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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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रूपकुँवरि नाचते-नाचते शहजादा अकबर और शम्भूराजा के सामने आ रही थी। उसके मलमल के कुर्ते पर एक रत्नहार बहुत चमक रहा था। वे रत्न इतने उच्च कोटि के थे कि पास रखे चिरागों का प्रकाश उन पर से परावर्तित हो रहा था। उस दुर्लभ प्रकाश से पूरी रंगशाला प्रकाशित हो रही थी। शम्भूराजा का ध्यान उस रत्न हार पर गया। उन्होंने उँगली से संकेत करके रूपकुँवरि को अपने पास बुलाया और उसके गले का वह रत्नहार शीघ्रता से खींच लिया। हार में लगे रत्न चमकते हुए चारों ओर बिखर गये। शम्भूराजा के इस हस्तक्षेप से संगीत रुक गया। शम्भूराजा की क्रुद्ध मुद्रा देखकर रूपकुँवरि दस कदम पीछे हट गयी। उसके साज़ी भी डरकर दूर खड़े हुए। शम्भूराजा के उस परिवर्तन से शहजादा अकबर भी घबरा गया। शम्भूराजा ने क्रोधावेश में पूछा- "शहजादे, यह रत्नहार किसका है?" "आपने ही मुझे भेंट किया था।" अकबर ने उत्तर दिया। "वह मैंने एक राजा को भेंट किया था किसी नर्तकी को नहीं।" शहजादा अकबर कुछ लज्जित हुआ। फिर भी शम्भूराजा की बात का उत्तर देते हुए बोला, "सम्भाजी महाराज, यहाँ पर हम अपनी मर्जी के शहंशाह हैं। हमे जैसा उचित लगेगा वैसा करेंगे।" अकबर के इस व्यवहार से शम्भूराजा भयंकर रूप से क्रोधित हुए। वे गरजकर बोले, "ऐसा है तो पहले मेरी आँखों के सामने से दूर हो जाओ और अपने मनोराज्य या दिल्ली में बादशाह बनकर बैठो।" शम्भूराजा का यह रुद्र रूप देखकर शहजादा अकबर भयाक्रान्त होकर स्तब्ध रह गया। जो कुछ हो चुका उससे अधिक अप्रिय प्रसंग न घटित हो इसलिए दुर्गादास शहजादे को लेकर बाहर चले गये। महफिल अधूरी ही रह गयी। शम्भूराजा कवि कलश के साथ बाहर जाने लगे। इसी समय साहस करके रूपकुँवरि सामने आ गयी। शम्भूराजा का पैर पकड़ते हुए वह गिड़गिड़ाकर बोली, "महाराज, राजा-महाराजाओं की भाँति ही हम नृत्यांगनाओं की भी एक दुनिया होती है।" "क्या कहना चाहती हो?" "अब इसके अधिक किसको, कैसे और किस मुख से बताएँ?" कहते- कहते रूपकुँवरि की आँखें छलछला उठीं। वह रुँधे हुए स्वर में बोली- "अब सभी जगह यही बेइज्जती होगी कि रूपकुँवरि की महफिल से महाराज बीच में ही उठकर चले गये। कोई कहेगा कि अब रूपकुँवरि को पहले जैसा नाचना ही नहीं आता। कोई कहेगा कि वह अब बूढ़ी हो गयी है। इसलिए महाराज, मैं आपके सामने आँचल फैलाकर न्याय माँगती हूँ। इस नाचीज नर्तकी पर दया करें। इस प्रकार आधी महफिल छोड़कर न जाएँ।" रूपकुँवरि की बात सुनकर शम्भूराजा ने कवि कलश की ओर देखा। कलश सम्भाजी .. 363