छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"ठीक है फिर।" बीच का चौक पार करके चिटणीस थोड़ा आगे आ गये। फिर मुड़कर तुलसी वृन्दावन के पास खड़े हो गये। उन्होंने अपनी पगड़ी उतारकर सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा— "रानी साहिबा हम थक गये हैं। अन्तिम समय समीप आ रहा है। क्या पता कब क्या हो जाय? अगर कुछ हो गया तो हमारे खंडोबा और निलोबा का ध्यान रखिएगा।" "आवजी कहाँ नजर नहीं आ रहे हैं?" येसूबाई ने पूछा। "आवजी भी हमारे साथ जाने वाले हैं।" हिरोजी बीच में ही बोल पड़े। "चिटणीस अब चलना है न?" सोमाजी पन्त ने कहा। अपनी आँखों में आँसू छुपाये बालाजी पन्त हिरोजी और सोमाजी के साथ निकलकर चले गये थे। यही उनका आखिरी दर्शन था। येसूबाई और शम्भुराजा को आज अपना महल श्मशान की तरह भयानक लग रहा था। बालाजी पन्त चिटणीस साधारण आदमी नहीं थे। उन्हें अपना भाई मानकर शिवाजी महाराज राजापुर से रायगढ़ ले आये थे। पन्त अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के थे। स्वराज्य के प्रति उनकी निष्ठा अटूट थी। शिवाजी महाराज के लिए सिसोंदिया वंशावली के सारे कागजात ढूँढ़ने के लिए वे स्वयं राजपूताना गये थे। उनका हस्तलेख मोती जैसा सुन्दर है। जटिल से जटिल इबारत को वे याद कर लेते थे फिर अपने सुन्दर अक्षरों में लिखकर रख लेते थे। ऐसी उनकी आदत थी। वे बड़ी-बड़ी ग्रन्थियों की लम्बी-लम्बी इबारतें अपने मस्तिष्क में सुरक्षित रखते थे और उन्हें हू- ब-हू वैसे ही कागज पर उतार देते थे मानो किसी ने मुहर लगा दी हो। महल में खड़े काले दिखाई पड़ रहे थे। शम्भुराजा को नींद नहीं आ रही थी। वे इधर-उधर करवट बदलते हुए मछली की तरह छटपटा रहे थे। इसी बीच येसूबाई का स्वर उनके कानों में पड़ा--"महाराज, वे कोई सामान्य आदमी नहीं थे। मामाजी अपने समय के एक पहाड़ थे। जब लोगों को बड़े महाराज का आगरा प्रसंग स्मरण रहेगा, वे हिरोजी मामा को कैसे भूल सकते हैं?" येसूबाई के ये शब्द शम्भुराजा के सीने में तीर की तरह चुभ गये। वे तुरन्त बिस्तर से उठ गये। उन्होंने येसूबाई का हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख लिया और कहा "राजद्रोह की पहली कुटिल योजना हमने सह ली थी न? उन सभी को क्षमा कर दिया था न? येसू जो बात बहुत बुरी लगती है वह यह कि इस पागल सम्भाजी ने इन बुजुर्गों से हमेशा इतना प्यार किया और वे हमेशा मेरा प्राण लेने पर उतारू रहे। सम्भाजी : 295