छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो हो गया वही बहुत है। " शिवाजी महाराज बड़े संकट में पड़ गये। गोदू के प्रति महाराज के मन में बड़ी दया उमड़ रही थी। यदि दूसरा अवसर होता तो महाराज उसकी बहादुरी के लिए अपने गले का रत्नहार उसे पहना देते। किन्तु वाड़कर पिता पुत्र के अपराधी सिद्ध होने पर भी वे अण्णाजी के रिश्तेदार थे। पूछताछ पूरी होने तक अपने अष्टप्रधानों में से किसी का भी अपमान होना महाराज की नीति के विरुद्ध था। वे किसी भी अधिकारी को अपमानित नहीं होने देते थे। किन्तु गोदू का क्या किया जाय ! महाराज इस बात को लेकर बहुत चिन्तित थे। अण्णाजी गोदू को अपने घर ले जाना चाहते थे। किन्तु उनके घर के लिए तैयार न थी। महाराज ने अन्त में निर्णय सुनाते हुए कहा, "गोदू छोटी बच्ची नहीं है। वह अपने बारे में स्वयं निर्णय ले लेगी।" महाराज अपना निर्णय सुनाकर मुक्त हो गये। किन्तु गोदू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वो कहाँ जाय ? हवा की चपेट में आकर जिस तरह कोई सूखा पत्ता अटक जाता है उसी तरह गोदू भी कुछ समय तक खड़ी रही। उसने पहले शम्भुराजा की प्रशान्त और गम्भीर मुद्रा की ओर देखा। उसकी दृष्टि युवराज की बगल में खड़ी येसूबाई पर पड़ी। येसूबाई भगवान की मूर्ति के सामने जलती दीप शिखा की तरह तेजस्विनी, ममता की मूर्ति, स्वभाव से शीतल और कोमल मन की दिखाई पड़ रही थी। गोदू एकाएक भाव विभोर हो उठी। वह दौड़कर येसूबाई की बाँहों में समा गयी। वह व्याकुल होकर बोली, "युवराज्ञी आप ही मुझे अपने आँचल में सम्भाल लो। आपकी दासी बनकर मैं आपकी हर आज्ञा मानने और हर काम करने के लिए तैयार हूँ।" जिसके कारण येसू के पति पर लांछन लगाया था वही उसके गले पड़ रही थी। अचानक घटित इस प्रसंग से सभी संकट का अनुभव कर रहे थे। गोदू का शरीर सहायता प्रतीक्षा में थर थर काँप रहा था। येसू ने गोदू के चेहरे पर ममता से इस तरह हाथ फेरा मानो मक्खन के पिंड को सहला रही हों। युवराज्ञी ने बड़ी बहादुरी से कहा, "ठीक है गोदू! जब तक तेरी कोई समुचित व्यवस्था नहीं हो जाती तू हमारे अन्तःपुर में रह सकती है।" एक नौकर को आदेश देते हुए येसूबाई ने कहा, "इसको लेकर मेरे महल में जाओ। मैं भी पीछे आ रही हूँ।" पन्त का विचार था कि शिवाजी महाराज येसूबाई के इस व्यवहार में हस्तक्षेप करेंगे किन्तु महाराज ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत उन्होंने मुल्ला हैदर को बाघ दरवाजे के पास घटी घटना अच्छी तरह 26 सम्भाजी