छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक दिन सुबह-सुबह गुप्तचर रायगढ़ पर आये। खबर की गम्भीरता का अनुमान कर महारानी येसूबाई ने स्वयं दरवाजा खोला। गुप्तचर बिना कुछ बोले चुपचाप खड़े रहे। राजमहल का समाचार बारूदखाने तक पहुँच गया। तेज कदमों से चलते हुए शम्भुराजा वहाँ पहुँच गये। सभी के उदास चेहरे देखकर उन्होंने अनुमान लगा लिया था। उन्होंने खड़े-खड़े ही समाचार पढ़ा। उंदेरी की लड़ाई में मराठी सेना का सर्वनाश हो गया था। क्रोध से झुँझलाते हुए सम्भाजी बोले, "मैंने बार-बार समझाया था कि बड़ी सावधानी और चतुराई से युद्ध लड़ना है।" गुप्तचर कहने लगा— "दादजी की योजना एकदम ठीक थी। उन्होंने आस- पास की सभी खाड़ियों की नाकाबन्दी कर ली थी। आरम्भ में ही तोप के गोले से तटबन्दी में एक बड़ी सुराख बना ली थी। उसमें से दो सौ बहादुर मराठे सैनिक दुश्मन की गोलियाँ झेलते हुए भीतर जाने में सफल हो गये थे।" "फिर कठिनाई कहाँ पैदा हुई?" "समुद्र के किनारे थल गाँव के पास 'खूबलढ़ा' नाम का एक किला है। उसमें अँग्रेजों का बहुत बड़ा बारूदखाना है। वहीं से फिरंगी अँग्रेज ऐन समय पर हब्शियों की सहायता के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने अपनी तोपों से भयानक आक्रमण किया। सब समाप्त हो गया।" "समाप्त हो गया? मतलब ?" शम्भुराजा की आँखों के गोलक घूमने लगे। "अनेक मराठों ने लड़ते-लड़ते उन्देरी पर अपने प्राण दिये। दुर्देव से अस्सी जीवित मराठा सैनिक शत्रु के हाथ लग गये। उस दानव कासिम ने बाँस की तरह उन अस्सी मराठों के सिर बेरहमी से काट दिये। उनके शरीर ऊपर किले से पानी में फेंक दिये गये। अस्सी सिरों को चार बड़ी-बड़ी गठरियों में बाँधकर कासिम उन्हें लेकर जाने कहाँ चला गया।" "और अपने दादजी देशपांडे कहाँ हैं?" "उस प्रभुवीर ने बहुत पराक्रम दिखाया। उनके हाथ की खूनी तलवार छपाछप चल रही थी। किन्तु इसी समय तोप का एक गोला उनकी बाईं टाँग को छूता हुआ निकल गया। गन्धक के कुछ टुकड़े उनके पैर में धँस गये और दादजी तट के नीचे आ गिरे। अपने पुण्य प्रताप से वे नीचे खड़े जहाज में गिरे। अपने सिपाही उन्हें चेऊल ले गये हैं। वहीं उनका उपचार हो रहा है।" शम्भुराजा बहुत उद्विग्न हो गये थे। वे इस प्रकार तिलमिलाये जैसे किसी ने बाँस से उनके सिर पर वार कर दिया हो। चार दिनों में ही गुप्तचरों ने मुम्बई से मराठी वकील का सन्देश दिया। उसे खंडो बल्लाल ने पढ़ा और घबराई हुई स्थिति में वे शम्भुराजा के पास आ खड़े हुए। 350 :: सम्भाजी