जितनी सम्भव हो उतनी सेना तत्काल भेजने की प्रार्थना की थी। सूरत की दूसरी लूट के बाद शहर के चारों ओर तीन पोरिसा ऊँची दीवार उठाई गयी थी। आवश्यकता से अधिक फौज भी वहाँ तैनात थी। किन्तु मराठों के आक्रमण के भय से यह सारा प्रयत्न वहाँ हो रहा था। काकरखान ने अपने सहयोगियों से विचार-विमर्श किया। अन्ततः केवल एक हजार फौज बुरहानपुर में रखकर शेष चार हजार की फौज और बड़ा तोपखाना दोपहर में ही सूरत के लिए रवाना कर दिया। सन्ध्या होने से पहले ही यह सेना पाँच कोस से आगे निकल गयी। काकरखान ने नमाज की चादर मोड़ी। उसी समय चार- पाँच गुप्तचरों के घोड़े उसके महल के सामने आकर खड़े हुए। दरवाजे के पास अपने घोड़ों को रोककर सवार नीचे उतरे। वे पसीने से तर दौड़ते हुए काकरखान के पास पहुँचे। वे घबराहट के स्वर में कहने लगे— "हुजूर, मरगट्टे बुरहानपुर तक पहुँच गये हैं। मरगट्टों ने आक्रमण कर दिया है, हुजूरऽऽ।" "क्या बकते हो? मरगट्टे और बुरहानपुर? पागलोऽऽ उनका लक्ष्य तो सूरत था...।" काकरखान चकरा गया। उसने सुराही को मुँह से लगाकर गटागट पानी पिया—"मरगट्टों का सिपाहसालार कौन है? वह सम्भा तो इतनी दूर आ नहीं 242 :: सम्भाजी

सकता। पहुँचेगा भी कैसे? पन्द्रह दिन पहले तो रायगढ़ पर था। दूल्हा राजा बनकर अपनी ताजपोशी का आनन्द ले रहा था। " "किसी भी हालत में वह यहाँ नहीं पहुँच सकता। घोड़े पर रात-दिन दौड़ लगाए तो भी उसे यहाँ पहुँचने में पाँच-छ: दिन तो लगेंगे ही।" पास खड़े एक मौलवी ने कहा। काकरखान और अन्य लोगों को यह सूचना सच नहीं लग रही थी। किन्तु जासूसों के भयभीत चेहरों को देखकर उनकी जबान बन्द हो गयी थी। नगर के कुछ बड़े व्यापारी भी वहाँ एकत्र हो गये थे। मराठों की सेना सचमुच बुरहानपुर में आ गयी तो क्या होगा? इस कल्पना से सभी को पसीना छूट रहा था। बाहर गली- मुहल्लों में भी यह खबर फैली परिणामस्वरूप चारों ओर भय का वातावरण पसर गया। इसी बीच तीन अन्य गुप्तचर वहाँ पर दौड़ते हुए आये। वे ताजी खबर सुनाने लगे—"यहाँ से तीन कोस की दूरी पर घने जंगल में मराठों ने पड़ाव डाला है। उनके साथ पन्द्रह-सत्रह हजार की फौज है। हंबीर मामा नाम का एक बहुत ही जिद्दी सिपहसालार उनके साथ है।" "या अल्लाहऽऽ !!" काकरखान को मितली-सी आने लगी। वह भयभीत होकर इधर उधर देखने लगा। वह चिल्लाकर बोला, "ये मरगट्टे तो पूरे निकम्मे हैं और हमारे जासूस बेवकूफ। सूरत का नाटक रचकर इन बदमाशों ने अब बुरहानपुर को सफाचट करने की सोची है। उस शिवाजी की अपेक्षा उसका लौंडा सम्भा महाबदमाश निकला।" "क्या बताऊँ, हुजूर ? इन मूर्खों की चालें इतनी गुप्त होती हैं कि क्या बताऊँ? उन हैवानों ने दोपहर में ही पीछे के जंगल में खाना तैयार कर लिया। रात के लिए खाना साथ लेकर वे आसपास की घनी झाड़ियों में छुपकर बैठे हैं। उनका ठिकाना बहुत बड़ा है परन्तु वहाँ पर एक चूल्हा जलता हुआ नहीं दिखेगा। सारे काम कैसे चुपचाप..." "इतना ही नहीं हुजूर ?" तीसरा जासूस कहने लगा, "उस बड़ी खोपड़ी वाले हंबीर मामा का क्या करें? आसपास के गाँवों में उनसे कुत्तों के आगे कटी हुई मुर्गियों के टुकड़े डाले। कुत्तों को लालच देकर वाणों और लाठियों से उन्हें मार डाला।" "इसकी वजह ?" "कुत्ते ऐन मौके पर शोर न करने लगें और गाँव नींद से जागे नहीं।" "मरगट्टे चाहते क्या हैं?" बड़ा व्यापारी बाबरखान आगरा वाला पूछने लगा। सम्भाजी :: 243

"कल सवेरे सूरज की किरणें निकलने से पहले बुरहानपुर पर क़ब्जा जमाने की उनकी इच्छा दिखती है।" यह कहते हुए काकरखान का चेहरा काला पड़ गया। काकरखान के दरबार में बैठक आरम्भ हुई। शहर के बड़े व्यापारी, मुल्ला- मौलवी, खानदानी मुसलमान सभी एकत्र हुए। जैसे शीत लहर के आने पर सभी ठंड से काँपने लगते हैं, वैसी ही दशा सभी की हो रही थी। बहुतों की रुलाई छूट गयी। कुछ आपस में बात करने लगे— "यह मत भूलो! सम्भा के बाप शिवाजी ने सूरत को दो बार लूटा था। तब वह नगरी पूरी तरह नग्न हो गयी थी। अपना शहर यदि एक बार सफाचट किया तो फिर खड़ा नहीं हो पाएगा। कुछ भी कीजिए लेकिन हमें बचाइए।" कुछ व्यापारियों का धैर्य छूट गया था। व्यापारी, आढ़तिए और सुनार इतने घबरा गये कि उन्होंने मुहरों की थैलियाँ लाकर काकरखान के पैरों में रख दीं और उसका पैर पकड़कर सिसक-सिसककर रोने लगे— "कुछ भी करिए सरदार लेकिन हमें बचा लीजिए!....हमें बचाइए।" काकरखान कठोर, ईर्ष्यालु और लड़ाकू वृत्ति का था। इसीलिए औरंगजेब ने जजिया कर की वसूली के लिए उसे विशेष रूप से नियुक्त किया था। बुरहानपुर में केवल एक हजार की फौज थी। इतनी कम सेना से इतना बड़ा शहर कैसे बचाया जाये? समझ में नहीं आ रहा था। अपने बाड़े में एकत्र नगरवासियों के सामने काकर खान साहसपूर्वक खड़ा हुआ। उसने कहा, "बचाव के लिए हमारे पास बहुत थोड़ी फौज है। व्यापारी प्रतिष्ठानों के पास लगभग एक हजार सुरक्षाकर्मी हैं, उन्हें मेरे साथ कर दें। मैं इतना ही कहूँगा कि मैं अपने प्राण दे दूँगा किन्तु बुरहानपुर को बचाऊँगा।" काकरखान सभी को डूबती नाव को बचाने वाला कुशल नाविक लगा। निजी सुरक्षाकर्मियों और पहरेदारों को मिलाकर डेढ़ हजार की फौज तैयार की गयी। यह देखकर काकरखान का साहस बढ़ा। उसकी धमनियाँ गर्म हुईं। वह अपने दाँतों को भींचते हुए बोला, "चलिए, उठिए अब मराठों की राह देखने की बेवकूफी क्यों की जाए? चलिए हम थोड़ी हिम्मत करें। हिम्मत से छुपते-छुपाते जाएँ और आज रात में ही मराठों के खेमे पर हमला करें। आग लगाकर उनके डेरे-डंडे जलाकर खाक कर दें। उन शैतानों का सोते हुए ही कत्ल कर दें।" "वाहऽ, बहुत खूबऽऽ!" इकट्ठी हुई भीड़ चिल्ला उठी। मध्यरात्रि में बुरहानपुर का मुख्य द्वार चरमराया। एक हजार घुड़सवार और डेढ़ हजार पैदल साहस के साथ उस दरवाजे से बाहर निकले। सबसे आगे काकरखान का घोड़ा दौड़ रहा था। आरम्भ में पाँच-छः सौ कदम चलने के बाद 244 :: सम्भाजी

एक बन्द पड़ी खंदक मिली। कभी-कभी उसमें शहर की सुरक्षा के लिए लकड़ियाँ जलाई जाती थीं। वह खंदक एक बार पार हुई तो सेना रास्ते पर आ जाती। किसी तरह काकरखान अपने पाँच-छः सौ सिपाहियों को लेकर उस अँधेरी खंदक के मुख तक आया। आसपास उसे कुछ हिलता-डुलता-सा दिखाई पड़ा। एकाएक खंदक की हजार-हजार जीभें फूट पड़ीं। उसके भीतर छुपे मराठों के घोड़े हिनहिनाते हुए बाहर निकले। 'हर हर महादेव', 'शिवाजी महाराज की जय', 'सम्भाजी महाराज की जय' चारों ओर यही उद्घोष गूँजने लगा। आसपास के अँधेरे में कुछ दूरी पर छिपे चार हजार घोड़े और भी बाहर आ गये। बुरहानपुर वासियों के सामने मौत दिखाई देने लगी। मराठे, 'मारोऽऽ, मारोऽऽ', चिल्लाते हुए उन पर हल्ला बोल रहे थे। उनके घोड़े आगे बढ़ रहे थे। उनके हाथ की भवानी तलवार 'गर्र-गर्र' घूम रही थी। सबसे आगे सम्भाजी महाराज का सफेद रंग का घोड़ा था। सम्भाजीराजा ने सिर पर लोहे का शिरस्त्राण और जाली वाला फौलादी कवच पहना था। वे सामने शत्रुओं के सिर उसी तरह छाँट रहे थे मानो ज्वार की बालें काट रहे हों। राजा के साथ युद्ध लड़ने का अवसर पाने के कारण उनके साथियों में भी बड़ा उत्साह आ गया था। वे बड़ी दृढ़ता से अपने घोड़ों को आगे बढ़ा रहे थे। भागते हुए बुरहानपुरी घोड़ों पर मराठी घोड़े टूट पड़ रहे थे। रक्त की धाराएँ बह निकलीं। बाढ़ के प्रवाह की तरह मराठी सेना बुरहानपुरी सेना का पीछा कर रही थी। काकरखान किसी तरह जान बचाकर दीवार के भीतर आया। चार-पाँच सौ घुड़सवार मारे जा चुके थे। अनेक मनुष्य और जानवर घायल होकर रास्ते में घिसट रहे थे। वे पीड़ा से चिल्ला रहे थे। 'या अल्लाहऽ, या खुदाऽऽ' कहकर हाथ-पैर पटक रहे थे। बुरहानपुर के ऐश्वर्य का पूरा नक्शा शम्भूराजा के मस्तिष्क में स्पष्ट रूप से अंकित था। इसीलिए उन्होंने काकरखान का पीछा न करके अपने मदमस्त घोड़े को दरवाजे पर ही रोक लिया। इसी समय घोड़ा दौड़ाते हुए कवि कलश राजा के पास पहुँचे। चिराग के उजाले में उन्होंने बुरहानपुर का कच्चा नक्शा शम्भूराजा को दिखाया। अपने को आश्वस्त करने के लिए आँखें घुमाते हुए शम्भूराजा ने कहा, "अपने दो तीन सौ लड़कों को यहाँ दरवाजे पर भिड़ा दो। लड़ाई का नाटक चालू रहने दो। बाकी सभी सामने के रास्ते से उस बहादुरपुर की ओर चलें। द्रव्यों से खचाखच भरी तिजोरियाँ और सन्दूकें वहीं हैं। चलिए रात में ही दुकानें तोड़ना शुरू कर दीजिए।" "जैसी आज्ञा, राजन।" "और हाँ, किसी स्त्री या बाल-बच्चे को हाथ नहीं लगाना है। ध्यान रखें कि कम से-कम जनहानि हो। किन्तु यदि कोई शस्त्र लेकर आक्रमण करता है तो उसे तुरन्त आसमान दिखा दीजिए।" सम्भाजी :: 245

दो नींद में भी जाग कर सेनापति को अपना युद्ध धर्म पूरा करना पड़ता है। हंबीर मामा की फौज उस जंगल में विश्राम कर रही थी। किन्तु मामा अपने तम्बू में जाग रहे थे। मध्य रात्रि अँधेरे की काली चादर ओढ़े समाप्ति की प्रतीक्षा कर रही थी। इतने में कहीं दूर बुरहानपुर की ओर से 'हर हर महादेव', 'सम्भाजी महाराज की जय', 'शिवाजी महाराज की जय' ऐसी जोर की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। हंबीर मामा झटके से उठे, अपना कंबल सँभालते हुए बाहर आये। उसी समय उस रण गर्जना को सुनकर खेमे के सैनिक भाले तलवारें लिये मामा के पास इकट्ठे हो गये। सामने खड़े मराठा वीरों के उत्साह को देखकर हंबीरराव बोले, "बेवजह गड़बड़ मत करो। ये झूठे नारे दुश्मनों के हैं। उन्हें हमारे आने की खबर लग गयी होगी। इसीलिए वे होशियारी की चाल खेल रहे हैं। अपनी तलवारों को म्यानों में रखकर सब लोग हंबीर मामा के सामने चुपचाप खड़े थे। इसी समय दूसरी ओर से घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। थोड़ी ही देर में गश्ती सेना के बारह घोड़े हंबीरराव के तम्बू के बाहर आकर खड़े हो गये। घुड़सवार दूर से ही चिल्लाने लगे-"मामा साहबऽऽ, मामा साहब शम्भू महाराज! अपने शम्भू महाराजऽऽ!!" "शम्भू महाराज? कहाँ? कैसे आएँगे शम्भू महाराज?" मामा ने आश्चर्य से पूछा। हम अपनी आँख से देखकर आये हैं। शम्भू महाराज ने वहाँ बुरहानपुर पर आक्रमण भी कर दिया है!" "हाँ मामा! राजा के साथ आये दो घुड़सवारों ने बताया कि शम्भुराजा ने पाँच दिन और पाँच रात लगातार दौड़ लगाई। चार हजार घोड़ों को लेकर इतनी दूर की दौड़ लगाई है मामा!" दूसरा कहने लगा। यह बात सुनते ही हंबीरराव के रोंगटे खड़े हो गये। उनके सिर और मूँछों के बाल खड़े हो गये। दूसरे ही क्षण 'हर हर महादेव' का जयघोष करते हुए, पन्द्रह हजार घोड़े बुरहानपुर की दिशा में दौड़ पड़े। रात में ही हंबीरराव की फौज शम्भुराजा की फौज से मिल गयी। बहादुरपुर लूटना आरम्भ हुआ। दुकानदारों के दरवाजे टूटे। तिजोरियों पर घन चलने लगे। तलघरों के जमीनी रास्ते खुलने लगे। शम्भुराजा और हंबीरराव ने पूरे परिवार की नाकेबन्दी कर दी थी। पुराने बुरहानपुर में लड़के जूझ रहे थे। वहाँ युद्ध का नाटक चल रहा था। करणपुर में अनेक सिख सरदार रहते थे। उनके मुगलों के साथ मिल जाने की सम्भावना थी। यह सूचना पाते ही मराठों ने करणपुर को घेर लिया। सिख सरदारों को निःशस्त्र कर 246 सम्भाजी

दिया। शम्भूराजा ने शहर के चारों ओर सैनिकों की एक कड़ी बना दी थी। बुरहानपुर के आक्रमण की सूचना बाहर न जाये इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा था। इस लूट के आक्रमण में अनेक पुराने योद्धा थे। कोई बारह वर्ष पहले तो कुछ बीस वर्ष पहले शिवाजी महाराज के साथ सूरत लूट चुके थे। वैसे ही बेशुमार धन यहाँ मिल रहा था। इसके लिए शम्भूराजा और हंबीरराव ने अलग अलग गुट तैयार किये। बुरहानपुर के तलघरों में भी पारों और गहदालों से खुदाई की जा रही थी। जमीन के पेट में छिपी लक्ष्मी खोद-खोदकर बाहर निकाली जा रही थी। सरकती रात के साथ सब काम ठीक ठाक हो रहा था। पास के एक वृक्ष के नीचे सेवकों ने एक आपातकालीन ठिकाना तैयार किया। वहीं दो बड़े पत्थरों पर शम्भूराजा और हंबीरराव समाधानपूर्वक बैठे थे। राजा के पेट में भूख के कारण चूहे कूद रहे थे। इसका अनुमान होते ही रायप्पा मक्के के भुने हुए हरे दाने ले आया। ताजे भुने हुए सोंधे दाने खाते हुए मामा भांजे आमने सामने बैठे थे। अब उजाला होने लगा था। पेड़ों पर पंछी बोलने लगे थे। शम्भूराजा के थके हुए किन्तु उत्साहित चेहरे की ओर देखकर हंबीर मामा बोले, "क्यों भांजे साहब ! पीछे पीछे आने की इतनी जल्दी क्यों मचा दी ? आपको 'मामेरा' नहीं मिल पाएगा। ऐसा भय लग रहा था क्या ?" "भांजे को भी अपने कर्तव्य पालन में कोई कोरकसर नहीं रखनी चाहिए, मामा साहब!" शम्भूराजा ने हँसते हुए कहा, राजा का काम केवल हीरे जवाहरात पहनकर दरबार में घूमना भर नहीं है। उसे रणभूमि में रक्त बहाकर अपने साथियो को प्रोत्साहित और तरोताजा भी करना होता है। उन्हें सजग बनाना होता है।" शम्भू महाराज के इस उदगार पर मामा भांजे दोनों खिलखिलाकर हँसे। हंबीरराव बीच में ही उठ गये। वे शहर के चारों तरफ के नाकों की जाँच कर रहे थे। उनका प्रयत्न था कि किसी भी हालत में एक भी जासूस इस आक्रमण का समाचार लेकर बाहर न जा सके। मराठों की लूटपाट चालू थी। हीरे मोतियों से बोरे भरे जा रहे थे। उन्हें ले जाने के लिए आसपास के गाँवों से गधे खच्चर आदि इकट्ठे किए जा रहे थे। लूटपाट करते दो दिन बीत गये। दोपहर को रायप्पा शम्भूराजा के कान में कहने लगा, "महाराज एक बहुत अच्छी खबर है। अरबी घोड़ों का एक बहुत बड़ा व्यापारी उस्मान खान यहाँ आया हुआ है। उसके पास दो हजार बहुत ही उमदा जानवर हैं।" "क्या कह रहे हो ? कहाँ है वह ?" शम्भूराजा उत्साहित होकर खड़े हो गए। "यहीं दमदमपुर के बाग में। बहादुरखान के औरंगाबाद चले जाने के कारण वह व्यापारी उसी के आने की प्रतीक्षा कर रहा है।" सम्भाजी · 247

इतनी बड़ी अश्व सम्पत्ति इतने पास आकर रुकी हुई है, इसका पता चलते ही शम्भू महाराज का मन प्रफुल्लित हो गया। हंबीर मामा और गश्ती सेना को साथ लेकर शम्भूराजा वहाँ के लिए तुरन्त रवाना हो गये। दमदम बाग के उन घोड़ों को देखते हुए उनकी आँखें चकरा गयीं। इस तरह की चौड़ी पीठ वाले चुस्त दुरुस्त घोड़े उन्होंने कहीं देखे न थे। एक आसमानी रंग और बड़ी-बड़ी आयल वाले घोड़े की पीठ पर उन्होंने बड़े लाड़ से थाप मारी। सौदागर उस्मान महाराज के सामने काँपता हुआ खड़ा हो गया। उसकी ओर देखते हुए महाराज ने कहा, "ऐसी नस्ल, ऐसी जाति और ऐसी आँखें हमारे देश में तो सम्भव नहीं हैं। कहाँ से ले आये हो ये जानवर?" "अरबस्तान से।" "डरो नहीं, सीधे खड़े रहो। जैसे कोई शिल्पकार अपनी छेनी से शिल्पाकृति बनाता है वैसा ही जादू तुम्हारी उँगलियों में है।" शम्भूराजा से रहा नहीं गया। उन्होंने उस आसमानी रंग के घोड़े पर छलाँग लगाई। काठी और जीन न कसी होने पर भी वे घोड़े पर बैठ गये। लगाम खींचते ही घोड़ा आगे के पैर हवा में उछालते हुए हिनहिनाया। अपनी जगह पर ही पैर झाड़ते थैया-थैया नाचने लगा। उस्मान चिल्लाया- "राजा साहब ठहरिए! उसे दौड़ाइए नहीं, आप गिर जाएँगे, बहुत बदमाश जानवर है।" परन्तु शम्भू महाराज घोड़े के साथ अदृश्य हो गये। उनके पीछे-पीछे रायप्पा और अन्य गश्ती सैनिकों के घोड़े दौड़ पड़े। उस्मान अपना सिर पीटता वहीं खड़ा रहा। उसके गम्भीर चेहरे की ओर हंबीर मामा हँसते हुए देख रहे थे। बहुत देर बाद महाराज वापस लौटे। लौटने पर ऐसा लगा कि उस घोड़े और शम्भूराजा में जन्म जन्मान्तर की मित्रता हो गयी है। शम्भूराजा ने उस्मान से जानवरों की कीमत पूछी। पहले से ही घबराया हुआ उस्मान शम्भूराजा के पैरों में गिर पड़ा। दया की याचना करते हुए बोला- "मेरे आका मुझ गरीब का मजाक क्यों उड़ा रहे हैं? ये जानवर, ये पूरा तबेला मुफ्त में ले जाइए।" शम्भूराजा जोर से हँसे। हंबीर मामा ने भी सौदागर उस्मान को समझाया। अन्त में महाराज ने कहा- "जो उचित हो वह कीमत बताओ। हमें तुम्हारा एक भी जानवर मुफ्त में नहीं ले जाना है।" वह सौदागर मुस्कराया और साहस बटोरकर बोला- "अजी हुजूर आपने यहाँ दिन दहाड़े बुरहानपुर नगर को लूटा है और हमसे इन जानवरों की कीमत पूछ रहे हैं? हुजूर हमें चकमा देने का इरादा तो आपका नहीं है?" एक अभिजात हास्य शम्भूराजा के चेहरे पर तैर गया। उन्होंने कहा- "सौदागर, जिस परिश्रम और लगन से तुमने यह अश्वलक्ष्मी एकत्र की है, उसका 218 :: सम्भाजी

अपमान करने का हमारा कोई इरादा नहीं है।" शम्भूराजा ने सारे घोड़े खरीद लिये। अपने खेमे पर पहुँचकर उन्होंने खंडो बल्लाल से धीमे स्वर में कहा-"खंडोबा! यह मौदागर जितना माँगे उसे उतना द्रव्य दीजिए। बुरहानपुर की लूट में से नहीं अपने खजाने से ही यह द्रव्य दीजिए।" महाराज के उद्गार को सुनकर खंडो बल्लाल और हंबीर मामा ठठाकर हँसे। तीसरे दिन सबेरे औरंगाबाद की ओर हरकारे आये। वे शम्भू महाराज को बताने लगे-"बहादुरखान कोकलताश को खबर लग गई है। भतीजी की शादी छोड़कर अपनी फौज के साथ इस ओर घूम पड़ा है। अपने फौजियों और घोड़ों को पानी के लिए भी हकने नहीं दे रहा है। लूट का द्रव्य इतना अधिक था कि उन्हें ढोकर ले जाने के लिए गधे और खच्चर कम पड़ रहे थे। शीघ्रता से बाँधा-बाँधी आरम्भ हो गयी।" दोपहर में ही सामानों से लदे गधे बुरहानपुर से बाहर निकलने लगे। उनकी पीठ पर एक करोड़ मोहरों की दौलत थी। आसपास के नागरिकों में काकरखान के प्रति बड़ा क्षोभ था। जजिया कर की वसूली में उसने हिन्दुओं को बहुत सताया था। उससे भेंट किये बिना शम्भूराजा को बाहर निकलना अच्छा न लगा। बुरहान के महल से पकड़कर मराठा सैनिक काकरखान को पकड़कर शम्भूराजा के पाम ले आये। डर के मारे वह पहले ही अधमरा हो गया था। राजा के हुक्म से उसके मखमली लिबास को उतारा गया। सैनिकों ने उसे एक पेड़ से बाँध दिया। कुछ लोगों ने उसे दो चार हाथ मारा भी। शम्भूराजा ने उसे चेतावनी देते हुए कहा, "फिर से अत्याचार करेगा तो याद रखना!" बुरहानपुर को लूटकर मामा भांजे प्रसन्नतापूर्वक वापस आ रहे थे। रास्ते में बहादुरखान कोकलताश के साथ मुठभेड़ की सम्भावना थी। इसके अर्तारक्त सूरत के बाद मराठे जिस जंगली रास्ते से गये थे उसका मुगलों को पता था। इसलिए इस बात की चिन्ता थी कि बिना किसी अवरोध के यह लूट की सम्पत्ति को लेकर कैसे जाया जाय? दुश्मन की ओर से अचानक हमला हो सकता था। इसलिए सेना में व्यूह रचना की आवश्यकता थी। इसलिए मामा भांजे ने मिलकर बीस हजार सेना को चार चार हजार की संख्या के हिसाब से पाँच भागों में बाँट दिया। हंबीरराव ने कहा, "शम्भूराजा! मेरा विचार है कि औरंगाबाद जीतकर ही हम रायगढ़ आएँ। दस-बारह हजार फौज मेरे लिए पर्याप्त होगी।" "मामाजी मेरे साथ पाँच हजार फौज पर्याप्त है।" शम्भूराजा ने कहा। "इतनी कम फौज के साथ जान जोखिम में नहीं डाला करते, शम्भू बेटे!" मामा ने अपनी राय व्यक्त की। निश्चित किया गया कि लूट का अधिकांश हिस्सा रास्ते में साल्हेर के किले सम्भाजी :. 249

में रख दिया जाए। वापस लौटने के लिए धरण गाँव-चोपड़ा का मार्ग ही सुविधाजनक था। किन्तु, इस बात की सम्भावना थी कि उस मार्ग में बहादुरखान कहीं भी भुजंग की तरह सामने आ जाएगा। उस दिन दोपहर को चोपड़ा से दस कोस की दूरी पर बहादुरखान मोर्चा बाँधकर बैठा हुआ था। वह मराठों को कत्ल कर देना चाहता था। बहुत समय तक प्रतीक्षा करते करते वह थक गया। अन्त में दोपहर को उस जंगल में घोड़ों की टापें सुनाई पड़ने लगीं। केवल पाँच-सात सौ मराठी घुड़सवारों को देखकर बहादुरखान आश्चर्य चकित हो गया। घोड़ों के सामने से निकलते ही बहादुरशाह के सैनिक उन पर टूट पड़े। घुड़सवारों ने हाथ ऊपर कर दिये। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगे— "वकीली सरंजामऽ, वकीली सरंजामऽऽ।" बहादुरखान के सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। सबके बीच ऊँट पर बैठे वकीलों को बहादुरखान के सामने प्रस्तुत किया गया। एक वकील थे मुल्ला काजी हैदर, दूसरे वकील थे जोत्याजी केसकर। बहादुरखान ने उन पर अपनी नजरें गड़ाकर पूछा—"कहाँ चले?" "भागानगर के लिए, हुजूर! कुतुबशाह के लिए शम्भूराजा का पत्र ले जा रहे हैं।" बहादुर खान ने उस पत्र को आँखें फाड़ फाड़कर देखा। जासूसों को बुलाकर शम्भूराजा के हस्ताक्षर को मत्यापित कराया। इन दोनों वकीलों ने शपथपूर्वक कहा, "चोपड़ा धरण गाँव के रास्ते से संभाजी महाराज आएँगे ही क्यों? क्या वे यह नहीं जानते कि आपको इस रास्ते का पता है?" "तो फिर किस रास्ते से निकले वे?" "शायद जलगाँव या औरंगाबाद—पता नहीं, किन्तु यहाँ तो व फटकेंगे नहीं।" समय के बीतने के साथ भ्रम भी बढ़ने लगा। मुल्ला काजी हैदर ने कहा, "मैं तो आपकी ही कौम का हूँ। मुझे भी एक सरदार के रूप में अपनी फौज में भर्ती कर लीजिए।" जोत्याजी ने बात को आगे बढ़ाया—"खान साहब हमारे नेता पालकरजी ने क्या इस्लाम धर्म नहीं स्वीकार किया था? मेरे जैसे देहाती आदमी को यदि सरदार बनाने के लिए तैयार हों तो मैं भी इस्लाम धर्म स्वीकार कर लूँ।" अँधेरा होने लगा। इसी समय नीचे की घाटी में घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। बहादुरखान सावधान हो गया। उसने अपने सैनिकों को हुक्म दिया—"बिना मेरे संकेत के आक्रमण नहीं करना।" मराठे घुड़सवार टेकड़ी चढ़कर झपाटे से ऊपर आ गये। बहादुरखान के सैनिक पेड़ों के पीछे छुपे, साँस रोके सामने का दृश्य देख रहे थे। मराठे घुड़सवार 250 . सम्भाजी

खाली हाथ खड़े। उनके पास लूट का सामान तो क्या कोई सादी पोटली तक न थी। बहादुर खान ने उन तीन हजार घुड़सवारों को निर्विघ्न रूप से जाने दिया। जोत्याजी उत्साहपूर्वक बोले, "खान साहब! मैंने जो कहा था वह सच ही कहा था न? शम्भुराजा कोई पागल है क्या जो इस रास्ते से जाएँ?" बहादुरखान कोकल्ताश को विश्वास हो गया कि लूट का माल लेकर जाने वाले मराठे ऐदलाबाद की तरफ मे ही गये होंगे। शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करना, लूट का माल उनसे हस्तगत करना, औरंगजेब के क्रोध से अपनी जान बचाना जैसे अनेक विचार बहादुरखान के मन में एक साथ उठ रहे थे। उसका दिमाग तड़फड़ा रहा था। वह तीर की तरह ऐदलाबाद की ओर दौड़ने लगा। शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करने की धुन में उसे पता ही नहीं चला कि वकील बने काजी हैदर और जोत्याजी कब और कहाँ गायब हो गये? उसका ध्यान तो लूट के माल पर केन्द्रित था। बहादुरखान के रास्ते से हट जाने का विश्वास हो जाने पर, रात के अँधेरे में इधर उधर फैले जासूसों ने आपस में मंकेतों से ममाचार को आगे बढ़ाया। दोपहर को जहाँ पर बहादुरखान मोर्चा बाँधे बैठा था, वहीं से मराठों की मुख्य फौज तीन घंटे के भीतर आगे निकल गयी। शम्भुराजा और हंबीर मामा अपने अपने दलों के साथ लूट का माल लेकर उसी चोपड़ा मार्ग से माल्हेरे के बलशाली किले की ओर चल पड़े। मध्य रात्रि बीत चुकी थी। घोड़े पहाड़ से नीचे गिरती जलधारा की भाँति भाग रहे थे। अत्यधिक परिश्रम के कारण घोड़ों और सैनिकों का बुरा हाल हो रहा था। उनका रक्त गर्म हो गया था। बाहर कड़ाके की ठंडक होने पर भी घोड़े और सिपाही अपने भीतर गर्मी महसूस कर रहे थे। मनुष्यों और जानवगे दोनों को आगे बढ़ने के लिए जोर लगाना पड़ रहा था। मैनिकों के साथ साथ लूट के माल का बोझा भी घोड़ों की पीठ पर था। दो पहाड़ों के बीच की घाटी से घोड़े चल रहे थे। सवेरा होने से पहले आगे का रास्ता पकड़ने का शम्भुराजा का विचार था। इसी समय मानाजी की दृष्टि पास की पहाड़ी के दो ऊँचे कलशों की ओर गयी। उन्होंने कहा, "महाराज, यह सामने की पहाड़ी मार्कंडा किले का पिछला हिस्सा है। यह सप्तशृंगी माता को पहाड़ी है।" राजा ने घोड़े की लगाम खींची। उन्होंने कहा, "बाकी मेना को आगे जाने दीजिए। हमारे साथ डेढ़ हजार घोड़े पर्याप्त होंगे।" "यानी? अब इस घुप्प अँधेरी रात में कहाँ जाना है?" मानाजी ने पूछा। "मतलब यह कि सप्तशृंगी के दर्शन के लिए जाएँगे। बुरहानपुर की ओर निकलते समय मैंने देवी से सहायता के लिए याचना की थी। अब उनकी उपेक्षा मम्भाजी 251