छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजानबूझकर मुअज्जम को टाल रहा था। औरंगजेब द्वारा सूरत से भेजी गयी रसद सामग्री को मराठों ने पहले ही जगह-जगह पर लूट लिया था। बची खुची जहाजों पर पुर्तगालियों के क़ब्ज़ा कर लिया। किसी अनुशासित व्यवस्था के न होने से मुअज्जम को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा था। पिता औरंगजेब द्वारा भेजी गयी थोड़ी-बहुत रसद उसे मिली, लेकिन वह अधिक दिन टिकने वाली नहीं थी। चालीस हजार घोड़े, साठ हजार पैदल, तीन हजार ऊँट और उन्नीस सौ हाथियों की सेना थी। इतनी बड़ी संख्या की भोजन व्यवस्था सरल नहीं थी। अन्त में वही हुआ जो होना था। शहजादे की फौज को भोजन की कमी पड़ने लगी। प्रतिशोध की भावना से दक्षिण कोंकण के एक बड़े हिस्से को उसने जला दिया था। उसके दुष्परिणाम उसके सामने आने लगे। धन देने पर भी अनाज और चारे का मिलना असम्भव हो गया। 15 फरवरी, 1984 को शहजादे ने वापस लौटने का निर्णय ले लिया। गोवा में मुगलों के नौसैन्य दल स्थापित करने, दक्षिण कोंकण और रायगढ़ जीतने और अन्त में सम्भाजी को पकड़ने जैसे अनेक ख्वाब शहजादे ने देखे थे, ये सभी भव्य मन्सूबे थे। उसकी फौज ने पुनः रामदरा के रास्ते पर चलना शुरू किया। शहजादे का थका भूखा हाथी आगे बढ़ा। शहजादे ने सामने की ओर देखा। सामने रामदरा का प्रचंड घाट दिखाई दे रहा था। भूखी फौज को साथ लेकर उसे पार करना था।
तीन
शहाबुद्दीनखान की काली छाया रायगढ़ के परिसर से बहुत दूर ही नाचकर चली गयी थी। गोवा आक्रमण से महाराज राजधानी वापस आ गए थे। एक बार भोजन करते समय महारानी ने कहा, "महाराज, गोवा भी हाथ आ गया होता तो कैसा रहता ?'' "महारानी, हमने बहुत प्रयत्न किया। सफलता हमारे बहुत समीप आ गयी थी। किन्तु मुगलों के एक लाख जानवर और आदमी रामदरा का घाट उतरने लगे। हमें मजबूर होकर पीछे हटना पड़ा।" "यह कोई महाराज की पराजय नहीं है।" "निश्चय ही नहीं है।" शम्भूराजा ने साभिमान कहा, "उस पुर्तगाली ने सम्भाजी :: 501