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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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महाराज को देखते रहे। उसके बाद उनके कंठ फूटे— “महाराज आपने फिरंगियों का जो दुर्दशा की उसे देखकर हमें अत्यन्त आनन्द हुआ। किन्तु आज भी उनका गुरूर कम नहीं हुआ है।” एक बूढ़ा आगे आकर अपने हाथों को नचाते हुए बोला, “वहाँ रायगढ़ पर रहकर आप क्या जान पाएँगे कि हम हिन्दू इन फिरंगियों के शासन में कैसे जीते हैं ? हमारे मन्दिरों में देवता अब नहीं रह गये है। फिरंगियों ने बलपूर्व हिन्दुओं को धर्मान्तरण के लिए विवश किया। हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ तालाबों में फेंक दीं। इन लोगों ने कुँओं की जगत पर सामान्य पत्थर के रूप में मूर्तियों को गाड़ रखा है। पानी खींचते हुए रस्सियों की रगड़ से ये मूर्तियाँ अब टूटने लगी हैं। आप स्वयं ही चलकर देख लें।” “मुझे सब पता है। गोवा में शान्ता, दुर्गा, महालक्ष्मी, मंगेशी जैसे देवस्थलों को भी अपने चारों ओर तटबन्दी और लोहे के मजबूत दरवाजों की आवश्यकता होती है। फिरंगियों के अत्याचार से यहाँ के देवी देवताओं को भी पसीना छूटता है।” “वही हम भी कह रहे हैं, महाराज ! जब हमारे देवताओं की ऐसी दशा है तो हम लोगों की क्या होगी ? फिरंगियों से बदला लेने का यही अच्छा अवसर है, आप हमें रोके नहीं।” पाँच-छः लोग एक साथ बोल उठे। सामने जमी भीड़ में लोग अपने भाले और लाठियाँ ऊपर उठाकर अपना आवेश व्यक्त करने लगे। किन्तु शम्भूमहाराज ने डाँटते हुए कहा— “खामोश ! किसी तरह का शोरगुल न करो। इस बात को कभी न भूलो कि गोवा पर आक्रमण शिवाजी के पुत्र का हो रहा है, औरंगजेब के किसी शहजादे का नहीं।” महाराज की कठोर वाणी से सभी लोग सन्न रह गये, तब महाराज ने कहा, “आप लोगों की पीड़ा को मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ। हिन्दुओं का राजा होने के नाते आप मेरे सामने अपनी हर माँग रख सकते हैं। हम आपकी हर माँग पूरी करेंगे। किन्तु इस बात का हमेशा स्मरण रखो कि किसी के द्वेष की नींव पर बनाए गये हमारे मन्दिर टिकने वाले नहीं हैं।” कवि कलश को महाराज ने कुछ नये आदेश तैयार करने के लिए बुलाया। उन्होंने जिन हिन्दू मन्दिरों को फिरंगियों ने ध्वस्त कर दिया था, उनके लिए अपने खजाने से धन देने की व्यवस्था की जिससे उनका पुनर्निर्माण हो सके। धर्म की रक्षा के लिए कुछ योजनाएँ भी बनाई गयीं।” सभी लोग प्रसन्न हो गये। किन्तु मडगाँव का वह वृद्ध जो अभी-अभी महाराज से बातें कर रहा था, सन्तुष्ट नहीं लग रहा था। महाराज ने उसे छेड़ते हुए उसके सामने हाथ जोड़ दिये। उसने बड़े प्रेम से कहा, “सरकार आपने हमारे सम्भाजी :: 483