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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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कहाँ तक पहुँच गये हैं शाहंशाह ?'' "उन्हें अजमेर से बुरहानपुर आये पूरे दो महीने हो गये। '' "वे किसी भी समय महाराष्ट्र में पहुँच सकते हैं। " शहजादे अकबर ने अपनी राय व्यक्त की। शहजादे की बात सुनकर शम्भूराजा कुछ सोचते हुए गम्भीर हो गये। तब जल दुर्ग की ओर संकेत करते हुए दुर्गादास ने उनसे कहा— "शिवाजी महाराज जैसे अनुभवी राजा का ध्यान इस किले की ओर बहुत पहले जाना चाहिए था। '' "दुर्गादास जी, आपको क्या पता कि इस किले पर कब्जा करने के लिए शिवाजी महाराज ने क्या-क्या नहीं किया। पर क्या करते ? यह सामने आते आते ओझल हो जाता था।" "वह कैसे ?" "अब यही देखिए न ! अपने श्रीबाग का लाय पाटिल नाम का एक बड़ा कुशल नौसैनिक था। जाति का कोली। जमीन पर चलने की अपेक्षा पानी में तैरते हुए उसने अपनी उम्र गुजारी थी। एक बार हमारे मोरोपन्त पेशवा की सलाह से उसने एक योजना बनायी। दोनों के द्वारा किये गये निश्चय के अनुसार अमावस्या की अँधेरी रात में छावनी से सीढ़ियाँ लेकर भूत की तरह जंजीरे के पिछले दरवाजे के पास पहुँच गया। वहाँ सीढ़ियाँ लगाकर पेशवों की प्रतीक्षा करता रहा किन्तु रात में झाड़ियों में पेशवे रास्ता भूल गये या उन्हें रास्ता मिला ही नहीं। अन्तत. सीढ़ियाँ उतारकर उसे वापस लौटना पड़ा। लाय पाटिल का यह साहस साधारण नहीं था। उसकी प्रशंसा में पिताजी ने उसे पालकी का सम्मान दिया था। परन्तु उसने बड़ी विनम्रता से इस सम्मान को अस्वीकार कर दिया। उसने महाराज से कहा, 'महाराज जब किला जीता ही नहीं गया तो मैं पालकी में बैठकर क्या करूँ ?' "कुल मिलाकर सब की यह राय बन गयी थी कि इस किले पर किसी भूत- प्रेत की छाया है। अन्यथा उसे प्राप्त करने के लिए सभी इतने पागल क्यों होते। उस कब्जा न कर पाने से शिवाजी महाराज और उनके साथ अन्य लोगों के मन में ऐसी टीस क्यों बनी रहती ?" शम्भूराजा को राजपुरी के किनारे डेरा जमाये दो सप्ताह बीत चुके थे। सम्भाजी जिस दिन वहाँ पहुँचे थे उसी दिन से दोनों ओर से तोपों की छुट-पुट गोलाबारी होती रही थी। किसी जहाज में आग लगती तो लगता कि पानी में लगी आग से आकाश की ओर धुआँ उठ रहा है। कभी-कभी दोनों सेनाओं में सामना भी होता किन्तु शम्भूराजा को इस आक्रमण में कोई उत्साह नहीं था। शम्भूराजा आक्रमण क्यों नहीं कर रहे थे? इसका रहस्य उनके निकट सहयोगियों को भी नहीं पता था। सम्भाजी :: 361