छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके पुण्य और बौद्धिक चैतन्य का पावन प्रसाद है। यह दैव दुर्लभ आशीर्वाद यों ही नहीं समाप्त हो जाएगा। चलिए, निर्णय के अनुसार उस बादशाह और उसकी पाँच लाख की सेना पर टूट पड़ें। जिस प्रकार मद्य मे पागल हाथी किले के सिंहद्वार पर सिर पटकता है और द्वार में लगे बड़े-बड़े खीले उसकी मस्ती को दूर कर देते हैं, उसी प्रकार कल रायगढ़ पर अधिकार न कर पाने के कारण औरंगजेब नाम का बूढ़ा हाथी हमारे दरवाजे पर निराश होकर धक्का मारेगा, अपना मस्तक फोड़कर हमारे सिंहद्वार पर अपना खून बहाएगा। तभी सच्चे अर्थों में विजय की रंगोलियाँ बनाएँगे और नौबत- नगाड़े बजाने का आरम्भ करेंगे।" तीन शम्भुराजा विचारगोष्ठी से हंबीरराव को अपने साथ अन्दर ले गये। बीच के चौक में हंबीरराव बैठ गये सम्भाजी राजा और महारानी येसूबाई हंबीरराव की ओर एकटक देखते रहे। उनकी इस दृष्टि से हंबीरराव विचलित हो गये। शम्भुराजा ने दुखी स्वर में कहा, "हंबीरराव, जिन पर हम प्राण निछावर करते हैं, ऐसे तीन प्राणी तीन वर्ष से बादशाह के बन्दीखाने में पड़े हुए हैं। उनके बिना यह वैभव, यह गजपद हमें दुखी करता है।" हंबीरराव ने राजा की ओर घबराई निगाहों से देखते हुए कहा, "एक राणूबाई और दूसरी दुर्गाबाई- क्या यही दो नहीं?" "हंबीरराव हमें एक कन्यारत्न की भी प्राप्ति हुई है। यह समाचार बाद में मिला है। यह समाचार वहाँ के हमारे अपने आदमी ने दिया है। इसलिए खबर पक्की है। हमारी कन्या अब तीन वर्ष की हो गयी होगी।" यह कहते हुए शम्भुराजा का स्वर काँपने लगा। हंबीरराव को धक्के पर धक्के लग रहे थे। राजकन्या की प्राप्ति की खबर, बादशाह के अन्तःपुर तक पहुँचे शम्भुराजा के हाथ। हंबीरराव को विस्मयकारक लगा। किन्तु उन्हें सोचने के लिए अधिक समय न देते हुए शम्भुराजा गरजे- "क्यों हंबीरराव, क्यों? पिछले तीन वर्षों से हमें कहते रहे है। हमें स्वयं अहमदनगर के किले पर आक्रमण करना चाहिए था। अपने प्रियजनों को शत्रु के बन्दीखाने में सड़ता सम्भाजी :: 391