छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
अपनी जाँच का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत कर दिया था। किले के ऊपर के बारूदखाने से तोप के गोले बाघ दरवाजे पर ही नहीं कहीं भी नहीं भेजे गये थे। उसी दोपहर में काले हौज के पास सन्दिग्ध अवस्था में देखे गये छः-सात लोगों को गड़करी कान्होंजी भांडवलकर की बटालियन ने रोका था। ये चोर अपने को बचाने के लिए भवानी कड़ा की ओर भागे। उन्होंने उस भयानक कड़े के ऊपर से नीचे की करौंदों की झाड़ियों में छलाँग लगायी। उस जगह पर अभी भी उनकी तलाश जारी है। थोड़ी देर में कान्होंजी राव स्वयं दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने शिवाजी महाराज को बताया—"महाराज! उन सन्दिग्ध लोगों में से चार जनों के शव मिले हैं। लिबास को देखने से वे बाहर से आये हुए पठान दिखाई पड़ते हैं। इससे पहले इन्हें इस क्षेत्र में किसी ने नहीं देखा।" शिवाजी महाराज के चेहरे पर उभरी तनाव की रेखायें ढीली पड़ गयीं! उन्होंने अपनी चमकती आँखों से गोदू की ओर कृतज्ञता से देखा। महाराज को विश्वास हो गया था कि शत्रुओं ने एक बहुत बड़ी साजिश का जाल बुना था। महाराज शम्भूराजा की ओर रुख करके बोले, "इतनी जरूरी खबर थी तो बाघ दरवाजे की ओर दौड़ने से पहले आपने मुझे क्यों नहीं सूचित किया?" "वहाँ दौड़कर पहुँचना और तोपों को नाकाम करके मराठों के प्राणों की रक्षा करना मेरा प्रथम कर्तव्य था, पिताजी।" शम्भूराज ने उत्तर दिया। शिवाजी महाराज की तीखी नजर वाड़कर पिता-पुत्र पर पड़ी। वे दोनों बहुत घबरा रहे थे। वे हकलाते हुए महाराज की ओर देख रहे थे। सारा प्रसंग बता रहा था कि दाल में कुछ काला था। दाल में काले का अनुमान अण्णाजी को भी हो गया था। उनकी शुरू में चढ़ी हुई त्योरी अपने आप ढीली हो गयी। सभी की नजर महाराज की ओर उठी। बड़े महाराज की नीर-क्षीर विवेकीवाणी फूटी— "अण्णाजी पन्त! यह घटना जटिल होती जा रही है। इसकी पूरी जाँच करना आवश्यक है। कान्होंजी! जाँच पड़ताल पूरा होने तक इन पिता-पुत्र को सामान्य कैद में रखो।" त्र्यम्बकराव और निवामराव को ऐसा लगा जैसे उनकी पीठ में भाले की नोक चुभ गयी हो। उन्हें कैदखाने की ओर ले जाया गया। अण्णाजी उनकी कोई सहायता नहीं कर सके। गोदू पहले की तरह ही सहमी खड़ी थी। अण्णाजी उसके पास गये और उसके सिर पर हाथ रखकर बोले, "चल बेटी! कल से तुम्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ी है। चल अपनी मौसी के पास।" गोदू ने अण्णाजी का हाथ झटक दिया। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वह महाराज से इतना ही बोली, "महाराज! मुझे किसी रिश्तेदार के पास नहीं जाना है। सम्भाजी :: 25
जो हो गया वही बहुत है। " शिवाजी महाराज बड़े संकट में पड़ गये। गोदू के प्रति महाराज के मन में बड़ी दया उमड़ रही थी। यदि दूसरा अवसर होता तो महाराज उसकी बहादुरी के लिए अपने गले का रत्नहार उसे पहना देते। किन्तु वाड़कर पिता पुत्र के अपराधी सिद्ध होने पर भी वे अण्णाजी के रिश्तेदार थे। पूछताछ पूरी होने तक अपने अष्टप्रधानों में से किसी का भी अपमान होना महाराज की नीति के विरुद्ध था। वे किसी भी अधिकारी को अपमानित नहीं होने देते थे। किन्तु गोदू का क्या किया जाय ! महाराज इस बात को लेकर बहुत चिन्तित थे। अण्णाजी गोदू को अपने घर ले जाना चाहते थे। किन्तु उनके घर के लिए तैयार न थी। महाराज ने अन्त में निर्णय सुनाते हुए कहा, "गोदू छोटी बच्ची नहीं है। वह अपने बारे में स्वयं निर्णय ले लेगी।" महाराज अपना निर्णय सुनाकर मुक्त हो गये। किन्तु गोदू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वो कहाँ जाय ? हवा की चपेट में आकर जिस तरह कोई सूखा पत्ता अटक जाता है उसी तरह गोदू भी कुछ समय तक खड़ी रही। उसने पहले शम्भुराजा की प्रशान्त और गम्भीर मुद्रा की ओर देखा। उसकी दृष्टि युवराज की बगल में खड़ी येसूबाई पर पड़ी। येसूबाई भगवान की मूर्ति के सामने जलती दीप शिखा की तरह तेजस्विनी, ममता की मूर्ति, स्वभाव से शीतल और कोमल मन की दिखाई पड़ रही थी। गोदू एकाएक भाव विभोर हो उठी। वह दौड़कर येसूबाई की बाँहों में समा गयी। वह व्याकुल होकर बोली, "युवराज्ञी आप ही मुझे अपने आँचल में सम्भाल लो। आपकी दासी बनकर मैं आपकी हर आज्ञा मानने और हर काम करने के लिए तैयार हूँ।" जिसके कारण येसू के पति पर लांछन लगाया था वही उसके गले पड़ रही थी। अचानक घटित इस प्रसंग से सभी संकट का अनुभव कर रहे थे। गोदू का शरीर सहायता प्रतीक्षा में थर थर काँप रहा था। येसू ने गोदू के चेहरे पर ममता से इस तरह हाथ फेरा मानो मक्खन के पिंड को सहला रही हों। युवराज्ञी ने बड़ी बहादुरी से कहा, "ठीक है गोदू! जब तक तेरी कोई समुचित व्यवस्था नहीं हो जाती तू हमारे अन्तःपुर में रह सकती है।" एक नौकर को आदेश देते हुए येसूबाई ने कहा, "इसको लेकर मेरे महल में जाओ। मैं भी पीछे आ रही हूँ।" पन्त का विचार था कि शिवाजी महाराज येसूबाई के इस व्यवहार में हस्तक्षेप करेंगे किन्तु महाराज ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत उन्होंने मुल्ला हैदर को बाघ दरवाजे के पास घटी घटना अच्छी तरह 26 सम्भाजी
जाँच करने का आदेश दिया। अपने प्रति महाराज की बेरुखी और उपेक्षा से लज्जित हुए। अपनी नाराजगी को व्यक्त न करते हुए अपना उत्तरीय झटककर क्रोध से दरबार से बाहर चले गये। अब महल में बड़े महाराज, सम्भाजी राजा और येसूबाई के अतिरिक्त और कोई नहीं था। महाराज बड़ी दुख भरी नजरों से युवराज को देख रहे थे। युवराज की मुख मुद्रा में अनेक प्रकार की भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। सम्भाजी राजा के धीरज का बाँध टूट गया। वे बड़ी विनम्रता से बोले, "पिताजी! क्षमा करें! मैंने आपको बड़ा कष्ट दिया है। किन्तु...।" "पिताजी! कोई अपराध न करने पर भी किसी को अपराधी ठहराकर दंडित करना कहाँ का न्याय है? पिताजी थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाय कि आपका युवराज चरित्रहीन है। परन्तु रायगढ़ की सुरक्षा में इतनी शिथिलता कब से होने लगी?" "मतलब?" "चितदरवाजों के फौलादी किवाड़ आजकल कभी भी रात बिगत कैसे खोल दिये जाते हैं। स्वयं छत्रपति इस किले पर रहते हैं, तब भी?" शिवाजी महाराज व्यंग्यपूर्वक हँसे और बोले, "पागल हो गये हो क्या बेटा? अरे, शाम को जब एकबार चितदरवाजा बन्द हो जाता है तो दूसरे दिन सुबह तक आदमी तो क्या कोई कीड़ा भी ऊपर नीचे नहीं हो सकता।" महाराज की बात सुनकर संभाजी राजा ने कहा, "यदि ऐसी बात है तो उसी दरवाजे से, जैसा कि अण्णाजी पन्त और दूसरे लोग कहते हैं, भोर में आदमी जाते कैसे और सुबह होने से पहले वाड़कर की बहू, को भगाकर कैसे ले आते हैं?" शम्भुराजा के इस प्रश्न पर शिवाजी महाराज बहुत विचलित हो गये। युवराज के ऊपर बदनामी के कीचड़ उछाले जाने और घटित हो रही घटनाओं के बीच निश्चय ही कुछ गड़बड़ है। यह महाराज भी अनुभव कर रहे थे। युवराज के शब्दों ने महाराज के हृदय के टुकड़े टुकड़े कर दिये—"पिताजी! आजकल हमारे दिन इतने बुरे हैं कि महाराज ने अपने दिल के दरवाजे शम्भू के लिए बन्द कर लिए हैं। और चोर डाकू कभी भी आ जा सकें इसलिए चितदरवाजे के किवाड़ों को पैर लग गये हैं।" युवराज की बातें सुनकर महाराज के हृदय में ममता का बाँध टूट पड़ा। उन्होंने शम्भुराजा के कंधे पर हाथ रखकर बड़े प्यार से कहा, "मन को इतना खट्टा न करो बेटा! कहीं पर कुछ गड़बड़ी जरूर है। हम इसका पता अवश्य लगाएँगे।" पिताजी! स्पष्ट रूप से बताता हूँ। आपको अपने प्यारे पुत्र से अलग करने के लिए सारी अच्छी बुरी ताकतें एकजुट हो गयी हैं।" सम्भाजी · 27
महाराज ने बड़े प्यार से शम्भूराजा को अपने समीप बिठाया। उनकी पीठ पर अपना ममता भरा हाथ फेरते हुए बोले, "हमारे कर्मचारियों से यदि कुछ त्रुटियाँ हुई होंगी तो निश्चय ही हम उनकी जाँच पड़ताल करेंगे। परन्तु बेटा, एक बात ध्यान रखना कि हमारे अष्ट प्रधान, हमारे सरदार, स्वराज्य का प्रासाद खड़ा करने में विगत चालीस वर्षों से रात-दिन, एक करने वाले हमारे प्राणों से भी प्रिय साथी रहे हैं। उनकी मान-मर्यादा उनके सम्मान का ध्यान रखना युवराज होने के नाते आपका भी कर्तव्य है। आप अपना व्यवहार सुधारें। नहीं तो...।" "नहीं तो क्या?" शम्भूराजा की आँखों ने प्रश्न किया, "आपसे अलग अकेले में जीने की हमें आदत डालनी होगी।" महाराज के इन कठोर शब्द को सुनते ही शम्भूराजा ने ऐसा अनुभव किया जैसे बाढ़ के बहाव में कोई बड़ा पेड़ उखड़ कर गिर गया हो। युवराज की आँखों में आँसू आ गये। उन्होंने कहा- "पिताजी! आपसे अलग रहने की कल्पना भी हमारे हृदय को चिथड़े चिथड़े कर देती है। एक बार इस संभाजी को हाथी के पाँव के नीचे कुचलकर मार डालने की सजा भले दे दीजिए। वह सजा मैं खुशी-खुशी स्वीकार कर लूँगा। किन्तु आपसे अलग रहने की कल्पना से मेरा हृदय विकल हो उठता है। अचानक शम्भूराजा को अपनी दादी जीजा माता का स्मरण हो आया। उन्होंने युवराज के कान में एक ही मन्त्र दिया था-"मेरे बच्चे शम्भू तू सदैव ही शिवाजी की छाया में रहना।" लेकिन अब समय बदल गया था। पूरी दुनिया को ममता की छाया देने वाले महाराज को शम्भू के लिए समय ही नहीं था। शम्भूराजा अचानक गद्गद स्वर में बोल पड़े-"पिताजी! कभी इस पागल संभाजी के बिना शिवाजी महाराज जीवित रह सकेंगे किन्तु आपकी छाया से दूर होकर इस संभाजी का जीवित रहना असम्भव है। बस वही हमारा दोष है।" शिवाजी महाराज ने अनुभव किया कि कहीं कोई भूल हो रही है। शम्भूराजा ने अपनी जन्मदात्री माँ का मुँह कभी नहीं देखा था। पुत्र के समान प्रेम से पालने वाली उनकी दादी जीजा माता भी कभी की भगवान को प्यारी हो गयी थीं। शिवाजी महाराज सोचने लगे, राज्याभिषेक समारोह तक जिसे होनहार पुत्र मानते थे; जिसने छोटी उम्र में कर्नाटक में कोलार की वतनदारी सम्भाली थी; फ्रांसीसी, पुर्तगाली, अंग्रेज जैसे अनेक देशों के वकील महाराज से मिलने से पहले जिससे परामर्श करते थे, जिसकी प्रखर बुद्धि और दिलेरी को देखकर लोग कह उठते थे- "यह तो भविष्य का सवाई शिवाजी है।" इस प्रकार जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा होती थी वही अपना पुत्र पास होते हुए भी दूर जा रहा है। किसी-न-किसी से अवश्य चूक हो रही है। यह सोचकर शिवाजी विचलित हो उठे और शम्भूराजा को बाँहों में भर लेने के लिए आगे बढ़े लेकिन शम्भूराजा तो वहाँ थे ही नहीं। वे और 28 :: सम्भाजी
उनके पीछे येसूबाई राजमहल का आँगन पार करके बाहर निकल रहे थे। शिवाजी महाराज, आश्चर्यचकित होकर शम्भूराजा को पीछे से देखते रह गये। तीन उस दिन महादरवाजे के पहरे पर रायप्पा था। दोपहर में किले पर चहल-पहल कम होती है। उसी समय एक सजी हुई साँड़नी दरवाजे के सामने आकर खड़ी हुई। उसके साथ भास्कर ठाकुर और दो फिरंगी सवार थे। उनके आते ही पहरे पर तैनात सूबेदार ने अन्दर जाने का संकेत किया। वे लोग अन्दर प्रवेश करने ही वाले थे कि रायप्पा अड़ गया। वह कड़ी आवाज में पूछने लगा— "कौन हैं आप? कहाँ से आये हैं?" "जाने दे रे रायप्पा, गोवेकर वकील रामजी ठाकुर के लोग हैं। उनको अण्णाजी पन्त के बाड़े में जाना है।" ऐसा लगा कि सूबेदार को उनके आने के पहले से ही उनके बारे में जानकारी थी। रायप्पा कुछ हड़बड़ाया किन्तु तत्काल सँभलते हुए बोला, "वकील के लोग हैं तो उन्हें महाराज को मिलना चाहिए।" "परन्तु उनको पन्त सुरनवीस (एक पद) को मिलना होगा तो?" "पर इस प्रकार का आदेश कहाँ सूबेदार?" "रायप्पा किसलिए फालतू बखेड़ा करता है? बड़े महाराज आज किले में नहीं हैं।" "तब ये लोग युवराज से मिलें।" सूबेदार रायप्पा को मनाने लगा। इससे रायप्पा और सावधान हो गया। वह बाहर से भले ही जंगली और मतलबी दिखे लेकिन जंगली पक्षियों की धीमी आवाज की तरह चोरों की हल्की आवाज को सहज ही पहचानता था। इसलिए पुर्तगाली वाइसराय के वकील का अण्णाजी पन्त को चोरी से कुछ भेजने में उसे दाल में काले की शंका हुई। उसने गोवेकर लोगों को वहीं पर रोककर युवराज के पास सन्देश भेजा। शम्भूराजा का आदेश मिला तो रायप्पा ने सभी को ले जाकर शम्भूराजा के दरवाजे पर खड़ा किया। शम्भूराजा ने भास्कर ठाकुर से कड़ी आवाज में पूछा, "सच-सच बताओ, किसका है यह सामान? क्या है इस सन्दूक में?" लिपिक गोवेकर हड़बड़ा गया। उसने साफ-साफ बोल दिया—"दो बड़े सम्भाजी :: 29
रत्नहार हैं। फिरंगियों के वकील रामजी ठाकुर ने गोवा से भेजे हैं।" "किसके लिए?" "सुरनवीस अण्णाजी पन्त के लिए।" "ईनाम के रूप में?" "वैसे नहीं। पर...।" भास्कर ठाकुर ने 'त...त...प...प' हकलाते हुए सारी बात साफ कर दी। उसने बताया-"क्या हुआ युवराज कि दो महीने पहले हमारे वकील स्वयं महाराज से मिलने के लिए रायगढ़ आये थे। तब उन्होंने वाइसराय की ओर से एक बहुमूल्य उपहार महाराज को दिया था। "ठीक है। फिर?" "परन्तु...परन्तु...उस समय सुरनवीस अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त पेशवा के लिए कुछ ले आना भूल गये थे। मोरोपन्त ने तो इस विषय में एक शब्द भी नहीं कहा किन्तु अण्णाजी ने पिछले तीन महीने में तीन चिट्ठियाँ भेजीं। रामजी पन्त को बहुत पीड़ित किया। पन्त ने कहा- "राज्य के कार्य व्यापार में कर्मचारी असन्तुष्ट हो जाय तो बड़े-बड़े काम भी धूल में मिल जाते हैं। इसलिए..." "आगे?" "आगे बोले तो उन्होंने दो बड़े रत्नहार खरीद लिये। वही लेकर हम आज पन्त को मिलने के लिए आये हैं। "ठीक है। युवराज की हैसियत से हम इसे स्वीकार करते हैं।" शम्भुराजा ने बगल में देखा। वहाँ पर पीठ पर अपने लम्बे बालों को खुला छोड़े, ऐंठी मूँछों वाले, गेहुँए रंग के, तीस वर्ष के, बलिष्ठ और लम्बी कद काठी के कवि कलश खड़े थे। उनकी ओर देखते हुए युवराज ने कहा, "कविराज इन लोगों को लिखित रसीद दे दीजिए और इन्हें तुरन्त वापस जाने दीजिए।" गोवेकर दूत चले गये तब हाथ जोड़कर कवि कलश ने युवराज से निवेदन किया-"राजन! थोड़े संयम से काम लें। रुकना सीखें।" शम्भुराजा हँसते हुए बोले, "क्यों? अण्णाजी पन्त तो उठते बैठते नाक ऊँची करके ही बोलते हैं न कि, 'हम किसी लफड़े में पड़ते ही नहीं हैं। चालीस साल से बहुत ही ईमानदारी के साथ महाराज की सेवा की है। वे ऐसा ही दावा करते हैं न'?" "परन्तु राजन! आप इन रत्नहारों का क्या करेंगे?" "जिनकी चीज है उनको दे देंगे। परन्तु उसे माँगने के लिए उन्हें मुझसे मिलना चाहिए।" शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा। उसी शाम को अण्णाजी के छोटे भाई सोमाजी बड़ी शीघ्रता से शम्भुराजा के पास आये और कहने लगे, "युवराज दो महीने पहले बड़े भाई ने गोवा में पैसे भेजे 30 :: सम्भाजी
थे। वहाँ के एक फिरंगी मुनार को दो रत्नहार बनाने का काम दिया था। " "तो?" "बाकी कुछ नहीं, परन्तु परन्तु ऐसा मालूम पडा है कि आज वे लोग आकर भूल से आपसे मिलकर गये।" यह कहते-कहते सोमाजी का गला सूख गया। "सोमाजी बाबा! आप जैमा कह रहे हैं उमी तरह से वह चीज यहाँ पहुँच गयी है। आपकी बात मच है।" "वाह! बहुत अच्छा।" "लेकिन वह चीज यहाँ फिरंगी सुनार ने नहीं भेजी है। वह लेकर पुर्तगालियों के वकील रामजी ठाकुर के आदमी यहाँ आये थे। हमारी समझ में यह नहीं आ रहा है कि गाँव के सुनार अपनी चीजों को पहुँचाने के लिए वाइसराय के कर्मचारियों को कब से काम में लगाने लगे।" शम्भुराजा की कठोर और हृदय को भेद देने वाली पूछताछ से सोमाजी बाबा हड़बड़ा गये। वे अपने माथे का पसीना उनरीय के छोर से पोंछने लगे। शम्भुराजा अधिक क्रुद्ध होकर बोले, "जाकर बोलो अण्णाजी चाचा को, बोलो कि सारी बात हमें मालूम है। स्वराज्य के छत्रपति हमारे पिताजी नियम के अनुसार स्वयं अपने उपहारों अथवा भेंट वस्तुओं को सरकारी रत्नशाला में जमा कराते हैं। क्योंकि यहाँ का प्रत्येक कण हिन्दवी स्वराज्य का है, राजा का नहीं है। ऐसी हमारी धारणा है। आप कर्मचारी लोग जबरदस्ती जो उपहार मँगाते हो उसे कहाँ जमा करते हो। बस इतना ही हमें बता दो।" सोमाजी दत्तो बिना कुछ बोले, सिर नीचा किये निकल गये। बाद में अण्णाजी के यहाँ से वह उपहार माँगने कोई नहीं आया। चार दिनों बाद ही राजमहल में किसी कारण से बड़े महाराज ने अष्टप्रधान और अन्य कर्मचारियों के लिए भोजन का आयोजन किया था। भोजन में महाराज के साथ अण्णाजी, शाहूजी, सोमनाथ, बालाजी और शम्भुराजा थे। बालाजी और आवजी शिवाजी महाराज के सबसे करीबी थे। महाराज उन्हें बहुत मानते थे। अण्णाजी पन्त साँवले, मजबूत हड्डियों वाले ही नहीं बहुत हट्टे कट्टे भी थे। मोरोपन्त लम्बे चेहरे और लम्बी नाक वाले थे। उनकी आँखें छोटी छोटी और मोती जैसी चमकदार थीं। मस्तक पर चन्दन की ऊँची सीधी रेखा। वाणी कुछ कुछ खरज में। बुढ़ापे की शरीर पर स्पष्ट छाया। पीठ थोड़ी झुकी हुई दिखती थी। किन्तु उनके शरीर में उत्साह की कमी न थी। बच्चों जैसे उत्साह से भरे वे दरबार में घूमते थे। महाराज ने इससे पहले मोरोपन्त और अण्णाजी पर बहुत से जिम्मेदारो के काम सौंपे थे। दोनों ही महाराज के पुराने बुद्धिमान और कर्तव्यपरायण साथी थे। किन्तु उन दोनों में मनोमालिन्य और मनमुटाव बहुत था। राज्य के कार्यव्यापार कम- सम्भाजी :: 31
से-कम बोलने वाले और फूँक-फेंक कर कदम रखने वाले अण्णाजी आज अपनी भीतरी बेचैनी रोक नहीं पाये। वे शम्भूराजा की ओर देखते हुए शिवाजी महाराज से बोले, "महाराज फिरंगी गढ़ाई के रत्नहार बहुत सुन्दर होते हैं। इसीलिए पैसे भेजकर गोवा से मैंने दो हार मँगवाये थे।" "कुछ तो हम भी सुन चुके हैं।" महाराज ने कहा। "परन्तु उनकी गढ़ाई इतनी अच्छी निकली, शम्भूराजा को इतनी अच्छी लगी कि क्या बताऊँ? उन्होंने उन हारों को अपने पास रख लिया।" अण्णाजी ने स्पष्ट किया। अण्णाजी के तीरों के निशाने से शम्भूराजा तनिक भी विचलित न हुए। उन्होंने तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की- "आप इसी क्षण पता करवा सकते हैं। वह चीज मैंने सरकारी रत्नशाला में जमा की है। उसकी रसीद हमारे पास है।" अण्णाजी एकदम चुप हो गये। सरकारी लिपिकों के चेहरे भी देखने लायक हो गये थे। शम्भूराजा की तरुणाई और उनका चुलबुला स्वभाव उन्हें चुप नहीं बैठने दे रहे थे। महाराज की ओर देखते हुए उन्होंने कहा- "पिताजी। आप ही हमेशा सबको बताते रहते हैं कि हमारे कर्मचारियों और सरदारों को दूसरे राजाओं के वकीलों और दीवानों का एहसानमन्द नहीं होना चाहिए। इसका परिणाम अपने राज्य के भीतर की कार्यप्रणाली पर होता है, राज्य को हानि पहुँचती है।" शम्भूराजा की बात समाप्त होने पर राहुजी सोमनाथ को जोर की खाँसी आयी। अन्य लोगों की स्थिति भी कुछ विचित्र सी हो गयी। शम्भूराजा की बात पर बड़े महाराज कुछ नहीं बोले। इससे सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। दूसरे दिन शाम को अण्णाजी के घर पर शतरंज की बाजी खेली जा रही थी। राहुजी सोमनाथ को खेल के राजा, ऊँट और हाथी के बदले बाहर के गधे की याद आयी। सामने एक मोहरा रखते हुए वे बोले, "गधे के कान कभी लम्बे होने से कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन युवराज के कान लम्बे हो गये तो खतरा उत्पन्न करते हैं। करो रे करो। कुछ दवा दारू करो। वैद्य को बुलाओ।" इस बात पर अण्णाजी विषादपूर्वक हँसते हुए इतना ही बोले—"चलता है राहुजी! अनादिकाल से चलता आया है, कर्मचारी और सैनिक अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ उठाकर राज्य को बढ़ाते हैं। किन्तु थोड़े आराम के दिन आने पर वे जब खुली हवा खाने के मनसूबे बनाते हैं तो मन को मारना पड़ता है। उस समय तक सरलता से उपलब्ध सुख भोगने के लिए उत्तराधिकारी नाम के गुंडे राजमहल में तैयार हो ही जाते हैं। अपने भाग्य में ऐसा ही लिखा होगा तो हम क्या करेंगे?" 32 :: सम्भाजी
"नहीं, नहीं! चाहें तो अपने लेख को लपेट लीजिए। किन्तु इस प्रकार अनधिकारी व्यक्ति से ऐसा अपमान नहीं होना चाहिए।" गहुर्जी सोमनाथ ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया। चार सन्ध्या समय की शीतल वायु मन्द मन्द बह रही थी। शम्भुराजा के महल के पीछे एक छोटा सा बगीचा था। संभाजी और येसूबाई की गृहस्थी के साथ वह भी फलता फूलता गया। बगीचे में ही एक पुराना गूलर का पेड था और बेंत का वन था। उस वृक्ष की एक मोटी टहनी पर पीतल की जंजीरों से बना झूला पड़ा था। उसी झूले पर युवराज और युवराज्ञी बैठे कुछ बातें कर रहे थे। सामने हिरनों के बच्चे खेल रहे थे। बीच बीच में गूलर के फल नीचे टपक जाते थे। युवराज और युवराज्ञी को इस प्रकार की शान्ति बहुत दिनों बाद मिली थी। येसूबाई ने युवराज को टटोलते हुए गम्भीरता से कहा "राजा को सभी प्रकार के अधिकार होते हैं। राजा की इच्छा ही अन्तिम आदेश बन जाती है। अपने राज्य की प्रत्येक उत्तम और सुन्दर वस्तु पर उसी का अधिकार होता है। इसीलिए राजा, यदि राज्य की यदि कोई सुन्दर युवती मन को भा गयी तो गाय बैल की तरह कभी भी उसे भगाकर अपने जनानखाने में कैद करके रखने का जुर्म भी करता है। ऐसा नहीं है क्या?" "येसू! आप यह क्या कह रही हैं? ऐसे निर्लज्ज अत्याचार केवल यवनों और सुल्तानों के ही राज्य में होते हैं। शिवाजी महाराज के स्वराज्य में नहीं।" "युवराज! सच बोल रहे हैं आप?" हँसते हँसते येसूबाई की पुतलियाँ कठोर हो गयीं—"तो फिर युवराज! महाराज के पुत्र संभाजी राजा द्वारा ऐसा अत्याचार क्यों किया गया?" "कौन सा अत्याचार?" "अण्णाजी दत्तो प्रभुणीकर तो शिवाजी महाराज के एक आधारस्तम्भ हैं। उनकी लाड़ली बेटी हंसा पर अत्याचार करके आपने कौन सी बहादुरी दिखायी?' संभाजी राजा जैसा शीघ्र क्रुद्ध हो जाने वाला व्यक्ति भी येसूबाई के अप्रत्याशित हमले से हड़बड़ा गया। रायगढ़ के परिसर में एक समय शिवराजा सम्भाजी ३३
१. युवराज शम्भु राजे का बाल्यकाल, पुरन्दर सन्धि, आगरा प्रवास एवं विद्याभ्यास
महाराज की माता जीजाबाई के शब्दों का जो आदर और प्रभाव था, वही उत्तराधिकार येसूबाई के पास अपने आप चला आया था। शम्भूराजा से वे एक-डेढ़ वर्ष छोटी थीं। किन्तु, उनके ममतांलु, कर्तव्यपरायण और सर्वसमावेशक व्यक्तित्व ने एक अलग ऊँचाई प्राप्त कर ली थी। कद से ऊँची, लम्बोतरे चेहरे वाली, देखने में सुन्दर नाक नक्श वाली, तन्वंगिनी, झुमकेदार नथ पहनने वाली, उत्साही तरुणी येसूबाई रायगढ़ के अन्तःपुर में आकर्षण का केन्द्र थीं। शम्भ्रूराजा की सोयराबाई जैसी अनेक मातायें वहाँ रह रही थीं। परन्तु येसूबाई जैसी चमक और आदर किसी के भी व्यक्तित्व को नहीं मिल पाया था। संगमेश्वर नगर के पास, कुछ ही कोसों की दूरी पर अन्दर पहाड़ियों में श्रृंगारपुर की बस्ती थी। वहाँ के सूर्यराव सुर्वे स्वयं को श्रृंगारपुर का शाहंशाह मानते थे। उनका व्यवहार भी उसी तरह निरंकुश था। दाभोल और संगमेश्वर जैसे बड़े दो बन्दरगाह उनके अधिकार में थे। अनुमानतः सौ सौ से अधिक बड़े जहाज सूर्यराव ने बनवाये थे या चुराकर प्राप्त किये थे। रत्नागिरी, दाभोल से लेकर हरिहरेश्वर तक के समुद्र तट पर उनका शासन था। विशेषरूप से मक्का-मदीना जाने वाले यात्रियों और विदेशी जहाजों को लूटकर सारी सम्पत्ति हड़प लेना सूर्यराव का मुख्य कार्य था। यही सूर्यराव येसूबाई के नाना थे। येसूबाई के पिता पिलाजी शिर्के एक प्रमुख सरदार के रूप में सूर्यराव के दरबार में सेवारत थे। वे वहीं समीप के कुटरे गाँव के निवासी थे। पिलाजी राव शिर्के भी शिवाजी महाराज के पराक्रम को वर्षों से सुनते आये थे। किन्तु महाराज ने जब से स्वराज्य की स्थापना की, तभी से महाराष्ट्र के मुसलमान और मुसलमानों का पक्ष लेने वाले जागीरदार मराठे उनका घोर विरोध कर रहे थे। ये तथाकथित जागीरदार एक ओर तो विदेशियों के जूते पोंछते थे और दूसरी ओर जाति और कुल के आधार पर स्वयं को शिवाजी महाराज से श्रेष्ठ मानते थे। सूर्यराव भी उसी जाति कुल के थे। शिवाजी महाराज के साथ सूर्यराव का द्वेष इतना बढ़ गया था कि वे महाराज के विरोध में ऐन मौके पर उनके विरोधी जावलीकर मोरे से जा मिले और महाराज के विरोध में लड़े थे। सिद्धी और जौहर ने जब पन्हाला पर घेरा डाला था तब भी सूर्यराव जौहर की सहायता के लिए दौड़े थे। कुछ साल पहले शिवाजी महाराज कोंकण की लड़ाई के लिए गये थे। तभी उन्होंने सूर्यराव के सारे अपराध क्षमा करके सूर्यराव को सुधरने का एक अवसर दिया था। किन्तु अपने स्वभाव के अनुसार सूर्यराव साँप के तरह उन्हीं पर उलट पड़ा। उसने महाराज के सैनिकों को बहुत कष्ट दिया ही, महाराज के बुलाने पर भी पालवण में उनके सामने हाजिर नहीं हुआ। सूर्यराव के स्वराज्यद्रोह से महाराज बहुत क्रुद्ध हुए। एक बार इस संकट को मिटा देने का निश्चय करके महाराज ने 34 • सम्भाजी
श्रृंगारपुर पर आक्रमण किया। इस खबर के मिलते ही सूर्यराव अपनी राजधानी छोड़कर पास के जंगलों में भाग गया। सूर्यराव की गद्दारी से सन्तप्त शिवाजी महाराज ने उनके सिंहासन को पैर की ठोकर से गिरा दिया। संयम का बाँध टूट चुका था। महाराज ने श्रृंगारपुर पर छापा मारा था। सुर्वे की सम्पत्ति जब्त की जा रही थी। तभी छः-सात साल की गोदू कभी झरोखे से तो कभी पर्दे के पीछे से बड़े महाराज को बड़े आदर से, भयमिश्रित आदर से देख रही थी। अपने नानाजी का भाग जाना उसे बहुत बुरा लग रहा था। उसके पिता पिलाजी शिर्के बड़े धैर्य के साथ वहीं पर रुके हुए थे। सुर्वे की सम्पत्ति की गिनती हो रही थी। कर्मचारी वहाँ के सोने चाँदी के बड़े बर्तन, सिर तक ऊँचे दीपाधार, नक्काशीदार बड़े बड़े हंडे, कलश आदि सामान बाँधे जा रहे थे। उसी समय महाराज उन्हें देखने के लिए वहाँ आये। चमकते हुए दीपाधार और साफ सुथरे सोने चाँदी के बर्तन देखकर महाराज चौंक गये। उन्होंने कहा, "ऐसी वस्तुएँ राजमहलों में भरी पड़ी मिलती हैं किन्तु ऐसी स्वच्छता, सफाई, इतना सुन्दर रखरखाव, ऐसी सजावट बिना किसी जानकार और समझदार स्त्री की देख-रेख असम्भव है।" "महाराज ! यह जादुई करामात मेरी कन्या येसू की है।" पिलाजी ने निवेदन किया। महाराज दूमरे दालान में प्रविष्ट हुए। तभी नौकरों को हिदायत देती हुई छोटी सी येसू उनको दिखी। वह बड़े आत्मविश्वासपूर्वक खड़ी थी। शीशे के सामान को बाँधते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए, ऊँचे सामानों को कैसे बाँधना चाहिए, ऐसी हिदायतें वह नौकरों को दे रही थी। महाराज धीरे धीरे आगे बढ़े। उन्होंने येसू के मस्तक पर कोमलता से अपना हाथ रखा। उस हँसमुख, उत्साही, प्रसन्न, स्वच्छता और अनुशासन की आग्रही येसू को महाराज ने अपनी बाँहों में भर लिया। उन्होंने पिलाजी से कहा, "पिलाजी राव ! आपके ससुर सूर्यराव पर हमें इतना क्रोध आया था कि सारे श्रृंगारपुर को भस्म कर देने का हमने निश्चय कर लिया था। किन्तु आपकी इस छोटी बच्ची ने हम पर जादू का असर डाला है। यह सारी सम्पदा तुम अपने पास रख लो। हम तुम्हारे राजमहल से केवल एक बहुमूल्य चीज लेकर जाने वाले हैं।" महाराज की बातों से चिन्ताग्रस्त पिलाजी राव को सुखद धक्का लगा। महाराज ने कृतज्ञता के भाव से पिलाजी राव से कहा, "अपने शम्भूराजा के लिए हमें एक अच्छी कन्या की तलाश थी। ऐसी सुन्दर और कर्तव्यकुशल लड़की हमें दूसरी कहाँ मिलेगी ? पिलाजी राव की आँखों में आँसू उमड़ आये। उन्होंने महाराज के पैर पकड़ सम्भाजी · 35
लिए। उन्होंने कहा, “महाराज! हम पराजित हैं। उससे भी अधिक हम स्वराज्यद्रोही हैं। आप मेरी बेटी को इतना बड़प्पन क्यों दे रहे हैं? आपके शम्भू के लिए ऐसी बहुत सी लड़कियाँ मिल जाएँगी।” “नहीं पिलाजी राव, घर के किसी बर्तन पर जरा सा दाग लगने पर भी जिसकी जान निकलने लगती है, वही बच्ची कल जब गृहलक्ष्मी बनकर हमारे महल में आयेगी तो उसके चरण स्पर्श से हमारा राजमन्दिर असली मन्दिर के रूप में बदल जाएगा।” उन दो तीन दिनों में बहुत सी घटनाएँ घटीं। शिवाजी महाराज ने येसूबाई और शम्भूराजा का विवाह तो निश्चित किया ही साथ ही पिलाजी राव और उनके घर के संस्कार को इतना पसन्द किया कि महाराज ने अपनी कन्या, नानीबाई उर्फ राजकुँवर की सगाई पिलाजी राव के पुत्र गणेशजी के साथ पक्की कर दी। सूर्यराव के उद्धत स्वभाव और निरंकुश व्यवहार की छाया पिलाजी राव ने अपने ऊपर नहीं पड़ने दी थी। पिलाजी राव के नेतृत्व में ही दूर दराज में बसा यह श्रृंगारपुर महाराष्ट्र की प्रतिष्ठित विद्यानगरी में परिवर्तित हो गया था। तमाम देशों के बहुत से पंडित, विद्वान, तान्त्रिक, अनेक विद्याशाखाओं के अग्रदूत इस परिसर में अपना मठ बनाकर या गुफाओं में पनाह लेकर विराजमान थे। पिलाजी राव ने केशव पंडित और रघुनाथ पंडित जैसे विद्वानों से अपने बच्चों को पढ़ाया था। किन्तु पढ़ाई में गणेशजी की अपेक्षा येसूबाई की लगन अधिक थी। कर्तव्यपरायण पिलाजी राव ने येसूबाई के दहेज में हीरे मोतियों से भरी बोरियाँ रायगढ़ नहीं भेजी थीं। परन्तु केशव पंडित और रघुनाथ पंडित दोनों बन्धुओं को ससुराल जाती गोद के साथ भेजना नहीं भूले। रायगढ़ में पाठशाला आरम्भ हो गयी। अन्य बच्चों के साथ छोटी येसू और शम्भूराजा एक साथ ही पढ़ रहे थे। अपनी धर्मपत्नी समझने के पहले शम्भूराजा ने येसूबाई को अपनी सहपाठिनी और सहयोगिनी के रूप में मन में बिठा लिया। आज अचानक येसूबाई ने हंसा की बात छेड़ी तो शम्भूराजा कुछ हड़बड़ा गये। येसूबाई का राजमहल और शम्भूराजा के हृदय में कुछ विशिष्ट स्थान था। इसीलिए शम्भूराजा उठ खड़े हुए और बेचैनी से इधर उधर घूमते हुए, हाथ हिलाकर बोले- “युवराज्ञी! आप यह कैसे भूल रही हैं कि हम युवराज हैं। यदि कोई युवती हमारे मन में बैठ गयी तो हम उसके साथ सीधे सीधे विवाह करेंगे और एक रानी के लिए महल बनवाने के लिए रायगढ़ में जगह की कमी है क्या?” “मगर युवराज हंसा अण्णाजी पन्त की कन्या थी।” “किसी की भी होने दो। परन्तु यहाँ तो सुन्दर स्त्रियों का नाम मेरे साथ 36 · सम्भाजी
चिपकाने का सभी को शौक चढ़ा है।" येसूबाई हल्के से हँसी। अपनी हँसी को दबाते हुए किन्तु बड़े आत्मविश्वास के साथ कहने लगी—"स्वामीजी के सौन्दर्य की प्रशंसा और वाहवाही की एक से बढ़कर एक कहानियाँ आजकल सुनने को मिलती हैं। परसों रायप्पा और जोत्याजी बता रहे थे..." "क्या?" "...स्वामी पर भगवान ने सौन्दर्य का सारा वैभव, सब कुछ इस तरह निछावर कर दिया है कि आजकल स्वामी कहीं शिकार खेलने जाते हैं तो नदी में या किसी खुली जगह पर स्नान नहीं करते। क्योंकि युवराज का कम कपड़ों में गोरा चिट्टा शरीर जादू का असर करने लगता है। कलशे लेकर पानी भरने आने वाली युवतियाँ वहीं पर बेहोश होकर गिर पड़ती हैं। ऐसा चार पाँच बार हो चुका है।" "युवराज्ञी ! ऐसा लगता है कि आपका भी अपने पति राजा पर पूरा ध्यान रहता है।" "मेरे स्वामी में कितने विलक्षण गुणों का समन्वय है। तलवार हो या कलम दोनों ही स्वामी के वश में हैं। दोनों ही तेजी से चलती हैं। दोनों से संगी-साथी और शत्रु-मित्र डरते हैं। सौन्दर्य के बारे में तो कहना ही क्या ? एक बार भूल से भी स्वामी मदन के महल के सामने से गुजरें तो मदनदेवता अपने आसन से तुरन्त खड़े हो जाएँगे और स्वामी का हाथ पकड़कर अपने साथ भोजन पर बिठाकर सम्मानित करेंगे।" "परन्तु येसू, प्रेम करने की ठान लेने पर राजा को कोई कमी रहती है क्या ? सत्ताधीश से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले ऐसे दुष्ट नामर्दों की कमी है क्या जो अपनी पत्नियों, जवान बहू-बेटियों का हाथ पकड़कर पीछे के दरवाजे से आ जाते हैं। परन्तु एकतरफा प्रेम करके कोई हंसा मेरे लिए पागल हो जाय तो इसमें मेरा क्या दोष है?" येसूबाई शम्भूराजा को एकटक देखने लगी। पवन की गति तेज हो गयी। झूले में लगी जंजीरों की कड़ियाँ करकराने लगीं। उसी समय किसी जरूरी काम से गोदू पीछे के दरवाजे से आयी। हंसा नाम जब उसके कान में पड़ा तो वह वहीं दीवार के साथ छिपकली-सी चिपककर अपने प्राण को कानों में रोककर सुनने लगी। शम्भूराजा उसी वेग से आगे कहने लगे, "येसू! वह हंसा हर जगह मेरा पीछा करती थी। देखने में वह चित्र जैसी सुन्दर थी। बहुत ही सात्विक स्वभाव की। अण्णाजी काका की पुत्री होने के कारण वह छोटी उम्र से ही राजमहल में खेलती- सम्भाजी :: 37
कूदती थी। बचपन में कभी हमारी पीठ पर भी बैठती थी। लड़कियाँ जवान होने लगती हैं तो तीन-चार सालों में ही बहुत बड़ी दिखने लगती हैं। एक कीट का रूपान्तर तितली के रूप में कब हो जाता है, पता ही नहीं चलता। बड़ी होने पर हंसा को मैं टालने लगा। अण्णाजी पन्त तो हमारे पिताजी के बड़े भाई जैसे हैं।" "इसका मतलब भविष्य के परिणामों की कल्पना स्वामी को थी?" "हमें ही नहीं अण्णाजी पन्त को भी हंसा के पागलपन का अनुमान हो गया था। इसीलिए उन्होंने आनन-फानन में उसकी शादी निश्चित कर दी। शादी के बाद वह पहली बार पाचाड़ अपने मायके आयी थी।" उसी समय वसंत पंचमी का दुर्भाग्यपूर्ण त्योहार आया। दोपहर के समय उस पार के महल में महिलाओं और लड़कियों की हुड़दंग मची थी। उस समय येसू आप भी वहीं पर थीं। यह पागल लड़की उस भीड़ से बाहर निकल आयी। मैं उस समय अपने महल में कविताएँ रचने में विभोर था। मैंने पहरेदारों को आदेश दिया था कि वे किसी को भी अन्दर न आने दें। परन्तु हंसा यह झूठ बोलकर मेरे महल मे घुस आयी कि मैंने ही उसे बुलाया है। प्रेम के ज्वर ने उसे इतना उन्मत्त कर दिया था कि पीछे से आकर उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। वह अपने प्यासे ओठों से मेरे मस्तक को चूमने लगी। हमने उसके कान के नीचे एक जोर का तमाचा मारा और चिल्लाकर कहा, "शर्म नहीं आती तुम्हें? पन्त काका की बेटी हो तुम! किसी की विवाहिता पत्नी हो तुम!" मेरी बात सुनकर वह पागल की तरह हँसी और घायल पंछी की तरह हमारे पास आकर मेरा हाथ पकड़कर बोली, "हमारी देह से जवानी फूटी पड़ रही है। उसका अभिषेक तुम पर कराने के लिए मैं आयी हूँ, राजा।" मैंने उसको दूर धकेल दिया और उससे कहा, "मूर्ख लड़की! तेरी इस मूर्खतापूर्ण हरकत से महल में सुरंग लग जाएगी।" तब भी वह जाने को तैयार न थी, हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। तब मैंने उसे दो तीन तमाचे लगाये। हमने उससे पूछा, "तुम पागल हो गयी हो क्या?" वह जोर हँसी और बोली, "राजा प्रेम में जो पंछी अन्धा हो जाता है उसे तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिए तो परवाना शमा पर झपट पड़ता है और आग में मिट जाता है।" अन्त में मैंने हंसा को समझाते हुए पूछा, "तुमको क्या चाहिए?" वह फिर से हँसने लगी। उसकी हँसी बहुत ही रहस्यमयी और भयानक थी। वह बोली, "आपकी पौरुषेय सुन्दरता के सामने मुझे मेरा पति एकदम लल्लू लगता है, राजा। पिछले तीन सालों से मैं आपके लिए मशाल की तरह दिन-रात जल रही हूँ सिर्फ एक बार मुझे अपनी बाँहों में ले लो।" वह किसी भी तरह मुझे छोड़ने को तैयार न थी। मेरी कमर को उसने मगरमच्छ की तरह लपेट रखा था। उसके इस पागलपन और पन्त के महल के साथ 38 :: सम्भाजी
रिश्ते आदि को समझाने का मैंने बहुत प्रयास किया। मैंने यह भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि, “तुम्हारे इस पागलपन का मुझ पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।" मेरा एक घूँसा उसके मुँह पर लगा। उसके दाँतों से खून टपकने लगा। उसके होंठ का एक कोना सृज गया। मेरे स्पष्ट अस्वीकार से वह दुखी और घायल हो गयी। हमारे महल से बाहर निकलते समय उसकी लाल लाल आँखों में आँसू टपक रहे थे। मुझे देकर आँखें नचाते हुए उसने केवल इतना कहा, “राजा तुम्हारी 'हाँ' का मैं सिर्फ तीन दिन प्रतीक्षा करूँगी। इसके बाद चौथे दिन आप मेरा शव देखेंगे।" हमारे महल से हंसा तुरन्त बाहर निकली। उसी समय पन्त काका उसे ढूँढ़ते हुए आये और अस्त व्यस्त वस्त्रों में मेरे दरवाजे से उसे निकलते हुए देखा। किन्तु अपने लोगों को हर कठिनाई से बचाने के लिए संकल्पित मेरा मन किसे दिखाई पड़ता ? येसू रानी इस घटना को मैं किस मुँह से तुम्हें, पिताजी को या पन्त काका को सुनाता ? इसके अतिरिक्त भविष्य में ऐसा कुछ घटित होगा, इसकी कल्पना मुझे नहीं थी। चार पाँच दिन बाद लोगों ने पाचाड़ के एक कुएँ में हंसा के शव को देखा। मैंने भी यह खबर सुनी। मेरी तो बोलती ही बन्द हो गयी। जवानी की बेहोशी में, प्रेम के पागलपन में हंसा जैसी बहू इतनी सरलता से चली गयी। किन्तु जो अपराध हमारे हाथ से हुआ ही नहीं उस अपराध का लांछन हमारे कलेजे पर लगाने और बदनामी की आग में जलाने के लिए यह दुनिया हमारी कल्पित प्रेम कहानी को गढ़ती बैठी है और आगे भी गढ़ती रहेगी। पाँच शम्भूराजा ने रात का भोजन समाप्त किया। शयनकक्ष में जाने से पहले उन्होंने येसूबाई से सहज ही पूछा, "फिर क्या करना होगा गोदू का?" "कहाँ जाएगी बेचारी ?" येसूबाई ने कहा, "उसके तो न रही ससुराल और न रहा मायका।" "यहाँ पर बहुत से लोग शरण लिए हैं। दास-दासी महल में रहते हैं। वह भी उन्हीं के साथ रह लेगी।" वाड़कर का घर महाड़ के समीप था। वैसे वहाँ हर प्रकार की सुविधा थी। किन्तु गोदू के लिए वहाँ की दुनिया समाप्त हो चुकी थी उसके ससुर और पति किले में बन्दी होकर सजा भोग रहे थे। गोदू जब घबराई हुई शम्भूराजा के महल में सम्भाजी :: 39
आयी थी तभी येसूबाई ने उसकी पीठ पर अपना कोमल हाथ रख दिया था। इतना बड़ा राजमहल छत से लटकती बड़ी-बड़ी झूमरें, कमर तक ऊँचे दीपाधार। यह महल गोदू को गन्धर्वनगरी के महल जैसा लगा था। येसूबाई के महल के पीछे उनकी खास दासियों के कमरे थे। उसी में गोदू की व्यवस्था की गयी थी। किन्तु महल में आने के बाद से ही वह येसूबाई की छाया बन गयी थी। युवराज्ञी रसोईघर में, आँगन में, तुलसी वृन्दावन के पास, समीप के बगीचे में जहाँ कहीं भी हों, गोदू हर समय उनके साथ रहती थी। भगवान की पूजा के लिए फूल सजाकर रखना हो, दूर्वादल को साफ-सुथरा करके रखना हो या दीप जलाना हो, या जहाँ कहीं भी ऐसी आवश्यकता हो युवराज्ञी को गोंदू की ही याद आती थी। गोदू भी सदैव उत्साह से तैयार रहती थी। गोदू जवाकुसुम के बड़े फूल जैसी हँसमुख और तेजस्वी थी। येसूबाई की सौत दुर्गादेवी को भी गोदू से प्यार हो गया था। राजमहल में हर जगह गोदू का आना जाना बढ़ गया था। अनेक वर्षों से महल में काम करने वाली दासियाँ और साफ-सफाई करने वाली नौकरानियाँ गोदू को शक और ईर्ष्या की दृष्टि से देखने लगी थीं। उनका मानना था- "ये गोदू बहुत साहसी और षड्यन्त्रकारी दिखती है। वे गरीब इसके ससुर और पति शम्भुराजा पर आरोप लगाने गये थे और कैदखाने में सड़ रहे हैं। और यह औरत घुस गयी युवराज के महल में। युवराज पर तो पहले ही इसका जादू चल गया है। पर यह औरत इतनी होशियार है कि येसूबाई के हृदय में भी अपनी जगह बना ली है। पता नहीं किसी से यह सब कैसे हो पाता है?" युवराज ने दोपहर को.एक बार फिर पूछा, "येसू! क्या करना है गोदू का?" "कितना खर्च होता है उसके पेट के लिए? रहने दो बेचारी को यहीं पर। हमें भी उससे सहायता मिलती है।" "येसूबाई आपका हृदय बहुत बड़ा है। एकदम आसमान जैसा। परन्तु लोगों की जबान में जहरीले काँटे होते हैं। उनके भीतर का जहर जबान से टपके बिना नहीं रहता। फिर सामने चाहे राजा हो या रंक।" कुछ और दिन इसी तरह बीते। एक दिन राहुजी सोमनाथ के हाथ एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण थैली लगी। वाड़कर पिता पुत्र ने बहादुर गड़की और औरंगजेब के दूध भाई बहादुर खान कोकल्ताश को एक गुप्त सन्देश भेजकर कहा था- "जैसे पहले हमारी बात हुई है उसके अनुसार हमारी सहायता कीजिए। हमें मुक्त कराकर शाही सेवा का अवसर दीजिए। अन्ततः वाड़कर का भंडा फूट गया। 'धोखेबाज कैदी' के रूप में उन्हें लिंगाणा की काल कोठरी में भेज दिया गया। इस बात से गोदू की भूमिका दुनिया के सामने आ गयी। सभी को विश्वास हो गया कि अपने महाराज पर जो संकट 40 . : सम्भाजी
आया था वह गोदू की बहादुरी से ही टला। इस सच्चाई का पता लगने पर युवराज और युवराज्ञी ने गोदू की बड़ी प्रशंसा की। येसूबाई ने कहा, "गोदू तू दिल की इतनी नेक और पाक है कि क्या कहूँ? तुमने अपनी ससुराल का सुख छोड़कर मराठों के राजा की जान बचाई।" "युवराज्ञी ! शिवाजी महाराज हम गरीबों के भगवान हैं।" भावना से अभिभूत गोदू ने अपने साहस के रहस्य को स्पष्ट कर दिया। येसूबाई ने शम्भूराजा की ओर नजर घुमाते हुए कहा- "युवराज ! इस लड़की को भगाकर लाने का आरोप इसके परिजनों ने न लगाया होता तो आज इसकी बहादुरी का स्मरण करके महाराज ने इसके सम्मान में रायगढ़ पर आनन्द यात्रा निकाली होती।" दिन बीत रहे थे। अपने सम्बन्धियों के राजद्रोही होने का धक्का अण्णाजी पन्त को भी लगा था। उन्होंने गोदू को अपने घर ले जाने का पुनः आग्रह किया। किन्तु गोदू के दृढ़ निश्चय के सामने किसी की कुछ न चली। बीच में एक बार शम्भूराजा की बहन राणूबाई आक्का साहेब वाई से आयीं। वे अपने छोटे भाई के घर पर ठहरी थीं। उन्हें भी गोदू बहुत अच्छी लगी। किन्तु अपनी ससुराल वापस जाने हुए उन्होंने येसूबाई के कान में धीरे से कहा, "लड़की नक्षत्र जैसी है। गुणवान है। परन्तु जो भी हो है तो पराये घर की। उस पर भी इतनी स्वस्थ और सुन्दर। तुम किसका किसका मुँह बन्द करोगी, येसू !" आक्काबाई साहेब के विचार से धीरे धीरे येसूबाई भी सहमत होने लगीं। एक दिन शम्भूराजा की उपस्थित में येसूबाई ने बात छेड़ी-"गोदू तेरे घर गृहस्थी का क्या होगा?" "क्या करना है युवराज्ञी साहेब? पति स्वराज्य द्रोही हो गया, उसे जिन्दगी भर कैद काटना है। वह धोखेबाज जिन्दा रहे या मर जाय मेरे लिए बराबर है। अब उसका नाम भी जबान पर क्यों लाना ?" "फिर से शादी करो। हम लोग शादी के सारे खर्च, दहेज आदि की व्यवस्था करेंगे।" "शादी ! शादी करनी हो तो बस एक से ही।" गोदू स्वप्न देखती-सी बोली। "कौन है वह ?" गोदू की नजर यकायक शम्भूराजा के ऊपर से उड़ती हुई खिड़की के रास्ते आसमान पर पहुँच गयी। आकाश में उसने एक सफेद बादल का गुच्छा देखा। एक लम्बी और गहरी साँस छोड़ते हुए वह चुपचाप बैठी रही। शम्भूराजा ने बड़े स्नेह से पूछा, "किसी के प्रेम-व्रेम में फँस गयी है क्या गोदू?" युवराज के प्रश्न पर गोदू ने न हाँ कहा न ना। वह चुपचाप वैसे ही बैठी रही। सम्भाजी :: 41
येसूबाई ने गोदू के लिए योग्य रिश्ता ढूँढ़ना आरम्भ कर दिया। इस समाचार से गोदू एकदम जाग गयी। एक दिन उसने येसूबाई से कहा, "रानी साहेब एक बात कहूँ तो गुस्सा तो नहीं करेगी न?" "बोलो।" "उस पार की पहाड़ी में मेरी एक बुवा रहती हैं। बूढ़ी हो गयी हैं और अकेली रहती हैं। आप आज्ञा दें तो वहाँ जाकर रहूँ और उनकी सेवा करूँ।" येसूबाई कुछ रुककर बोलीं, "ठीक है जैसी तेरी इच्छा।" येसूबाई ने गोदू के लिए बहुत-सा सामान तैयार करवाया। राजा के कर्मचारी उसके संरक्षक बनकर साथ चले। शम्भुराजा ने सारवट गाँव के पाटिल के नाम एक पत्र लिखकर दिया। इसी गाँव में गोदू की बुवा रहती थी। शम्भुराजा ने पाटिल को लिखा था कि गोदू को जिस चीज की आवश्यकता हो उसकी व्यवस्था करें और खर्च हो उसे बाद में सरकार से माँग लें। येसूबाई से बिदा होते समय गोदू की आँखें डबडबा आयीं। महल के आँगन में चन्दन के झूले पर बैठे हुए शम्भुराजा ने झूले की जंजीरों को खींचते हुए कहा, "गोदू तुमने बड़ी बहादुरी से मेरे पिताजी की जान बचाई है। किसी भी चीज की आवश्यकता हो तो अपना अधिकार समझकर माँग लेना।" सिर हिलाकर, राजमहल और शम्भुराजा को एक बार उड़ती नजर से देखकर गोदू राजमहल से बाहर निकली। छह एक दिन बालाजी आवजी चिटणीस खास दरबार के पास बड़े महाराज की प्रतीक्षा करते बैठे थे। उसी समय शम्भुराजा वहाँ पर आ गये। उन दोनों के अतिरिक्त वहाँ और कोई नहीं था। एकान्त देखकर बालाजी ने शम्भुराजा से कहा, "युवराज! आजकल आप अष्टप्रधानों से बहुत सख्ती से पेश आते हैं, ऐसा लोगों का कहना है।" "क्यों? बालाजी काका, मुझसे कोई भूल हो गयी है क्या? मैंने स्वराज्य की हानि वाला कोई कदम तो नहीं उठाया?" शम्भुराजा ने पूछा। "ऐसा कुछ नहीं है किन्तु..." चिटणीस थोड़ा रुककर स्पष्ट रूप से बोले, "युवराज! आपकी यह सख्ती आपकी उम्र के लिए शोभाकारक नहीं है। दुनिया के 42 :: सम्भाजी
बुद्धिमान शासक अपने शत्रु से अन्धे होकर भिड़ते हैं किन्तु वही शासक अपने कर्मचारियों से शत्रुता मोल लेना टालते हैं। इसलिए जरा सँभलकर...'' बालाजी पन्त जैसे अनुभवी व्यक्ति ने ऐसी सलाह दी तो शम्भूराजा शर्मिन्दा हो गये। यह देखकर चिटणीस उनके पास सरक आये। प्यार से शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर बोले, "युवराज! आपको हतोत्साह करने का मेरा उद्देश्य एकदम नहीं था। पर क्या किया जाय? यह दुनिया ही उल्टी है। योद्धाओं का रणभूमि में गिरा रक्त वर्षा की हल्की बौछार से धुल जाता है किन्तु लिपिकों द्वारा कागज पर गिराई गयी स्याही, लिखी गयी बातें, विशेष रूप से गुप्त बातें, अनेक पीढ़ियों के लिए जानलेवा बन सकती हैं। यह खतरा अपने आप क्यों निमन्त्रित करते हैं?" सम्भाजी :: 43
विरह वेदना एक राज्याभिषेक के बाद शिवाजी महाराज पहली बार युद्ध के लिए बाहर निकल रहे थे। कर्नाटक के साथ युद्ध की तैयारी जोरों पर थी। चालीस हजार पैदल और बीस हजार घुड़सवार सैनिक लेकर शिवाजी महाराज और शम्भुराजा युद्ध के लिए निकलने वाले थे। दूसरे प्रदेश में इतनी बड़ी सेना के खाने पीने की उत्तम व्यवस्था भी आवश्यक थी। अस्त्र शस्त्र भी पूरे होने चाहिए थे। इस तैयारी के लिए किले के नीचे रायगढ़वाड़ी के जंगल में अठारह कारखाने रात दिन काम कर रहे थे। यन्त्रशालाओं, बारूदखानों और दरबार में बड़ी व्यस्तता थी। बड़े महाराज के सामने अनेक प्रश्न थे। शम्भुराजा भोर में उठकर दिन निकलने से पहले ही दरबार में आकर बैठ जाते थे। उनसे भी पहले इनामी रायप्पा आकर युवराज की राह देखते रहते थे। रात को अपने महल में लौटने के लिए शम्भुराजा को विलम्ब हो जाता था। येसूबाई और दुर्गाबाई शम्भुराजा की बाट जोहती रहती थीं। युवराज बहुत समझदार हो गये थे। बड़े महाराज द्वारा दी गयी प्रत्येक जिम्मेदारी बड़ी तत्परता से पूरी करते थे। समझदार पुत्र के सुख को महाराज पूरी तरह अनुभव कर रहे थे। सरदारों और मनसबदारों को अनेक बार वे स्वयं कहते थे—'इतने छोटे से कार्य के लिए मेरे पास क्यों दौड़ते हो? युवराज से मिलो। वे सक्षम हैं।' युद्ध में युवराज की महत्त्वपूर्ण भूमिका से उनके यार दोस्त बहुत प्रसन्न थे। शम्भुराजा की तैयारी के निरीक्षण और सहयोग के लिए महाराज ने बालाजी चिटणीस को अनेक हिदायतें दे रखी थीं। बालाजी पन्त युवराज के प्रत्येक कार्य पर बारीकी से ध्यान दे रहे थे। अपने साथियों के साथ घोड़ों को तेज दौड़ाते हुए शम्भुराजा आसपास के देहातों में जाते थे। चांदोशी गाँव में कोकणदिवा की ऊँची पहाड़ी की चोटी तक, लगभग चार हजार फीट की ऊँचाई तक दौड़ते हुए चढ़ने की 44 :: सम्भाजी