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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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इस तरफ का नेतृत्व भयानक भंडारी के हाथ में था। इसके अतिरिक्त मांदाड़ की खाड़ी में सत्तर नावों का बेड़ा तैयार खड़ा था। मराठा जहाजों पर भगवा झंडा फहराते देख सिद्दी बन्धुओं को पसीना छूटता था। सिद्दियों को इस बात का अनुमान हो गया था कि वे सेना के बल पर शम्भूराजा के सामने एक दिन भी नहीं टिक पाएँगे। जंजीरे की अजेय फौलादी तटबन्दी ही उनका एकमात्र आधार था। यह किला यदि उनके पास न होता तो उन्हें अपने पूर्वजों की तरह अफ्रीका को जाने कब लौटना पड़ गया होता। राजपुरी के पास समुद्र में दोनों ओर तरांडी, ताखे, गुरबा, पगार, शिबाड़ी जैसी अनेक जाति की जहाजें पानी पर तैर रही थीं। उन पर जंबुरे, बन्दुका, कड़ाबिन जैसी अनेक छोटी-बड़ी तोपें रखकर दोनों ओर से सेनाएँ तैयार थीं। बीच-बीच में गोले दागे जाते थे और फिर रोक दिये जाते थे। रसद और उच्च कोटि के गोला- बारूद लेकर पाँच हजार मराठा नाविक पानी में उतरे थे। जंजीरा किले पर फहराता हरा झंडा भयभीत दृष्टि से मराठा सेना की ओर देख रहा था। इस प्रकार का सुनियोजित और बलशाली आक्रमण जंजीरे पर पहली बार हो रहा था। ऐसे समय में कोंडाजी फर्जन्द जैसे वीर पुरुष का शत्रु से मिलना और उनका सिद्दियों की गुलामी करना, अपना स्वाभिमान भूल जाना मराठी सेना को बहुत बुरा लगता था। इसलिए यदि कोई भूल से भी कोंडाजी का नाम ले लेता तो मराठा सैनिक उसे घूरकर देखते थे और जंजीरे की ओर देखकर थूक देते थे। कोंडाजी को अपनी ओर करके सिद्दी ने मानो मराठों का एक हाथ तोड़ दिया था। किन्तु शम्भूराजा भी इस प्रकार के दाँव-पेंच में कम न थे। उन्होंने जंजीरे के एक वीर सिद्दी संबल के बेटे—सिद्दी मिस्त्री को अपनी ओर मिला लिया था। अपने साथ दो सौ नाविक दल लेकर वह सम्भाजी मे मिल गया था। सिद्दी मिस्त्री के साथ बैठकर शम्भूराजा जंजीरे से सम्बन्धित जानकारी लेते तो उधर कोंडाजी का कान पकड़कर सिद्दी बन्धु मराठों की शक्ति का अनुमान लगाते। युद्ध की स्थिति अपने चरम आवेश में थी। प्रातःकाल का समय था। सर्दी बहुत थी। रात की नींद से अलसाया हुआ कुहरा धीरे-धीरे जल की सतह से ऊपर उठ रहा था। घने कुहरे के बावजूद अपनी सेना सजग और उत्साहित देखकर शम्भूराजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। परन्तु उसी समय जंजीरे के मध्य भाग में, ऊँचाई पर चाँद सितारों वाला झंडा फहराता दिखाई पड़ा। यह शम्भूराजा के हृदय में भाले की नोंक की तरह चुभ रहा था। दुर्गादास और शाहजादा अकबर के साथ शम्भूराजा की जब भी बात होती थी, औरंगजेब का जिक्र निकल ही आता था। शम्भूराजा ने पूछा- “दुर्गादास ! अब 360 :: सम्भाजी