छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 354, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँच बुरहानपुर के महल में शाहंशाह टिके हुए थे। चिरागों के प्रकाश में महल चमक रहा था। सिर के ऊपर हंडेदार झूमरें जल रही थीं। बाई ओर परदे की आड़ में उदयपुरी बेगम, शहजादी जीनतुन्निसा और दूसरी बहू-बेगमें बैठी हुई थीं। अपने निजी पारिवारिक जनों के साथ आलमगीर का विचार-विमर्श चल रहा था। इसी समय शाही खोजा घबराते हुए आलमगीर के सामने आया। झुककर अत्यन्त दीन वाणी में बादशाह के अत्यन्त प्रिय तुर्की घोड़े की मृत्यु की सूचना दी। इसे सुनते ही शाहंशाह क्रुद्ध हो गया। क्रोध में ही पूछने लगा— "हसन मियाँ ऽ! अपने काम में आपकी कोई रुचि नहीं दिखाई पड़ती। घोड़े की पिछली टाँग में जरा-सा घाव लगा था। उतने जरा से घाव से घोड़े की मौत हो गयी।" हजरत हसन काँपते हुए बोले, "जहाँपनाह से रास्ते में मैं बार-बार यही विनती कर रहा था कि घोड़ा बीमार है। इसके साथ पीछे चार दिन रुककर मैं आता हूँ। किन्तु स्वामी सवार ने उसे वैसे ही घसीटते हुए ले आने का हुक्म दिया था।" "हूँ ऽऽ" "माफी चाहता हूँ हुजूर, लेकिन जख्म के लाइलाज होने से पहले उसे ठीक कर लेना चाहिए था।" बादशाह चमका! अपने वजीर एवं अन्य कर्मचारियों की ओर देखते हुए बोला, "देखो एक मामूली आदमी जाते-जाते सहज रूप से किस प्रकार अक्लमन्दी की नसीहत देता जा रहा है—'जख्म का इलाज होने से पहले उसे ठीक कर लेना चाहिए।'" लगभग तेईस वर्ष बाद बादशाह बुरहानपुर आया था। फिर भी तेईस वर्ष पूर्व अपने यौवन काल की स्मृतियाँ बादशाह के दिल में ताजी बनी थीं। इस परिसर में आम के कोमल पल्लवों को देखकर बादशाह अधीर हो उठता था। पत्तों से भरी डालियों के पीछे किसी की खनकती हँसी उसके कानों में पहुँचती थी। बादशाह उस समय सोलह-सत्रह वर्ष का था। तभी उसे आम के बगीचे में वह नवयौवना मिली थी। उसका नाम जैनाबादी था। किन्तु सभी उसे हीरा कहकर ही पुकारते थे। आम के बगीचे में आम का वह वृक्ष नये कोमल पल्लवों से लदा हुआ था। बाग में औरंगजेब के आने की कोई खबर उसे नहीं थी। अपनी मदहोशी में वह ऊपर उछली और अपनी कोमल बाँहों को ऊपर उठाया। बादशाह को लगा जैसे सूर्य 352 :: सम्भाजी