छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखाली हाथ खड़े। उनके पास लूट का सामान तो क्या कोई सादी पोटली तक न थी। बहादुर खान ने उन तीन हजार घुड़सवारों को निर्विघ्न रूप से जाने दिया। जोत्याजी उत्साहपूर्वक बोले, "खान साहब! मैंने जो कहा था वह सच ही कहा था न? शम्भुराजा कोई पागल है क्या जो इस रास्ते से जाएँ?" बहादुरखान कोकल्ताश को विश्वास हो गया कि लूट का माल लेकर जाने वाले मराठे ऐदलाबाद की तरफ मे ही गये होंगे। शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करना, लूट का माल उनसे हस्तगत करना, औरंगजेब के क्रोध से अपनी जान बचाना जैसे अनेक विचार बहादुरखान के मन में एक साथ उठ रहे थे। उसका दिमाग तड़फड़ा रहा था। वह तीर की तरह ऐदलाबाद की ओर दौड़ने लगा। शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करने की धुन में उसे पता ही नहीं चला कि वकील बने काजी हैदर और जोत्याजी कब और कहाँ गायब हो गये? उसका ध्यान तो लूट के माल पर केन्द्रित था। बहादुरखान के रास्ते से हट जाने का विश्वास हो जाने पर, रात के अँधेरे में इधर उधर फैले जासूसों ने आपस में मंकेतों से ममाचार को आगे बढ़ाया। दोपहर को जहाँ पर बहादुरखान मोर्चा बाँधे बैठा था, वहीं से मराठों की मुख्य फौज तीन घंटे के भीतर आगे निकल गयी। शम्भुराजा और हंबीर मामा अपने अपने दलों के साथ लूट का माल लेकर उसी चोपड़ा मार्ग से माल्हेरे के बलशाली किले की ओर चल पड़े। मध्य रात्रि बीत चुकी थी। घोड़े पहाड़ से नीचे गिरती जलधारा की भाँति भाग रहे थे। अत्यधिक परिश्रम के कारण घोड़ों और सैनिकों का बुरा हाल हो रहा था। उनका रक्त गर्म हो गया था। बाहर कड़ाके की ठंडक होने पर भी घोड़े और सिपाही अपने भीतर गर्मी महसूस कर रहे थे। मनुष्यों और जानवगे दोनों को आगे बढ़ने के लिए जोर लगाना पड़ रहा था। मैनिकों के साथ साथ लूट के माल का बोझा भी घोड़ों की पीठ पर था। दो पहाड़ों के बीच की घाटी से घोड़े चल रहे थे। सवेरा होने से पहले आगे का रास्ता पकड़ने का शम्भुराजा का विचार था। इसी समय मानाजी की दृष्टि पास की पहाड़ी के दो ऊँचे कलशों की ओर गयी। उन्होंने कहा, "महाराज, यह सामने की पहाड़ी मार्कंडा किले का पिछला हिस्सा है। यह सप्तशृंगी माता को पहाड़ी है।" राजा ने घोड़े की लगाम खींची। उन्होंने कहा, "बाकी मेना को आगे जाने दीजिए। हमारे साथ डेढ़ हजार घोड़े पर्याप्त होंगे।" "यानी? अब इस घुप्प अँधेरी रात में कहाँ जाना है?" मानाजी ने पूछा। "मतलब यह कि सप्तशृंगी के दर्शन के लिए जाएँगे। बुरहानपुर की ओर निकलते समय मैंने देवी से सहायता के लिए याचना की थी। अब उनकी उपेक्षा मम्भाजी 251