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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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बगल में बैठे रांगड़े हिरोजी से अण्णाजी ने कहा, "हिरोजी, तू कुछ भी कह, शिवाजी के जमाने में हम आठ प्रधानों का कोई स्थान था। आज वह सारा सम्मान और दर्जा चला गया।" "मारा कार्य भार सम्भाजी और येसूबाई के हाथ में चला गया है। दूसरे किसी के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं रखा है।" सम्भाजी दत्तो ने कहा। "भूल कर रहे हो सोमा जी। अरे यहाँ के नाटक का तीसरा पात्र तो महाजालिम है। हमारे स्वराज्य की छाती पर सवार वह जनम-जनम का शाक्तपन्थी पिशाच। उसे कैसे भूलते हो?" धोती से हवा करते हुए अण्णाजी ने कहा। राहुजी सोमनाथ के बीच में ही हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, "इसका मतलब यह कि पिछले पन्द्रह दिनों में पन्हालगढ़ पर जो घटनायें घटीं उसका आपको पता नहीं है।" "क्यों जी? क्या हो गया?" सबने एक साथ पूछा। "वह हरसूल का कमबख्त सैफुद्दीन, मतलब अपना गंगाधर कुलकर्णी- " "उसका क्या हुआ?" अण्णाजी भयभीत होकर पूछने लगे। "वह सैफुद्दीन गंगाधर यहाँ गढ़ पर कुत्ते की तरह भटक रहा था और अन्त में शम्भुराजा से जाकर मिला।" महाराज से कहने लगा—"'गरीब ब्राह्मण को फिर हिन्दू धर्म में ले लीजिए।" राहुजी ने बताया। "फिर राजा ने क्या कहा?" "अण्णाजी वह तो हिन्दुओं के देवता बनने निकले हैं। बहुत बड़े धर्मवीर बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा, "बजाजी निम्बालकर और नेताजी पालकर का यदि शुद्धीकरण हो सकता है तो इस गरीब ब्राह्मण को क्यों सताते हो?" अण्णाजी का चेहरा देखने लायक हो गया। सोमाजी ने तो अपने सिर की पगड़ी उतार ली और क्रोध में चार-पाँच बार अपना सिर पीटा। उन्होंने कहा, "शिव, शिव, शिव ! सुना आप लोगों ने ? गंगा के किनारे का यह भिखारी, पेशे से पुरोहित और उसका ऐसा व्यवहार ? अब यह दुष्ट हमें धर्मशास्त्र और शुद्धीकरण का मतलब समझाने निकला है ? इस तरह के पाप पूर्ण जीवन जीने से तो अच्छा है, पहाड़ की चोटी से कूदकर आत्महत्या कर लेना। सैफुद्दीन गंगाधर ने सोमाजी से वादा किया था कि यदि उसे पुनः हिन्दू धर्म में ले लिया जाएगा तो वह अपने अधिकारी के चार एकड़ का नारियल का बाग सोमाजी को सौंप देगा। यह एक प्रकार की रिश्वत थी। अण्णाजी की पीड़ा अलग थी। डिचोली के मोरोदादा पर शम्भू महाराज ने अभियोग लगाया था। इसलिए अण्णाजी चोरी से चलने वाले आर्थिक सम्बन्ध धोखे में आ गये थे। मोरोपन्त दादा के हवाले से सावंतबाड़ी और पणजी में दिया गया उनका गुप्त धन लगभग डूब ही सम्भाजी :: 275