भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 507, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 507

समय मुअज्जम की एक लाख की फौज रामदरा उतरने लगी। उन सभी दिनों का स्मरण महाराज को होने लगा। उन्होंने कहा-- ‘‘येसूरानी जब हम गोवा से जल्दबाजी में वापस आ रहे थे और सावन्तवाड़ी के तालाब में अपनी विशाल फौज का प्रतिबिम्ब देखा तो हमारी आँखें भर आयी थीं। वह नियति हमारे साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों करती है? यह तो ऐसा हो रहा है कि हम शिखर को पदाक्रान्त करने के लिए शिखर तक दौड़ लगाएँ और वहाँ पहुँचने पर शिखर ही ढहकर गिर जाए। यह तो ऐसे ही हो रहा है जैसे गहचे में खेल रहे बच्चे की गेंद छुपाकर कोई दुष्ट उसे परेशान करे। यह कलियुग हमारे पास तक पहुँचे यश को बार बार टुकड़े टुकड़े कर दे रहा है। यह मेरे साथ ऐसा विचित्र खेल क्यों खेल रहा है?’’ चार शहजादा मुअज्जम की फौज रामदरा का दुर्गम घाट चढ़ रही थी। बेगुर्ला के इलाके में शाही फौज की दशा पहले ही बहुत दयनीय हो चुकी थी। अभी भी आगे तीन मील की सँकरे रास्ते वाली खड़ी चढ़ाई थी। रास्ते के दोनों ओर कँटीली झाड़ियों के घने जंगल थे। दक्षिण कोंकण की शुष्क हवा मुगल सिपाहियों और जानवरों को अनुकूल नहीं पड़ रही थी। कई जानवर बीमार होकर मृत्यु के शिकार बने। तीन-चार महीनों में अनाज का भंडार समाप्त हो चुका था। शम्भूमहाराज यद्यपि स्वयं रायगढ़ चले गये थे किन्तु सेना की अनेक टुकड़ियाँ उन्होंने पीछे नियुक्त कर रखी थीं। घने जंगलों में छुपकर बैठे ये मराठा वीर शान्त नहीं बैठे थे। वे अवसर देखकर मुगल सेना पर तूफान की तरह टूट पड़ते थे और उन्हें भारी क्षति पहुँचाकर जंगलों में गायब हो जाते थे। अब तक मुगल सेना का बहुत नुकसान हो चुका था। अन्ततः अनेक रोगों से ग्रस्त होकर मनुष्य और जानवर बड़ी संख्या में मरने लगे तब शहजादे की विवश होकर घाट से लौट जाने का निर्णय लेना पड़ा। उस प्रतिकूल जलवायु वाले क्षेत्र में मुगल सेना युद्ध करने के लिए तैयार न थी। मुगल सेना का मनोबल टूट चुका था। परिस्थितियों के थपेड़ों से जूझता शहजादा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सम्भाजी :: 505