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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 793 में से

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पृष्ठ 506

दिया। विचार-विमर्श कर उसके हृदय परिवर्तन के लिए कहा। गद्दारों के इस बर्ताव से शम्भूमहाराजा कुछ दिनों तक बहुत चिड़चिड़े हो गये थे। उनके स्वभाव की सरलता नष्ट हो गयी थी सारे शरीर में कठोरता और कड़ुआहट भर आयी थी। महारानी येसूबाई ने कहा, "महाराज, थोड़ा धैर्य धारण करें।" "येसू अगर कोई छोटा बच्चा हठ करने लगे तो उसके मुँह में चुटकी भर शक्कर डालकर उसे बहलाया जा सकता है। किन्तु यदि बड़े लोग कृतघ्नतापूर्वक विश्वासघात करने लगें तो उनका क्या किया जाए?" शम्भूराजा हर दिशा में चिन्तित थे। उन्होंने खंडो बल्लाल, रामचन्द्र पन्त अमात्य और कवि कलश की सहायता से मराठा सरदारों और वतनदारों की एक सूची तैयार की। औरंगजेब से मिलने वाले सरदारों मनाना शुरू किया। कुछ लोगों को स्तुतिपरक पत्र भेजे गये। बहुतों की प्रशंसा की गयी। कवि कलश और खंडो बल्लाल बहुतों से स्वयं जाकर मिले। इससे जेधे जैसे लोग जो शत्रु से जा मिले थे उन्हें भी अपनी मातृभूमि की याद आने लगी। यह सूचना मिलते ही राजा ने खंडो बल्लाल को अपने पास बुलाया और तत्काल पत्र लिखवाया— "पहले आपने ही गद्दारी की। हमारे राज्य में वतनदार के रूप में आपने ईमानदारी का व्यवहार नहीं किया। इतने दिनों हमारे अन्न पर पलकर भी नमकहरामी की। आपकी बुद्धि इस तरह भ्रष्ट हुई कि चार दिन के मेहमान मुगलों से जा मिले। मुगलों ने भी आपका आदर नहीं किया। इसलिए अब आप फिर मुड़कर देख रहे हैं। एकनिष्ठता, ईमानदारी जैसे शब्दों में पवित्रता की सुगन्ध होती है, उसका भी कुछ ध्यान रखिये, किसी बदचलन स्त्री की भाँति एक ही समय दस देहलीजें लाँघने की बुरी आदत छोड़ दीजिये।" चार वर्ष बीत चुके थे। शम्भूमहाराज और औरंगजेब का युद्ध समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था। एक दोपहर की शान्त बेला में शम्भूमहाराज ने महारानी येसूबाई से कहा— "येसू न औरंगजेब की फतह हो रही है और न हमें ही विजयश्री प्राप्त हो रही है। इस तरह यह युद्ध कब तक चलता रहेगा? कभी कभी मुझे लगता है कि यह कलियुग ही हम दोनों के साथ खिलवाड़ कर रहा है।" कहते कहते महाराज रुक गये। पिछले संघर्ष के, कुछ क्षण उन्हें स्मरण होने लगे। जंजीरा की खाड़ी में अथक परिश्रम से बनाया गया वह पुल, जो पूर्ण होने के समीप पहुँच गया था, उनकी आँखों के सामने खड़ा हो गया। कल्याण में मुगल फौज के उत्पात से जंजीरे की योजना दर किनार हो गयी थी। गोवा की चर्च के कंगूरे पर भगवा झंडा फहराने का समय एकदम समीप आ गया था, किन्तु उसी 504 सम्भाजी

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