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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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दूसरे दिन सभी ओर से युद्ध आरम्भ नहीं हुआ। चिक्कदेव जितना साहसी, मगरूर और मक्कार था उतना ही ताकतवर भी। सुबह से ही दोनों सेनाओं के बीच छिट- पुट युद्ध हो रहा था। थोड़ी बहुत तलवारबाजी किन्तु कोई भी निर्णायक युद्ध नहीं कर रहा था। जैसे-तैसे दोपहर बीती दूरी पर वर्षा होने का दृश्य दिखाई पड़ रहा था। घोड़ों को संभालते लोग, छोटी-बड़ी तोपों के गोलन्दाज, भालाधारक राउत, संरक्षक आदि सभी आश्चर्य से आसमान की ओर देखने लगे। वह सचमुच वर्षा नहीं थी। बल्कि बाणों से वर्षा थी। अचानक सूँऽ सूँऽऽ करते बाण आने लगे। ये बाण लोगों के पीठ-पेट में घुसने लगे। आसमान से आने वाले बाणों की दिशा मालूम नहीं पड़ती थी। किन्तु पागल मधुमक्खियों की तरह जो भी मिलता था उसे काटती थीं। घोड़ों की गर्दनों में, मुँह में, आँख में, सैनिकों के पेट में, बाँहों में ये बाण घुस रहे थे। बाणों की तीक्ष्णता के कारण कि घायलों के शरीर से रक्त बहने लगा। इन बाणों की वर्षा से हड़कम्प मच गया। मराठों के होश उड़ गये। 'हे भगवानऽऽ, मर गयाऽऽ, ओ माँ' जैसी चीत्कारें मराठों की निकलने लगीं। कुतुबशाही में सुख की रोटियाँ तोड़ने वाले हट्टे-कट्टे सैनिक भी सामना नहीं कर पा रहे थे। जिस ओर भी रास्ता मिला उधर भागने लगे। 'अल्लाहऽऽ' 'तौबाऽऽ' 'बचाओऽऽ' शब्दों के अतिरिक्त उनके मुँह से कोई और शब्द नहीं निकल रहा था। लेकिन उनकी परेशानी बढ़ती जा रही थी। चालाक घुड़सवार नीचे कूदकर भाग रहे थे। बहुत से लोग वहीं गिरकर मर रहे थे। बाणों से बिंधे घोड़े उन पर गिर रहे थे। आदमी कुचले जा रहे थे। हैदराबादी सैनिकों की भाग-दौड़ सबसे अधिक थी। उनके सेनापति के पास शम्भूराजा घोड़ा दौड़ाते हुए पहुँचे। 'भागो मतऽ' 'भागो मतऽऽ' जोर-जोर से कहने लगे। उसी समय हरजी राजा आश्चर्यचकित उनके पास आये। वे अपना रक्त-पसीना पोंछते हुए पूछने लगे- "शम्भू महाराज क्या करें? चिक्कदेव बहुत बलशाली है, बाणों की गति भी अचूक है।" "जीजाजी थोड़ी देर रुकिये, धैर्य धारण कीजिए। युद्धभूमि से पीछे हटना मराठा धर्म नहीं है।" शम्भूराजा, हरजी और कवि कलश के घोड़े युद्धभूमि में थिरक-थिरककर नाच रहे थे। घुड़सवार राउतों को धीरज बँधाने की वे कोशिश कर रहे थे। परन्तु बाणों की धार बहुत विषैली थी। जैसे कि इक्के-दुक्के राहगीर पर जंगल में विषैली चोंचों वाली पंछियाँ आक्रमण करें, उसी तरह बाण आ रहे थे। मराठों की युद्ध सामग्री का पूरा पता लगाकर चिक्कदेवराजा ने आक्रमण किया था। अँधेरा हो जाने पर भी बाणों की वर्षा थम नहीं रही थी। अन्य अवसरों पर जो घोड़े आग में से कूद जाते थे, वे नाक के बल गिर रहे थे। एक साथ दस-दस जवानों से लड़ने वाले सम्भाजी :: 403