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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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गया था। वह कुछ देर तक चुपचाप बैठा रहा। उसे लज्जा का अनुभव हो रहा था। तब शम्भूराजा ने उसे सान्त्वना देने के उद्देश्य से कहा- “और जो भी कहो, आपके अब्बाजान हैं बड़ी धार्मिक वृत्ति के। मन से पवित्र। दूसरों की स्त्रियों का आदर करने वाले एक नेक इनसान।” शम्भूराजा के ऐसा कहने पर शहजादा विषादपूर्ण हँसी हँसा। अपने बाप के आचरण की मीमांसा करते हुए उसने कहा, “हमारे अब्बाजान हमारे दादाजान शाहजहान जैसे रंगीले तो नहीं थे किन्तु रसिक तो थे ही।” “शहजादे! ऐसा क्यों कह रहे हो? आपके दादा ने भी तो अपनी बेगम की याद में इतना भव्य ताजमहल बनवाया। संसार के कला प्रेमियों के लिए एक आदर्श उपस्थित किया।” सम्भाजी ने कहा। “किन्तु ताजमहल बनाने के बाद हमारे दादाजान छब्बीस वर्ष तक जिन्दा रहे। इस बात को आप भूल रहे हैं क्या राजन?” शहजादा अकबर कहने लगा, “एक ओर ताजमहल खड़ा करके उन्होंने सारे संसार को बताया कि अपनी बेगम मुमताज महल से उन्हें कितनी मुहब्बत थी। दूसरी ओर हमारे दादाजान ने सरदारों की खूबसूरत औरतों को ही नहीं उस बुड्ढे ने दरबार की दासियों तक को नहीं छोड़ा। मुमताज महल की बहन फर्जाना बेगम को भी अपने बिस्तर पर खींचकर ले जाने मे सकोच नहीं किया। दादाजान के इसी दोगले व्यवहार से हमारे अब्बाजान को बहुत क्रोध आता था।” “यह सच है कि आपके पिता अपने पिता शाहजहाँ की तरह आचरण नहीं करते थे। उन्होने पराई स्त्रियों की ओर देखा तक नहीं।” कवि कलश ने कहा। “कविराज! ऐसा समझना भी ठीक नहीं है।” अपने को न रोक पाने के कारण अकबर कहने लगा, “आपको क्या पता? हमारे अब्बाजान की आज की लाडली बेगम उदयपुरी वास्तव में दाराचाचा की बेगम थीं। परन्तु चाचाजान की हत्या करने के बाद हमारे आलमगीर ने एक महीना भी नहीं बीतने दिया और उदयपुरी के साथ शादी कर ली। दारा चाचा की एक और बेगम थीं, रामादिल। उनके लिए भी हमारे अब्बाजान पागल हो गये थे। किन्तु यह बात अलग है कि उसने इनकी दाल नहीं गलने दी।” बोलते-बोलते शहजादा अकबर अपनी स्मृतियों में खो गया। वह बताने लगा, “एक बार मध्य एशिया से कुछ लोग अब्बाजान से मिलने आये थे। उस समय उन लोगों ने अब्बा जान को एक खूबसूरत दासी भेंट की थी। उस तुर्की दासी को अब्बाजान ने चुपचाप अपनी रखैल बनाकर जनानखाने मे रख लिया। उससे पैदा हुआ यत्लंगतोश खान नामक बेटा मुगल उमरावों के बीच घूमता दिखाई देगा।” कुछ आश्चर्य व्यक्त करते हुए कवि कलश ने कहा, “अकबर जी! गुस्ताखी सम्भाजी 325