छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"जसवन्त सिंह के बेटे को गद्दी का हक दिलाने के लिए वह कमीना दुर्गादास मेरे पास आया था। दिल्ली में उसने हमारे साथ बहुत बहस की। जसवन्त सिंह की दोनों रानियाँ हमारे बन्दीखाने में थीं। बन्दीखाना लाल किले के पीछे और लाल किला दिल्ली में। कड़ा पहरा और ऊँची तटबन्दी होते हुए भी इस दुर्गादास ने क्या किया? दोनों रानियों को पुरुषों का लिबास पहनाकर, घोड़े पर बिठाकर, हमारे फौलादी पिंजरे से दूर भगा ले गया, असदखान!" "जहाँपनाह?" "जख्म गहरा होता जा रहा है। एक खतरनाक राजपूत एक धोखेबाज मराठे से जा मिला है। वह मराठा कोई ऐरा-गैरा नहीं, शेर शिवाजी का बेटा है।" "किब्लाए-आलम दुर्गादास का सम्भाजी से जाकर मिलना, आग से आग का मिलना है। यह भयानक आग दिन ब-दिन भड़कती ही जाएगी। बुझेगी नहीं।" बीच में उठकर जुल्फिकार खान बोल पड़ा- "सच है जवाँ मर्द।" चिराग के प्रकाश में बादशाह की कत्थई पुतलियाँ चमक उठीं। उसकी सफेद दाढ़ी चाँदनी सी चमक उठी। उसने अपनी जाप करने वाली माला को उठाकर आँखों से लगाया। कुरान की आयतें अस्पष्ट शब्दों में बुदबुदाई। उसके चेहरे पर एक अनोखा तेज दमक रहा था। वह गरजा- "आग भड़कने से पहले ही हम उन मशालों को बुझा देंगे।" ऊपर से बादशाह खूब आवेश दिखा रहे थे। किन्तु भीतर से अस्वस्थ और कुढ़ते हुए दिखाई पड़ रहे थे। बादशाह के बुरहानपुर पहुँचने के दस दिन बाद ही मराठों ने लुत्फुल्लाखान कोक की छावनी पर डाका डाला था। मुगल सेना के बहुत से सैनिक हताहत हुए। दस कोस अन्दर घुसकर मराठे ऐसा साहस करेंगे, ऐसा तो औरंगजेब ने कभी सोचा तक नहीं था। औरंगजेब को वह सब अकल्पनीय लगा। उसी रात किले के पास बारूद के बड़े गोदामों में भीषण विस्फोट हुआ था। यह कोई असम्भव घटना नहीं थी किन्तु सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने जैसी स्थिति थी। बादशाह की उम्र तिरसठ वर्ष होने पर भी उसका शरीर बलवान था। उसकी गति चपल और उत्साहपूर्ण थी। अपनी असीम महत्त्वाकांक्षाओं के कारण उसने अपने सुख चैन को तिलांजलि दे दी थी। तिरसठ वर्ष के बादशाह का उत्साह पचीस वर्ष के तरुण जैसा था। वह अपने सारे कार्य बड़े उत्साह से किया करता था। दिल्ली में रहकर दुनिया का एक समृद्ध और बलशाली शासक औरंगजेब हमेशा सजग रहता था। नित्य सन्ध्याकाल अपने खास गुप्तचरों से बिना समाचार लिए वह सोता नहीं था। पिछले पन्द्रह बीस वर्षों में उसने अपने गुप्तचरों, खबगियों और कुछ मराठों ने भी अनेक जानकारियाँ एकत्र की थीं। इस आधार पर उसने हिन्दवी स्वराज्य का एक नक्शा बनाया था। स्वराज्य की सभी छोटी-बड़ी ३९५ सम्भाजी