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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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महारानी येसूबाई कुछ समय तक शान्त रहीं। फिर अपनी चिन्ता को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, "महाराज ! ये लोग आपका विरोध करने के लिए मुगलों के गुलाम नहीं बन रहे हैं। ये तो पहले से ही गद्दार हैं।" "यह बात सच है। मुगलों के समीप जाते ही इनके दिलों में हलचल शुरू हो जाती है। जागीर और धन के लोभियों से ही यह सारा खेल चल रहा है। सुपा के देशपांडे और मैसूर के जगदाले इसी लोभ में वहाँ चले गये—" "येसू, इसका एक ही रामबाण उपाय है, उस कपटी औरंगजेब का जल्द से जल्द खात्मा।" महाराज ने कहा। "महाराज, बाढ़ के पानी को घर के भीतर से शीघ्रातिशीघ्र निकाल देना चाहिए नहीं तो उसमें से सड़ांध की दुर्गन्ध आने लगती है।" "महारानी, औरंगजेब से कड़ा सामना करने के अतिरिक्त हमने पिछले अनेक वर्षों में कोई और कार्य किया है ?" महाराज कुछ दुखी स्वर में बोले, "येसू, यह सामान्य बाढ़ नहीं है। मुगलों के पाँच लाख मनुष्यों और चार लाख जानवरों का यह महासागर महाराष्ट्र पर उमड़ आया है। उसमें कुछ सूखी लकड़ियाँ भी तैर रही हैं। किन्तु आप रंचमात्र भी चिन्ता न करें। मेरी उम्र क्या है? छब्बीस वर्ष और औरंगजेब छियासठ वर्ष का। ईश्वर ने अगर इस देह को सलामत रखा तो देखना। एक न एक दिन जैसे कोई मदारी अपने प्रिय भालू को रस्मी में बाँधकर बाजार मे घुमाता है उसी तरह उस पापी औरंगजेब के पैरों मे बेड़ियाँ डालकर दक्षिण के पठारों पर हमें नचाना है।" पूना के आसपास मुगलों की घुसपैठ बढ़ती जा रही थी। अपने लोगों और किलों की रक्षा के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे थे। घाटियों, घाटों, मैदानों आदि सभी जगहों पर मुगल-मराठा युद्ध हो रहा था। शम्भू महाराज ने अपनी सेना में वृद्धि की थी। गद्दार मराठों पर कड़ी नजर रखने पर भी उनकी संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही थी। कुछ मराठे अपनी निष्ठा का केवल दिखावा करते थे। गद्दारों के स्वागत के लिए औरंगजेब रेशमी वस्त्रों की गाँठ लेकर बैठा था। एक दिन राजा के पास खंडो बल्लाल आये। उन्होंने सिर नीचा करके कहा, "महाराज, जिन मराठा सरदारों को निष्ठावान मानकर उनका गौरव करते रहे हैं वे गद्दार निकले। कारी गाँव के शिवाजी जेधे ने अहमदनगर जाकर बादशाह की गुलामी कबूल कर ली। "शिवाजी जेधे ने उस ओर जाते-जाते अपने ही देश की बर्बादी की है। उसके साथ ही उसका छोटा भाई सर्जेराव भी मुगलो की सेवा में जाने वाला था। लेकिन उसी समय राजा ने विचित्र गढ़ के सन्ताजी निंबालकर को उसके पास भेज सम्भाजी 503