छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 266, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंछह सूर्य डूबने लगा था। ढलते सूर्य की किरणें रायगढ़ पर पड़ रही थीं। भगवा झंडे की लम्बी छाया प्रकाश के ऊपर फैल रही थी। वस्तुतः महाराज अपने निजी महल में जाने की जल्दी में थे। उसी समय प्रह्लाद निराजी अन्दर आये और महाराज का अभिवादन करके कहने लगे- “महाराज पुर्तगालियों के वकील पिछले तीन दिनों से आपसे मिलने की प्रतीक्षा में बैठे हैं। गढ़ के ऊपर की हवा उन फिरंगियों से सहन नहीं हो रही थी। वे जर्जर मुर्गी की तरह बेहाल हो रहे थे।” शम्भूमहाराज हँस पड़े। उन्होंने कवि कलश की ओर देखते हुए कहा, “अपने वकील भी उनके साथ आने वाले थे न?” “हाँ, राजन! अपने रामजी ठाकुर और येसाजी गम्भीरराव आपसे मिलने के लिए।” “तो फिर भेजो सभी को अन्दर।” प्रह्लाद निराजी बाहर गये और दो हट्टे-कट्टे पुर्तगाली अधिकारी महाराज के सामने आकर खड़े हो गये। उन्होंने लाल रंग का लिबास धारण किया था। उनके साथ दुभाषिया रामचन्द्र शेणवी भी था। इन पुर्तगालियों ने महाराज को नमन किया। सामान्य कुशलक्षेम की बात हुई। ये पुर्तगाली कवि कलश की ओर देखकर कुछ दुविधा में पड़ गये थे। महाराज से अगला प्रश्न पूछते हुए उस वकील ने कहा- “महाराज, हम अपने वाइसराय की ओर से एक महत्त्वपूर्ण सन्देश ले आये हैं। हमसे एकान्त में बात करना चाहते हैं।” कवि कलश की ओर देखकर शम्भुराज ने खुलकर हँसते हुए कहा- “जो कोई सन्देश हो उसे मुक्त होकर पढ़ो। कवि कलश हमारे अपने ही हैं। उनसे कुछ भी छुपाने की आवश्यकता नहीं है।” शम्भू महाराज की अनुमति मिलते ही रामचन्द्र शेणवी सन्देश का भाषान्तर करते हुए महाराज को सुनाने लगे- “प्रिय छत्रपति संभाजी महाराज “महाराज, इसके पहले हम डिचोली के सूबेदार की शिकायत कर चुके हैं। मोरोदादा नाम का आपका यह सूबेदार एक धूर्त और असंस्कृत व्यक्ति है। वह प्रजा के साथ बहुत छल करता है। प्रजा से पैसा वसूल कर स्वयं का पेट भरता है और राज्य की हानि करता है। इतनी-सी नाराजी मे आपको स्पष्ट रूप से समझाने का प्रमुख कारण यह है कि यह खड्रम व्यक्ति हमारी और आपकी मैत्री में दरार डालता 264 .. सम्भाजी