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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 793 में से

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पृष्ठ 489

एक दिन वाइसराय ने अपने सचिव से कहा, "बन्दीखाने के दरवाजे खोल दो। मराठों के उस वकील येसाजी गम्भीरराव को मुक्त कर दो। उसे सम्भाजी के पास भेज दो। सम्भाजी को सन्देश भेजो कि 'सन्धि की शर्तों को आप स्वयं निश्चित करें, जैसा चाहें मसौदा तैयार कर लें। हम उस पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं। परन्तु हमें इस विपत्ति से छुटकारा देने की कृपा करें। अब हमें और अधिक न सताएँ'।" गोवा पर शम्भू महाराज का दबाव बढ़ता जा रहा था। माष्टी और बारदेश पर मराठों का अधिकार हो गया था। इसके साथ आग्वाद, रोशमाग़ोश, शापूरा जैसे फिरंगियों के छोटे मोटे किले भी मराठों के अधिकार में आ गये थे। मडगाँव में मराठों की एक हजार की थल सेना प्रवेश कर गयी थी। सांमिगेल और सांत क्रिस्टोहांव आदि सभी किलों पर आक्रमण हो रहे थे। गोवा की चर्चों में अब मोमबत्तियों की भी कमी होने लगी थी। वाइसराय आने वाले एक एक दिन को गिन गिन कर काट रहा था। किसी प्रकार से इस विपत्ति से मुक्त होने के लिए वह छटपटा रहा था। फिरंगियों के वकील बार बार आकर अपने लम्बे हाथों से शम्भू महाराज को सलाम कर रहे थे। किन्तु महाराज किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं थे। बाईस दिन बीत चुके थे। फिरंगियों की कमर टूट चुकी थी। सेंट जेवियर चर्च में बैठे बैठे वाइसराय का दम घुटने लगा था। उसकी पसलियों का घाव अब कुछ कुछ भर गया था। परेशान होकर कांट द आल्होर ने अपने राजा को आखिरी सन्देश भेजा, "प्रलय की स्थिति बन गयी है। हमारा इससे उबर पाना असम्भव है। तोपों को चलाने वाले बहादुर सैनिक बच नहीं पाये और गोला बारूद भी लगभग समाप्त हो चुका है। जिस प्रकार टूटा हुआ जहाज पानी में गोते लगाता है, उसी तरह फिरंगीराज हिन्दुस्तान में अपनी अन्तिम साँसें गिन रहा है।" एक दिन चमत्कार हुआ। सबेरे सबेरे चर्च में समाचार आया कि रात में मराठों ने अपना मोर्चा उठा लिया। किसी को बिना कोई हानि पहुँचाए वे अपनी फौज के साथ एकाएक चले गये। यह समाचार सुनते ही सभी लोग सेंट जेवियर के चरणों में अपना माथा झुकाने लगे। आनन्दातिरेक से सभी फिरंगी नाचने लगे। फिर भी फिरंगियों के मन में मराठों का डर बना हुआ था। 10 जनवरी, 1684 को गोवा राज्य सलाहकार मंडल की बैठक बुलाई गयी। गोवा पर मराठों के आक्रमण की सम्भावना से उन्होंने अपनी राजधानी को मार्मा गोवा में स्थानान्तरित कर दिया। शम्भू महाराज को मिला हुआ समाचार सच था। शहजादा मुअज्जम एक लाख की फौज लेकर रामदरा घाट पार करते हुए आगे बढ़ रहा था। फौज गोवा के सम्भाजी :: 487

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