भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

है। किन्तु ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति के बारे में इतनी गम्भीर शिकायत करने पर भी उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होगी। इसका कारण यह है कि मोरोदादा ने आपके दरबार के एक प्रधान कर्मचारी से अपना गहरा सम्बन्ध बना रखा है। वह मोरोदादा को बहुत प्यार करता है। इसलिए ये महोदय प्रजा को, राजा को या किसी को भी कुछ नहीं समझते।" शम्भूराजा ने यह सन्देश शान्त भाव से सुन लिया। कुछ और भी बातें हुईं। पुर्तगाली शिष्ट मंडल जाने लगा तभी महाराज ने गम्भीर स्वर में पूछा- "मोरोदादा जी राव के सिर पर वरदहस्त रखने वाला मेरे दरबार का प्रधान अधिकारी कौन है?" "हमें पता नहीं।" पुर्तगाली प्रतिनिधि ने कहा। गोवा वाले वकीलों पर नजर टिकाकर शम्भू महाराज ने पूछा- "क्यों ठाकुर? क्यों येसाजीराव? उस प्रधान अधिकारी का नाम तुम तो बताओगे?" उन दोनों ने नकार में गर्दन हिलाई, किन्तु उनके चेहरे उस समय बहुत तनावग्रस्त दिखे। शम्भू महाराज क्रुद्ध होकर बोले, "तुम लोग उस भले आदमी का नाम लेने मे क्यों हिचकिचा रहे हो? इसका मतलब तो यह हुआ कि वह अधिकारी मुझसे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।" अभिवादन करते हुए पुर्तगाली बाहर निकल गये। शम्भूराजा ने कवि कलश से पूछा- "डिचोली और कुडाल के पास अपने बारूद के कारखाने अच्छी तरह चल रहे हैं न?" "राजन! आप डिचोली की ओर से दो महीने पहले ही लौटकर आये हैं। गोले-बारूद का निर्माण अच्छी तरह हो रहा है। अब सम्भव है कि गोले-बारूद के लिए हमें डचों और अँग्रेजों पर अवलम्बित न रहना पड़े।" दरबार का कार्य समाप्त करके शम्भू महाराज अपने महल की ओर निकले। परन्तु पुर्तगालियों का सन्देश उन्हें व्यथित कर रहा था। उनके मस्तिष्क में एक ही प्रश्न बार-बार उठ रहा था कि अपने दरबार का वह कौन-सा अधिकारी है जो मोरोदादा से हाथ मिलाकर प्रजा का शोषण कर रहा है। मोरोदादा के सम्बन्ध में प्रजा के द्वारा भी यदा कदा शिकायत की गयी थी। किन्तु उनके ऊपर वरदहस्त रखने वाला यह प्रधान अधिकारी कौन है? अपने निजी महल के दरवाजे पर शम्भू महाराज बेचैनी से टहलने लगे। उन्होंने कुछ सेवकों को काले हौज के पास बने दूतावास की ओर भेजा। महाराज ने रात को ही रामचन्द्र शेणवी को बुलाया। शेणवी के आने की सूचना पहरेदारों ने दी। यह सूचना पाते ही शम्भू महाराज ने कवि कलश की ओर संकेत किया। कवि कलश भीतर की दालान में जाकर आड़ में बैठ गये। अब बैठक में शम्भू महाराज अकेले थे। राजा ने शेणवी से सीधा प्रश्न किया- "दरबार में शंका सम्भाजी :: 265