छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजाँच करने का आदेश दिया। अपने प्रति महाराज की बेरुखी और उपेक्षा से लज्जित हुए। अपनी नाराजगी को व्यक्त न करते हुए अपना उत्तरीय झटककर क्रोध से दरबार से बाहर चले गये। अब महल में बड़े महाराज, सम्भाजी राजा और येसूबाई के अतिरिक्त और कोई नहीं था। महाराज बड़ी दुख भरी नजरों से युवराज को देख रहे थे। युवराज की मुख मुद्रा में अनेक प्रकार की भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। सम्भाजी राजा के धीरज का बाँध टूट गया। वे बड़ी विनम्रता से बोले, "पिताजी! क्षमा करें! मैंने आपको बड़ा कष्ट दिया है। किन्तु...।" "पिताजी! कोई अपराध न करने पर भी किसी को अपराधी ठहराकर दंडित करना कहाँ का न्याय है? पिताजी थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाय कि आपका युवराज चरित्रहीन है। परन्तु रायगढ़ की सुरक्षा में इतनी शिथिलता कब से होने लगी?" "मतलब?" "चितदरवाजों के फौलादी किवाड़ आजकल कभी भी रात बिगत कैसे खोल दिये जाते हैं। स्वयं छत्रपति इस किले पर रहते हैं, तब भी?" शिवाजी महाराज व्यंग्यपूर्वक हँसे और बोले, "पागल हो गये हो क्या बेटा? अरे, शाम को जब एकबार चितदरवाजा बन्द हो जाता है तो दूसरे दिन सुबह तक आदमी तो क्या कोई कीड़ा भी ऊपर नीचे नहीं हो सकता।" महाराज की बात सुनकर संभाजी राजा ने कहा, "यदि ऐसी बात है तो उसी दरवाजे से, जैसा कि अण्णाजी पन्त और दूसरे लोग कहते हैं, भोर में आदमी जाते कैसे और सुबह होने से पहले वाड़कर की बहू, को भगाकर कैसे ले आते हैं?" शम्भुराजा के इस प्रश्न पर शिवाजी महाराज बहुत विचलित हो गये। युवराज के ऊपर बदनामी के कीचड़ उछाले जाने और घटित हो रही घटनाओं के बीच निश्चय ही कुछ गड़बड़ है। यह महाराज भी अनुभव कर रहे थे। युवराज के शब्दों ने महाराज के हृदय के टुकड़े टुकड़े कर दिये—"पिताजी! आजकल हमारे दिन इतने बुरे हैं कि महाराज ने अपने दिल के दरवाजे शम्भू के लिए बन्द कर लिए हैं। और चोर डाकू कभी भी आ जा सकें इसलिए चितदरवाजे के किवाड़ों को पैर लग गये हैं।" युवराज की बातें सुनकर महाराज के हृदय में ममता का बाँध टूट पड़ा। उन्होंने शम्भुराजा के कंधे पर हाथ रखकर बड़े प्यार से कहा, "मन को इतना खट्टा न करो बेटा! कहीं पर कुछ गड़बड़ी जरूर है। हम इसका पता अवश्य लगाएँगे।" पिताजी! स्पष्ट रूप से बताता हूँ। आपको अपने प्यारे पुत्र से अलग करने के लिए सारी अच्छी बुरी ताकतें एकजुट हो गयी हैं।" सम्भाजी · 27