छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजंजीरे के भव्य आवास में रहने वाले सिद्दी खैरियत खान और कासिम खान बहुत व्यथित हो गये थे। वहाँ की तटबन्दी ने इससे पहले कभी ऐसी स्थिति का अनुभव नहीं किया था। ज्वार के आते ही उन्मुक्त लहरें जोर-जोर से तटबन्दी से टकराती थीं। लगता था आधे बुर्ज को पानी ने निगल लिया है। नौ-दस फीट गहरी राजापुर के पास की खाड़ी आन्दोलित हो गयी थी। ज्वार के बाद पानी उतरते समय किले की सीढ़ियों पर पानी मेंढक की तरह उछलता हुआ नीचे आता था। किन्तु फिर भी खाड़ी का पानी अपनी निश्चित सीमा से नीचे नहीं आता था। अभी भी शम्भूराजा पूरी शक्ति के साथ युद्ध के लिए पानी में उतर नहीं रहे थे, किन्तु वे शान्त भी नहीं थे। अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाने में व्यस्त थे। जंजीरे से आकर मिले सिद्दी मिस्त्री ने जंजीरे की एक मोम की प्रतिकृति तैयार की थी। शम्भूराजा ने उसे बीच की चौरंगी पर रख दिया था। इसी को दृष्टि में रखकर अनेक साहसी योजनाओं पर चर्चा की जा रही थी। अँधेरी रात में जंजीरे पर सीढ़ियाँ लगाने वाले लाय पाटिल की प्रशंसा की जाती थी। दादजी प्रभु देशपांडे, दरिया सारंग, भयानक का भाई रायनाक भंडारी, काथें जैसे लोग शम्भूराजा को घेरकर बैठते। आक्रमण सम्बन्धी विचार करते-करते मशाल का तेल समाप्त हो जाता किन्तु उनकी ललाई ज्यों की त्यों बनी रहती। एक दिन सुबह दादजी देशपाण्डे लाठी के सहारे लँगड़ाते हुए शम्भूराजा के अभिवादन के लिए आ गये। उनके साथ हुजरे भी थे। वे एक बोरी भरकर मीठे शहाले ले आये थं। कोयते से काटकर हुजरे ने सभी के हाथ में दिया। शम्भूराजा ने दादजी की ओर देखा। उंदेरी के आक्रमण के लिए उत्साहपूर्वक निकलने वाले दादजी का पुष्ट शरीर उनकी आँखों के सामने सगुण साकार हो गया। दुर्भाग्य से उसमें दादजी को सफलता नहीं मिली। उल्टे सिद्दी सेना मे लड़ते हुए वे तटबन्दी मे गिर गये और उनका एक पैर टूट गया। मात्र लाठी और शम्भूराजा के प्रेम के सहारे फिर से मैदान में खड़े थे। चर्चा के दौरान सिद्दी मिस्त्री ने कोंडाजी की बात छेड़ी। उसने कहा, “दलरुबा नाम की उस ईरानी युवती के मोह में फँसकर अपना मराठा मर्द बुरी तरह बर्बाद हो गया।" शम्भूराजा कुछ विचित्र तरह से मुस्कराये। बबूल सा ऊँचा और मजबूत तने सा कोंडाजी का साँवला शरीर उनकी आँखों के मामने साकार हो गया। उनके साथ हरे लिबास और नीली आँखों वाली दिलरुबा की उन्होंने कल्पना की। इसी समय कवि कलश ने उन्हें स्मरण दिलाया— "महाराज, कोंडाजी का आवास और घर द्वार जब्त करने का आदेश कब दे रहे हैं? गद्दार को सजा मिलनी ही चाहिए।" 366 सम्भाजी