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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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बाबा की नजर पड़ गयी। कोंडी बाबा पर कासिम का इतना भरोसा है कि वह उसके गले का हार बन गया। सिद्दी कोंडाजी पर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्हें दिलरुबा का हाथ पकड़ा दिया। यही नहीं दोनों के लिए अपना एक महल भी दे दिया। " शम्भुराजा ने कवि कलश की तरफ घूरकर देखा और सीधा प्रश्न किया- "क्यों कविराज, जंजीरे की सेवा में जाने का विचार तो नहीं है न ?" शम्भुराजा के इस प्रश्न पर दोनों खुलकर हँसे। किन्तु हँसते-हँसते शम्भुराजा एकाएक गम्भीर हो गये। उन्होंने कहा, "कविराज इस सारे प्रकरण में मुझे तो कुछ दाल में काला दिखाई पड़ रहा है। अन्यथा उस सिद्दी कासिम जैसा पत्थरदिल आदमी हमारे कोंडाजी को इतना क्यों चाहता है ?" जब दादजी देशपांडे की सेना खाडी से बाहर निकलने लगी तो शम्भुराजा चिन्तित स्वर में कहने लगे- "काका देशपांडे शीघ्रता कीजिए। खबर है कि वह औरंगजेब शीघ्र ही दक्षिण में पहुँचने वाला है। उसके आने से पहले हमें इस सिद्दी को पानी में डुबाकर मारना है। एक बार इस उंदेरी का काम तमाम हो जाये तो उसके बाद आपको जंजीरे पर भी आक्रमण करना है।" "जैसी आज्ञा महाराज।" "जंजीरे का यह अभियान सफल होने के साथ ही रायगढ़ पर अष्ट प्रधान मंडल में एक सम्मानित स्थान आपकी प्रतीक्षा कर रहा होगा।" रोध्या से शम्भुराजा तुरन्त रायगढ़ लौट आये। राजनैतिक गतिविधियों में पुनः सक्रियता आ गयी। शम्भुराजा के अनेक सरदार मुल्हेर, सोलापुर, अहमदनगर जैसे मुगल शासित प्रदेशों में गये थे। उनकी पचीस-तीस हजार की फौज मुगलों पर आक्रमण कर रही थी। लूट-पाट भी चल रही थी। हंबीरराव के नेतृत्व में मराठों की फौज एक बार पुनः बुरहानपुर पर आक्रमण कर रही थी। उसी समय दादजी के सबल नेतृत्व में उंदेरी पर आक्रमण किया गया था। शम्भुराजा को एक ही समय में अनेक स्थानों पर ध्यान देना पड़ रहा था। अलग-अलग जगह भेजी जाने वाली रसद, बारूद आदि का हिसाब रखना पड़ता था। अनेक स्थानों से गुप्तचर रायगढ़ पर आते थे। समाचार प्राप्त किये जाते थे। फिर नयी सूचनाओं के लिए गुप्तचरों को यथावसर भेजा जाता था। इस समय राजकीय कार्य-व्यापार का भार येसूबाई ने अपने हाथ में ले लिया था। अष्ट प्रधान और अन्य सहायक तो साथ में थे ही। शिवाजी महाराज के शासन काल में जिस प्रकार जीजामाता सारी राजनैतिक गतिविधियों पर ध्यान रखती थीं उसी प्रकार येसूबाई की निगाह भी प्रत्येक गतिविधि को बारीकी से देखती रहती थी। जहाँ कहीं भी जरा-सी चूक होती, वे तत्काल पकड़ लेती थीं। इसलिए सभी कर्मचारी और अधिकारी उनसे भयभीत रहते थे। सम्भाजी 349