छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुआ छोड़कर, यहाँ राजा बनकर जीने का हमें क्या अधिकार है?'' "शम्भू बेटे! स्वराज्य का सेनापति होने के नाते मुझे आप से भी अधिक लज्जा आती है। हम इस बात से बहुत लज्जित हैं। परन्तु हम शान्त नहीं बैठे थे। हमारी दस-दस हजार की फौजें उस किले पर आक्रमण कर चुकी हैं। उनके बाद हमारी फौज तूफानी चक्रवात की तरह अहमदनगर के चारों ओर चक्कर काटती रहीं। परन्तु निजाम घराने का वह किला बहुत मजबूत है। वहाँ का किलेदार रूहूल्लाखान भी शक्तिशाली है। वह प्रदेश मुगलों का है और सह्याद्रि से बहुत दूर है। शत्रुओं का पहरा भी शक्तिशाली है फिर भी हम पीछे नहीं हटे।" "हंबीरराव, कुछ तो कीजिए।" येसूबाई ने अतिस्वर में कहा। "और यदि आपसे हो सकता है तो हमें जाने दीजिए। हम स्वयं जाकर किले का दरवाजा तोड़ेंगे।" "महाराज! आपकी इसी उतावली प्रवृत्ति से हमें भय लगता है।" हंबीरराव कहने लगे- "शम्भू बेटे, आप शान्तिपूर्वक सारी बातों को अच्छी तरह समझ लें। बड़े महाराज का जन्म शिवनेरी किले पर हुआ था। किन्तु उस किले से लगा हुआ जुन्नर का इलाका हमेशा मुगलों के अधीन रहा। जालनापुर से आते समय शिवाजी महाराज को संगमनेर के समीप रणमस्तानखान ने किस तरह पकड़ रखा था? उन्हीं के मुँह से आपने सुनी थी न वह कहानी? इसलिए कहता हूँ कि धीरज रखिये। लाखों लोगों की आजीविका आप पर ही निर्भर है। आप हमारे हिन्दू साम्राज्य के आधार स्तम्भ हैं। अतः इस प्रकार होशो-हवास खोकर कठिनाई में उलझने का आपको अधिकार ही नहीं है। हंबीरराव ने रात का भोजन शम्भूराजा के साथ लिया और दोनों ने अनेक राजनैतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। एक ही समय में अनेक मोर्चों पर मुगलों के साथ मराठों का युद्ध आरम्भ हो गया था। इसलिए हंबीरराव का यहाँ अधिक दिन रुकना सम्भव नहीं था।" दूसरे दिन बिदा लेने के लिए हंबीरराव राजमहल में पहुँचे। सन्ध्या का समय था। ग्यारह-बारह पालकियाँ बाहर खड़ी थीं। हंबीरराव ने देखा कि महारानी कहीं जाने की तैयारी में हैं। उन्होंने पूछ लिया-"बहूरानी पालकियाँ तो रायगढ़ की दिख रही हैं, शृंगारपुर की नहीं।" "हाँ!" येसूबाई चौंक गयीं। "परन्तु इतनी देर से निकल कर आप शृंगारपुर पहुँचेंगी कैसे?" हंबीरराव ने चिंतित होकर पूछा। सत्य को छुपाना महारानी के लिए कठिन हो गया। बगल में खड़ी माताजी भी दुविधा में पड़ गयीं। "हंबीरराव हमें प्रसूति के लिए शृंगारपुर नहीं यहीं गंगोली की ओर जा रहे हैं। पुत्र का जन्म वहीं पर हो, ऐसी हमारी माताजी और भाई की 392 :: सम्भाजी