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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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में रख दिया जाए। वापस लौटने के लिए धरण गाँव-चोपड़ा का मार्ग ही सुविधाजनक था। किन्तु, इस बात की सम्भावना थी कि उस मार्ग में बहादुरखान कहीं भी भुजंग की तरह सामने आ जाएगा। उस दिन दोपहर को चोपड़ा से दस कोस की दूरी पर बहादुरखान मोर्चा बाँधकर बैठा हुआ था। वह मराठों को कत्ल कर देना चाहता था। बहुत समय तक प्रतीक्षा करते करते वह थक गया। अन्त में दोपहर को उस जंगल में घोड़ों की टापें सुनाई पड़ने लगीं। केवल पाँच-सात सौ मराठी घुड़सवारों को देखकर बहादुरखान आश्चर्य चकित हो गया। घोड़ों के सामने से निकलते ही बहादुरशाह के सैनिक उन पर टूट पड़े। घुड़सवारों ने हाथ ऊपर कर दिये। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगे— "वकीली सरंजामऽ, वकीली सरंजामऽऽ।" बहादुरखान के सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। सबके बीच ऊँट पर बैठे वकीलों को बहादुरखान के सामने प्रस्तुत किया गया। एक वकील थे मुल्ला काजी हैदर, दूसरे वकील थे जोत्याजी केसकर। बहादुरखान ने उन पर अपनी नजरें गड़ाकर पूछा—"कहाँ चले?" "भागानगर के लिए, हुजूर! कुतुबशाह के लिए शम्भूराजा का पत्र ले जा रहे हैं।" बहादुर खान ने उस पत्र को आँखें फाड़ फाड़कर देखा। जासूसों को बुलाकर शम्भूराजा के हस्ताक्षर को मत्यापित कराया। इन दोनों वकीलों ने शपथपूर्वक कहा, "चोपड़ा धरण गाँव के रास्ते से संभाजी महाराज आएँगे ही क्यों? क्या वे यह नहीं जानते कि आपको इस रास्ते का पता है?" "तो फिर किस रास्ते से निकले वे?" "शायद जलगाँव या औरंगाबाद—पता नहीं, किन्तु यहाँ तो व फटकेंगे नहीं।" समय के बीतने के साथ भ्रम भी बढ़ने लगा। मुल्ला काजी हैदर ने कहा, "मैं तो आपकी ही कौम का हूँ। मुझे भी एक सरदार के रूप में अपनी फौज में भर्ती कर लीजिए।" जोत्याजी ने बात को आगे बढ़ाया—"खान साहब हमारे नेता पालकरजी ने क्या इस्लाम धर्म नहीं स्वीकार किया था? मेरे जैसे देहाती आदमी को यदि सरदार बनाने के लिए तैयार हों तो मैं भी इस्लाम धर्म स्वीकार कर लूँ।" अँधेरा होने लगा। इसी समय नीचे की घाटी में घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। बहादुरखान सावधान हो गया। उसने अपने सैनिकों को हुक्म दिया—"बिना मेरे संकेत के आक्रमण नहीं करना।" मराठे घुड़सवार टेकड़ी चढ़कर झपाटे से ऊपर आ गये। बहादुरखान के सैनिक पेड़ों के पीछे छुपे, साँस रोके सामने का दृश्य देख रहे थे। मराठे घुड़सवार 250 . सम्भाजी