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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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उनके चेहरे की घबराहट देखकर शम्भूराजा ने पूछा—“क्या हुआ खंडोजी?” “वह हैवान सिद्दी अस्सी मराठा सैनिकों के सिर लेकर मुम्बई गया था।” “तो?” “मझगाँव के बन्दरगाह में ले जाकर उस हरामखोर ने उनका बड़ा उपहास किया। भालों की नोकों में उन खोपड़ियों को खोंसकर उसने जुलूस निकाला। शराब के नशे में धुत सैनिकों ने ढोल-तासे बजाते हुए जुलूस निकाले।” “क्या कह रहे हो खंडोजी?” “जी हाँ! महाराज। यह तो कुशल हुई कि इसकी सूचना अँग्रेज गवर्नर को मिल गयी। उसने सिद्दी के इस जुलूस पर रोक लगा दी। इससे आगे होने वाला अपमान टल गया।” शम्भूराजा अचानक खड़े हो गये। उनका सिर चकराने लगा। आँखों से अंगारे फूटने लगे। क्रोध में उन्होंने पैर को जमीन पर दबाते हुए हाथ से दीवार में लगी खूँटी को खींचा। उनका आवेश और सन्ताप इतना अधिक था कि खूँटी उखड़कर हाथ में आ गयी। उस दिन सम्भाजी ने अन्नजल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। वे मन्दिर की ओर भी नहीं गये। किन्तु उनकी अंगारों-सी दहकती आँखें और उनकी हर साँस तथा उनका हर कदम, सभी को यह मूक सकेत दे रहे थे कि ‘अब रुकना नहीं है। अब नहीं रुकना है।’ शम्भूराजा के बिना कहे ही सारे घुड़सवार और सैनिक उनके आसपास इकट्ठे हो गये। अधिकारी भी जमा हो गये। दरवाजे से बाहर निकलते हुए कुछ स्मरण करके वे एकाएक मुड़े और राजगृह के मन्दिर की ओर चले गये। वहाँ पर उन्होंने किसी देव प्रतिमा की ओर देखा तक नहीं। देवालय के सामने वाले हिस्से में लाल कपड़े में लपेट कर रखी गयी पादुका को उठाकर अपने माथे से लगाया। शिवाजी महाराज को स्मरण करते बैठ गये। उनके पीछे पीछे वहाँ पहुँची येसूबाई ने कहा— “ऐसा नहीं लगता कि जजीरा इतनी सरलता से हाथ में आ जाएगा।” “आपका कहना ठीक है महारानी। इन पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और सिद्दी फिरंगियों को यह सह्य नहीं है कि जंजीरा मराठों की झोली में आ जाये, क्योंकि जंजीरे पर मराठी ध्वज के फहराने का अर्थ है महासागर पर मराठों की अपराजेय सत्ता। इस तथ्य को वे भली प्रकार जान चुके हैं।” शम्भूराजा ने शिवाजी महाराज के स्मृति चिह्नों को माथे से लगाया। उनके मुँह से शब्द निकले— ‘पिताजी अब प्रतीक्षा समाप्त हुई। मैं स्वयं जंजीरे के महाभयानक मगरमच्छ के मुँह में हाथ डालने जा रहा हूँ। अब देखना है कि कौन किसको निगलता है?’ सम्भाजी : 351