छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज ने बड़े प्यार से शम्भूराजा को अपने समीप बिठाया। उनकी पीठ पर अपना ममता भरा हाथ फेरते हुए बोले, "हमारे कर्मचारियों से यदि कुछ त्रुटियाँ हुई होंगी तो निश्चय ही हम उनकी जाँच पड़ताल करेंगे। परन्तु बेटा, एक बात ध्यान रखना कि हमारे अष्ट प्रधान, हमारे सरदार, स्वराज्य का प्रासाद खड़ा करने में विगत चालीस वर्षों से रात-दिन, एक करने वाले हमारे प्राणों से भी प्रिय साथी रहे हैं। उनकी मान-मर्यादा उनके सम्मान का ध्यान रखना युवराज होने के नाते आपका भी कर्तव्य है। आप अपना व्यवहार सुधारें। नहीं तो...।" "नहीं तो क्या?" शम्भूराजा की आँखों ने प्रश्न किया, "आपसे अलग अकेले में जीने की हमें आदत डालनी होगी।" महाराज के इन कठोर शब्द को सुनते ही शम्भूराजा ने ऐसा अनुभव किया जैसे बाढ़ के बहाव में कोई बड़ा पेड़ उखड़ कर गिर गया हो। युवराज की आँखों में आँसू आ गये। उन्होंने कहा- "पिताजी! आपसे अलग रहने की कल्पना भी हमारे हृदय को चिथड़े चिथड़े कर देती है। एक बार इस संभाजी को हाथी के पाँव के नीचे कुचलकर मार डालने की सजा भले दे दीजिए। वह सजा मैं खुशी-खुशी स्वीकार कर लूँगा। किन्तु आपसे अलग रहने की कल्पना से मेरा हृदय विकल हो उठता है। अचानक शम्भूराजा को अपनी दादी जीजा माता का स्मरण हो आया। उन्होंने युवराज के कान में एक ही मन्त्र दिया था-"मेरे बच्चे शम्भू तू सदैव ही शिवाजी की छाया में रहना।" लेकिन अब समय बदल गया था। पूरी दुनिया को ममता की छाया देने वाले महाराज को शम्भू के लिए समय ही नहीं था। शम्भूराजा अचानक गद्गद स्वर में बोल पड़े-"पिताजी! कभी इस पागल संभाजी के बिना शिवाजी महाराज जीवित रह सकेंगे किन्तु आपकी छाया से दूर होकर इस संभाजी का जीवित रहना असम्भव है। बस वही हमारा दोष है।" शिवाजी महाराज ने अनुभव किया कि कहीं कोई भूल हो रही है। शम्भूराजा ने अपनी जन्मदात्री माँ का मुँह कभी नहीं देखा था। पुत्र के समान प्रेम से पालने वाली उनकी दादी जीजा माता भी कभी की भगवान को प्यारी हो गयी थीं। शिवाजी महाराज सोचने लगे, राज्याभिषेक समारोह तक जिसे होनहार पुत्र मानते थे; जिसने छोटी उम्र में कर्नाटक में कोलार की वतनदारी सम्भाली थी; फ्रांसीसी, पुर्तगाली, अंग्रेज जैसे अनेक देशों के वकील महाराज से मिलने से पहले जिससे परामर्श करते थे, जिसकी प्रखर बुद्धि और दिलेरी को देखकर लोग कह उठते थे- "यह तो भविष्य का सवाई शिवाजी है।" इस प्रकार जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा होती थी वही अपना पुत्र पास होते हुए भी दूर जा रहा है। किसी-न-किसी से अवश्य चूक हो रही है। यह सोचकर शिवाजी विचलित हो उठे और शम्भूराजा को बाँहों में भर लेने के लिए आगे बढ़े लेकिन शम्भूराजा तो वहाँ थे ही नहीं। वे और 28 :: सम्भाजी