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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 793 में से

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"किसी जमाने में अण्णाजी ने दक्षिण कोकण के सूबे को एक चट्टान बनकर संभाला था। किन्तु अण्णाजी ने अपनी बाद की सारी जिन्दगी मुझसे द्वेष करने में ही गुजारी। इन सभी को शिवाजी के पुत्र से बादशाह का शहजादा अधिक प्रिय लगा। अण्णाजी अपनी पुत्री हंसा का दुख कभी भूल नहीं पाये। पर उसके एकतरफा प्रेम में मेरा क्या अपराध? येसू आपको क्या बताऊँ? औंढ़ा के समीप उस कड़ी धूप में पहुँचने पर कलश ने फिर से मेरे पास दूत भेजा था। उन्हें आशा थी कि सम्भवतः अपने निर्णय पर हम फिर विचार करें। उन्होंने पूछा था—"महाराज क्या हम आपके हुक्म की सचमुच तामील करें?" उस समय बुजुर्गों की हत्या का आदेश देते समय मुझे कितनी मानसिक यातना हुई थी? ये सारे बुजुर्ग थे किन्तु उनके इस प्रकार राजद्रोह करने पर उन्हें मृत्यु दंड देना हमारा राजधर्म था। हमने राजधर्म का ही पालन किया। आज हम आँसू बहा रहे हैं, उनके पूर्वकृत्यों के लिए किन्तु मैंने उन्हें हाथी से कुचलवाया उनके राजद्रोह के लिए।" "क्षमा करें महाराज! मामाजी बार-बार याद आ रहे हैं। उन्होंने इन सारे लोगों को तैयार किया था। स्वराज्य को खड़ा करने में उन सभी का महत्त्वपूर्ण सहयोग था। उन्होंने इस कार्य में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया था।" "परन्तु तब किसी के मन में स्वार्थ का भाव नहीं जागा था। सत्ता के एक बाग हाथ में आने के बाद, स्वार्थी विचार अपने आप चिपकने लगते हैं। लोग वही होते हैं, उनका शरीर वही होता है पर मन बदल जाते हैं।" क्षणभर के लिए येसूबाई दुविधा में पड़ गयी कि पूछें या न पूछें? अन्ततः उन्होंने पूछा- "लोग कहते हैं कि आपके क्रोधावेश का कलश ने नाजायज फायदा उठाया। उन्होंने क्रोध का रूपान्तरण पैशाचिक दंड में किया?" "बिल्कुल झूठ है यह। सजा देने का कार्य उनके बदले किसी और को दिया जाये ऐसी प्रार्थना करते हुए वे बच्चे की तरह रोये थे। अन्ततः अपने मालिक का आदेश उन्हें मानना पड़ा।" "परन्तु चिटणिस के सम्बन्ध में थोड़े धैर्य से काम लिया होता तो?" "क्या करें पक्के सबूत जो थे। शहजादे को लिखे गये षड्यन्त्रकारी पत्र में उनके हस्ताक्षर थे। मैंने तो कविराज को साफ साफ कहा था कि अन्य लोगों पर मेरा कोई भरोसा नहीं है, किन्तु बालाजी को कुछ मत कीजिएगा। उन्हें सिर्फ बेड़ियाँ डालकर कैद कीजिए।" "फिर भी कविराज ने ऐसा किया?" येसूबाई ने विस्मय से कहा, "वैसा 296 :: सम्भाजी

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