छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके साथ उसका बदनसीब बेटा सिफीर है।' "मैं एकदम से चिल्लाया और नाराजी से अब्बाजान से पूछा—मेरे चाचाजान और सिफीर भैया की ऐसी बुरी हालत किसने बनाई? कौन है वह मूर्ख मनुष्य? कहाँ है वह? इस पर मेरे अब्बाजान ने मेरी नाक पर ऐसा घूँसा मारा कि मैं चक्कर खाकर बगल में गिरकर कुछ समय के लिए बेहोश हो गया। दो दिनों के बाद मैंने उसी दुर्बल हथिनी की पीठ पर चाचाजान की सूखी लाश देखी थी। कुछ दिनों के बाद हमारा पाठशाला में पढ़ने वाले सरदारों के बच्चों ने मुझे एक हकीकत बतायी—मरने के पहले हमारे चाचाजान और सिफीर को एक अँधेरी कोठरी में रखा गया। एक रात जब बादशाह के जल्लाद उस कोठरी में घुसे, मशाल के उजाले में कत्ल करने वालों की डरावनी सूरत को छोटे सिफीर ने देखा तो वह छिपकली की तरह अपने पिता से लिपट गया। वह गाय के बछड़े की तरह रँभाने लगा। वह उन दुष्टों से प्रार्थना कर रहा था—नहीं, हमें आपका तख्त नहीं चाहिए, ताज नहीं चाहिए। हम दोनों यह देश छोड़कर चले जाते हैं। किसी दूसरे देश में जाकर, हाथ में कटोरा लेकर अल्लाह के नाम पर भीख माँगेंगे। लेकिन हमारे अब्बाजान को मत मारो। जैसे किसी के कपड़े फाड़कर उसके टुकड़े फेंक देते हैं उसी प्रकार उन दुष्टों ने छोटे सिफीर को खींचकर अलग फेंक दिया। उस समय चाचाजान भी अत्यन्त दीन स्वर में कह रहे थे—'मेरे छोटे भाई औरंगजेब को मेरा सन्देश दो—तुम्हारा तख्त और ताज तुम्हें मुबारक हो। हमें भिखारियों के कटोरे दे दो। किन्तु हम बाप बेटे को जीने दो।' "उन राक्षसों ने सिफीर को बगल की कोठरी में बन्द कर दिया। बकरा काटने वाला भी पहले बकरे को काटता है फिर उसकी खाल उतारता है। किन्तु उन दुष्ट जल्लादों ने हमारे चाचाजान के जीते हुए पहले उनके हाथ पैर काटे। अन्त में सिर कलम किया। बन्दीखाने की दीवार तोड़ देने वाली अपने पिता की चीख सिफीर ने सुनी थी। हिन्दुस्तान की तख्तपोशी करके सिंहासन पर बैठने का सपना अपने पिता के लिए जिस सिफीर ने देखा था, वही सिफीर अपने उस अभागे पिता के करुण अन्त का गवाह बना। "इसके बाद सिफीर को अब्बाजान राजमहल में ले आये। किन्तु उस मानसिक आघात से वह पागल हो गया था। शहजादा होने की हैमियत से ऐशोआराम भोगते हुए मुझे उस चचेरे भाई की मासूम सूरत मेरी आँखों के सामने हमेशा बनी रही। आज भी मुझे उसकी याद पागल कर देती है। अपने फायदे के लिए अपने घरवालों की हत्या करने वाला यह मेरा बाप मुझे तो शाही लिबास में लहराने वाला जहरीला साँप ही लगता है।" अपने पिता की दुष्टता का पहाड़ा पढ़ते पढ़ते शहजादा अकबर भावाविष्ट हो 324 सम्भाजी