छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 508, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहा था। उसके चेहरे पर उदासी छा गयी थी। रामदरा घाट की चढ़ाई मुगल सेना के लिए वस्तुतः श्मशान घाट की ही यात्रा थी। रुग्ण होने के कारण अनेक हाथी, ऊँट और घोड़े घाट पर चढ़ते-चढ़ते गिरकर दम तोड़ रहे थे। ऊँटों को केवल रेगिस्तानी रेत और उत्तर की मुलायम मिट्टी की ही आदत थी। यहाँ के पथरीले रास्तों और पहाड़ों में वे हैरान हो गये थे। अनेक ऊँटों ने इस चढ़ाई पर ही अपने प्राण छोड़ दिये। अनेक हाथियों और घोड़ों के कंकाल वहीं पर बिखर गये। जानवरों की लाशों से उठने वाली दुर्गन्ध से दूसरे लोग और पशु बीमार पड़ने लगे। उन्हें उल्टियाँ आने लगीं। उन्हें अनेक प्रकार की बीमारियाँ होने लगीं। इसी बीच मराठों की सेनाएँ घने जंगलों से निकलकर उन पर तूफानी आक्रमण करती थीं और उनकी कमर तोड़कर जंगलों में छिप जाती थीं। इस दुर्दैवी घाट को पार करने में मुगल सेना को आठ दिन लग गये। सेना का बुरा हाल था। चालीस हजार सैनिकों में केवल नौ-दस हजार सैनिक ही बचे थे। जो बचे थे उन्हें सैनिक तो क्या आदमी कहना भी मुश्किल था। वे तो मात्र चलती- फिरती लाश थे। जिनके घोड़े मर गये थे उनके पास नया घोड़ा खरीदने के लिए पैसा नहीं था जिनके पास पैसे थे उन्हें नये घोड़े मिल नहीं रहे थे। लोग इतने कमजोर हो गये थे कि किसी प्रकार साँस ले रहे थे। अपने पुत्र की दुर्दशा का समाचार बादशाह को मिला। उसने तत्काल शहजादे की फौज की सहायता के पच्चीस हजार अशर्फियाँ, पाँच ऊँट, पच्चीस खच्चरों और सौ घोड़े पर लदी रसद और वस्त्र भेजा। किन्तु इससे कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ा। शहजादे के नये कपड़े भी काले पड़ गये थे। व्याधियों की काली छाया उसके शरीर पर भी दिखाई देने लगी थी। एक मरियल घोड़े पर बैठा शहजादा मुअज्जम बादशाह के तम्बू के पास पहुँच गया। जनानखाने की औरतें उसकी ओर करुण भाव से देखने लगीं। उसका शरीर जर्जर हो गया था। एक भिखारी की अवस्था में शहजादे को देखकर अनेक लोगों की आँखों में आँसू आ गये। वजीर असदखान मुअज्जम के सामने आया। रिश्ते में शहजादा उसके पोते की तरह था। अपने तम्बू में ले जाकर उसने मुअज्जम को फलाहार कराया। किन्तु मुअज्जम का शरीर इतना रुग्ण था कि मीठी-चीजें भी उसे जहर की तरह कड़वी लग रही थीं। मुअज्जम को धीरज बँधाते हुए असदखान उसे बादशाह के भव्य तम्बू में लेकर गया। औरंगजेब मुअज्जम को रुष्ट निगाह से देख रहा था। अपने बायें हाथ से सफेद दाढ़ी को सहलाते हुए और दूसरे हाथ से जयमाला को छाती से छुआते हुए उसने मुअज्जम की ओर देखा। 'इतनी दुर्दशा होने पर मेरा बाप कुछ पूछ नहीं रहा 506 : सम्भाजी