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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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प्रार्थना के बीच-बीच में साष्टी और बारदेश से समाचार भी आ रहे थे। कभी 'शापोरा' किले के हाथ से जाने की तो कभी पुर्तगालियों के 'जिये' और 'पिये' किलों पर मराठों के जोरदार आक्रमण के समाचार आ रहे थे। आक्रमणों के समाचार सुनकर वहाँ के लोग और भी भयभीत हो रहे थे। एक दिन सवेरे सवेरे राजभवन के काले घोड़े चर्च के परिसर में आकर रुके। शाही घोड़ागाड़ी से कांट साहब नीचे उतरे। उनकी हालत बहुत शोचनीय थी। रात में जागते रहने से आँखें लाल हो गयी थीं। आँखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये थे। दाढ़ी कुछ अधिक सफेद लग रही थी। शरीर उत्साहहीन होने के कारण चाल में शिथिलता आ गयी थी। इस दशा में इस सद्गृहस्थ को वाइसराय के रूप में पहचानना कठिन था। उसे देखकर लगता था जैसे वह चोर डाकुओं से लुटा हुआ और बहुत मार खाया हुआ मुसाफिर हो। कांट आल्होर के साथ फ्रांसिस द साँज, आर्क बिशप, प्रिमज दौ मान्युअल, मिगेल द आल्मेदा, जैसे शहर के अनेक पादरी और उमराव वहाँ पर एकत्र हुए थे। भयत्रस्त उन सभी अधिकारियों एवं वरिष्ठ लोगों ने मशालें जला लीं। बगल की अँधेरी सीढ़ियों से मशाल के सहारे नीचे उतरे। उस तलघर में सेंट जेवियर का शव रखा गया था। वहाँ के पत्थर के चबूतरे से एक बड़ी पेटी बाहर निकाली गयी। सेंट जेवियर का शव एकदम सुरक्षित था। इसे भी एक चमत्कार माना जा रहा था। सभी ईसाई सेंट जेवियर के नाम का जाप करने लगे। वे सभी रो रोकर कहने लगे-“सम्भाजी की आफत से हमें मुक्त करो।” उस महापुरुष के दर्शन-से वाइसराय भी चकित हो गया था। मोमबत्ती के पिघलते मोम की तरह वाइसराय के आँसू उसके लाल कपोलों पर लगातार गिर रहे थे। उसने सेंट जेवियर के सामने पूर्णतया समर्पण कर दिया। भारत में पुर्तगाली शासन के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। उस प्रार्थना के साथ एक आदेशपत्र भी सेंट जेवियर के पैरों के पास रख दिया। वह पुर्तगाल के राजा द्वारा वाइसराय के रूप में नियुक्त होने का असली दस्तावेज था। कांट की आँखों से धारासार अश्रुपात हो रहा था। उसने अपने हाथ की स्वर्ण खड्ग, अपना मुकुट, राजदण्ड जैसी सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ और राजचिह्न सेंट जेवियर के पैरों के पास रख दिया। रोते हुए उसने कहा- "फादर जेवियर, आज से मैं यहाँ का गवर्नर नहीं आपका गुलाम हूँ। अपना हिन्दुस्तान का राज्य हम आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। हे दया सागर, हे महामानव ! हमारी रक्षा करनी है या नहीं ? इसका निर्णय अब आप ही करें।" वाइसराय, सारे पादरी और प्रजाजन कई दिनों तक उसी तरह प्रार्थना करते रहे। वहीं पर सोना और जो कुछ मिल जाये भोजन वहीं पर होता रहा। 486 .. सम्भाजी