छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपनी जाँच का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत कर दिया था। किले के ऊपर के बारूदखाने से तोप के गोले बाघ दरवाजे पर ही नहीं कहीं भी नहीं भेजे गये थे। उसी दोपहर में काले हौज के पास सन्दिग्ध अवस्था में देखे गये छः-सात लोगों को गड़करी कान्होंजी भांडवलकर की बटालियन ने रोका था। ये चोर अपने को बचाने के लिए भवानी कड़ा की ओर भागे। उन्होंने उस भयानक कड़े के ऊपर से नीचे की करौंदों की झाड़ियों में छलाँग लगायी। उस जगह पर अभी भी उनकी तलाश जारी है। थोड़ी देर में कान्होंजी राव स्वयं दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने शिवाजी महाराज को बताया—"महाराज! उन सन्दिग्ध लोगों में से चार जनों के शव मिले हैं। लिबास को देखने से वे बाहर से आये हुए पठान दिखाई पड़ते हैं। इससे पहले इन्हें इस क्षेत्र में किसी ने नहीं देखा।" शिवाजी महाराज के चेहरे पर उभरी तनाव की रेखायें ढीली पड़ गयीं! उन्होंने अपनी चमकती आँखों से गोदू की ओर कृतज्ञता से देखा। महाराज को विश्वास हो गया था कि शत्रुओं ने एक बहुत बड़ी साजिश का जाल बुना था। महाराज शम्भूराजा की ओर रुख करके बोले, "इतनी जरूरी खबर थी तो बाघ दरवाजे की ओर दौड़ने से पहले आपने मुझे क्यों नहीं सूचित किया?" "वहाँ दौड़कर पहुँचना और तोपों को नाकाम करके मराठों के प्राणों की रक्षा करना मेरा प्रथम कर्तव्य था, पिताजी।" शम्भूराज ने उत्तर दिया। शिवाजी महाराज की तीखी नजर वाड़कर पिता-पुत्र पर पड़ी। वे दोनों बहुत घबरा रहे थे। वे हकलाते हुए महाराज की ओर देख रहे थे। सारा प्रसंग बता रहा था कि दाल में कुछ काला था। दाल में काले का अनुमान अण्णाजी को भी हो गया था। उनकी शुरू में चढ़ी हुई त्योरी अपने आप ढीली हो गयी। सभी की नजर महाराज की ओर उठी। बड़े महाराज की नीर-क्षीर विवेकीवाणी फूटी— "अण्णाजी पन्त! यह घटना जटिल होती जा रही है। इसकी पूरी जाँच करना आवश्यक है। कान्होंजी! जाँच पड़ताल पूरा होने तक इन पिता-पुत्र को सामान्य कैद में रखो।" त्र्यम्बकराव और निवामराव को ऐसा लगा जैसे उनकी पीठ में भाले की नोक चुभ गयी हो। उन्हें कैदखाने की ओर ले जाया गया। अण्णाजी उनकी कोई सहायता नहीं कर सके। गोदू पहले की तरह ही सहमी खड़ी थी। अण्णाजी उसके पास गये और उसके सिर पर हाथ रखकर बोले, "चल बेटी! कल से तुम्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ी है। चल अपनी मौसी के पास।" गोदू ने अण्णाजी का हाथ झटक दिया। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वह महाराज से इतना ही बोली, "महाराज! मुझे किसी रिश्तेदार के पास नहीं जाना है। सम्भाजी :: 25