छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजपुर की ओर नावों पर लगी तो तोपें बेताब हो रही-थीं तो उधर जंजीरे के सिंहद्वार के ऊपर लगी बाँगड़ी व्याघ्रमुखी और लांडा कासम जैसी पंच धातुओं से बनी अजेय तोपें पूरी तरह तैयार थीं। सिद्दी का विदेशों से बड़ा व्यापारिक सम्बन्ध था। इसका लाभ उठाकर उसने पेरिस, इस्ताम्बूल से लेकर पुर्तगाल तक के सुदूर देशों से उच्च कोटि का तोपखाना बना लिया था। इन तोपों को महत्त्वपूर्ण बुर्जों पर लगा दिया गया है। शम्भूराजा के सहकारी मुख्य आक्रमण के सम्बन्ध में उनसे घुमा-फिराकर पूछते रहते थे। शम्भूराजा इन प्रश्नों से ऊब गये थे। शम्भूराजा ने अपनी बाईं ओर खड़े शहजादा अकबर की ओर देखा किन्तु शहजादा वहाँ से उठकर पीछे चला गया था। वह अस्वस्थ दिखाई पड़ रहा था। उसकी ओर देखते हुए शम्भूराजा ने पूछा— "क्या बात है दुर्गादास ?" "शहजादे का लड़ाई में ध्यान ही नहीं है, और क्या ?" "कहाँ गायब हो गये हैं? कहाँ?" अन्य सहयोगियों के अलग चले जाने पर दुर्गादास शम्भूराजा के पास आकर धीरे से बोले, "रूपकुँवरि नाम की एक वेश्या है। उसका चौल के बाजार में कोठा है। उसकी अपनी कोठी है। शहजादे उसी के पास हमेशा जाया करते हैं। पिछले कई दिनों से अपने कद्रदान शहजादे के उधर न जाने से वह उदास हो गयी और दो दिन पहले यहाँ चली आयी। उसने मुरुड की बंजर भूमि पर अपना डेरा डाला है। कल से दो बार उमका शागिर्द शहजादे से मिल चुका है। तभी से अकबर बहुत अस्वस्थ हो गये हैं।" दुर्गादास की बात सुनकर शम्भूराजा हँसे और सेवक को भेजकर शहजादा अकबर को अपने पास बुला लिया। उसे छेड़ते हुए बोले— "अकबर, इसमें इतना शरमाने की क्या बात है? हम भी जाने-माने रसिक हैं। दिल्ली के शहजादे का दिल चुराने वाली वह नृत्यांगना कौन है? जरा हम भी तो देखें।" उस शाम शम्भूराजा अपने डेरे से बाहर निकले। यह देखकर शहजादा बहुत प्रसन्न हुआ कि उसकी दिलरुबा का नृत्य देखने के लिए शम्भूराजा सचमुच आ रहे हैं। उस रात मुरुड की बंजर भूमि पर एक शाही तम्बू में नृत्य की महफ़िल सजी थी। रूपकुँवरि जन्म से हिन्दू थी किन्तु उसकी माँ का विवाह एक सिद्दी सरदार से हुआ था। गाना-बजाना उसका पेशा था। स्वयं शम्भूराजा के महफिल में उपस्थित होने के कारण रूपकुँवरि के घुंघरुओं ने विलक्षण लय और गति पकड़ ली थी। वह मोरनी-सी नाच रही थी, हँस रही थी। अपनी मीठी आवाज में गाते हुए गर्दन को झटके दे रही थी। 362 :: सम्भाजी