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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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परचक्र एक शम्भुराजा रायगढ़ पर पहुँचे। दिन भर उन्होंने स्वयं को दरबार के कार्य में व्यस्त रखा। वहाँ मन न लगने के कारण वे जगदीश्वर के मन्दिर में घोड़े पर न जाकर पैदल गये। कुछ भी करने पर शम्भुराजा की आँखों के आगे से बालाजी की भूरी आँखों वाली छवि हट नहीं रही थी। दो दिन पहले शम्भुराजा ने औंढ़ा का प्रसंग कवि कलश से पुनः सुना था। वे असलियत को जानना चाहते थे। वहाँ का वह भयानक चित्र उनके मस्तिष्क में बहुत गहरे बैठ गया था। अपनी मृत्यु को सामने देखते हुए भी अण्णाजी भयभीत नहीं हुए थे। उल्टे सैनिकों के शस्त्रों की ओर सिर उठाकर निर्भीक भाव से देख रहे थे। जैसे वे आश्वस्त थे कि कभी न कभी तो दंड मिलना ही है। बालाजी चिटणीस की कहानी बड़ी हृदय विदारक थी। उनके पत्र से सब कुछ स्पष्ट हो चुका था। शेष अपराधियों को मार देने का शम्भुराजा को कोई दुख नहीं था। परन्तु इस बात का उन्हें बड़ा कष्ट था कि इन सभी में राज्य के प्रति निष्ठावान, सहृदय और निष्पाप बालाजी चिटणीस भी मार दिये गये। शाम को शम्भुराजा अपने महल में लौटे। किन्तु उनके पैर चन्दनी दरवाजे के पास अपने आप रुक गये। औंढ़ा के मैदान में राजद्रोही अपराधी मारे गये किन्तु उन्हीं के बीच का एक व्यक्ति किले पर रह रहा है। वह भी हमारे सप्त महल में। इस बात का ध्यान आते ही शम्भुराजा क्रोध से तिलमिला उठे। वे बड़ी शीघ्रता से सोयराबाई के महल की ओर जाने लगे। जिस प्रकार अचानक दौड़ते हुए किसी घुड़सवार के बाजार में घुसने से बकरियों और मुर्गियों की भीड़ इधर-उधर भागती है उसी प्रकार शम्भुराजा को देखकर बच्चे, नौकर-चाकर इधर उधर भागने लगे। सोयराबाई के महल के दास सम्भाजी :: 299