छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिए सन्देश भेजा था। कवि कलश जोर-जोर से पढ़कर सुनाने लगे— “मराठो, अपने सह्याद्रि पर्वत पर चले जाओ। तुम्हारा हमारे दक्षिण से सम्बन्ध क्या है? हमारे हाथ से जब तक बचे रहते हो उसे ईश्वर की कृपा समझो। वाणावर की सीमा रेखा हमने बाणों और तलवारों से खींची है। मैसूर राज्य पर आँखें ऊँची करके देखोगे तो तुम्हारी आँखें फोड़ देंगे।” बहुत देर तक चर्चा होती रही। एकोजी राजा ने सुझाव दिया— “शम्भू बेटे अब आ ही गये हो तो कुछ दिन तंजौर में चलकर रहो। अपनी सेना के साथ रहो। किन्तु रायगढ़ को छोड़कर तुम्हारा अधिक दिन तक दक्षिण में रहना ठीक नहीं होगा। शीघ्रता से सह्याद्रि चले जाओगे तो कम से कम सुरक्षित तो रहोगे।” “चाचा साहब, यह सम्भव नहीं है।” शम्भुराजा घायल शेर की तरह गुर्राए। “एक तो पराजित होकर अपने राज्य में जाना हमारी जाति और कीर्ति के लिए शोभनीय नहीं है। इसके अतिरिक्त वह कालसर्प हमें वहाँ जाने दे तब न वहाँ पीछे जायें?” “कौन?” “औरंगजेब !” शम्भुराजा बहुत दुखी स्वर में बोले, “डगमगाते हुए चलने वाले शराबी और पराजित राजा की स्थिति एक जैसी होती है। इनकी कनपटी पर जो एक चपत नहीं लगाता वह आलसी कहलाता है।” “शम्भुराजा... ?” “जी चाचा जी। सेना में उत्साह और संकल्प की आग फूँकने के लिए हमने कर्नाटक और तमिल पर आक्रमण किया था, पराजित होने के लिए नहीं।” “शम्भुराजा, यह तो बताइये कि आपकी आगे की योजना क्या है?” “पराभव के जालिम जख्म को धोने के लिए नयी विजय जैसा रामबाण उपाय दूसरा कौन हो सकता है? चाचाजी?” शम्भुराजा ने प्रश्न किया। सात एक रात को असदखान डरते हुए औरंगजेब से मिलने आया। उसके चेहरे पर अंकित उलझन बादशाह से छिपी न रही। किसी प्रकार शब्दों को जोड़ते हुए असदखान ने सम्भाजी :: 405