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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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की एक बड़ी गठरी छोड़कर आप लोग निकल गये, किन्तु हमारी तो भूख और नींद ही उड़ गयी। बताइए मोरोदादा जैसे भ्रष्ट सूबेदार को अभयदान देने वाला हमारे दरबार में कौन है?" महाराज का प्रश्न तलवार की धार की तरह सीधा था। इसलिए बिना कोई टाल-मटोल किए, सिर झुकाकर रामचन्द्र शेणवी बोले- "बारूद के कारखानों की जाँच और कर वसूली के लिए जो आजकल बार बार गोवा की ओर जाते हैं, वही।" "कौन? कवि कलश?" "वे अकेले कैसे जाएँगे महाराज? वे तो आपकी छाया हैं।" "फिर...? अपने अ...?" "हाँ महाराज, अण्णाजी दत्तो ही। मोरोदादा और उनमें बहुत घनिष्ठ प्रेम है। अण्णाजी ने अपना काला धन सावंतवाड़ी और कोंडा के व्यापारियों के पास दुगुने ब्याज पर जमा किया है। जामिनदार के रूप में वहाँ का सारा व्यवहार मोरो दादा ही देखते हैं।" शम्भूराजा के अनुमान पर शेणवी ने पक्की मुहर लगा दी। शेणवी के चले जाने के बाद महाराज का कवि कलश के साथ विचार-विमर्श चलता रहा। शम्भूराजा ने हँसते हुए कहा, "मेरा अनुमान एकदम ठीक निकला। क्योंकि इतनी क्रूर कठोरता अभी किसी अन्य में नहीं समा पायी है।" "राजन! इतने बड़े प्रधान अधिकारी के विषय में मैं क्या कह सकता हूँ?" "बोलना ही नहीं है? रायगढ़ की गद्दी हम कोई भाँग के नशे में नहीं चला रहे हैं? मुझे सारी बातों का पता है। अण्णाजी के कोई एक ही मोरोदादा नहीं हैं। ऐसे अनेक भक्त उन्होंने लाभ वाली जगहों पर नियुक्त कर रखे हैं।" शम्भू महाराज कहने लगे- "पिताजी के राज्याभिषेक के पहले ही जीजा माता के साथ जब मैंने दरबार में कदम रखा था, तभी मैंने अपने खजाने को खाली करने वाले छिद्रों को पहचान लिया था। तब मेरी उम्र केवल सत्रह वर्ष थी। उस समय तरुणाई का नशा था। उसी के आवेश में हम पिताजी के सामने कहते थे- 'ये सारे लुच्चे और धोखेबाज हैं। उसी समय से ये लोग मुझसे नाराज रहने लगे।" कवि कलश ने शान्त स्वर में कहा, "राजन इस समय पुर्तगाली वाइसराय के साथ अपना सम्बन्ध वैसे ही बनाए रखना होगा।" इसलिए वस्तुस्थिति की पूरी छानबीन करके मोरोदादा पर तत्काल कार्यवाही करनी होगी। वैसे यह वाइसराय भी इतने भरोसे का नहीं है। कल को दिल्ली वाले अपने ऊपर आक्रमण करें तो इसकी सही परीक्षा हो जाएगी। किन्तु अभी उसे मैत्री के धोखे में रखना ही ठीक होगा।" कवि कलश अपने घर जाने के लिए महाराज से आज्ञा माँगने लगे। शम्भू 266 :: सम्भाजी