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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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है' यह सोचकर मुअज्जम को बहुत बुरा लगा। जोर से हाँफते हुए उसने रुआँसी आवाज में कहा, "अब्बाजान बहुत तकलीफ हुई। वहाँ की खराब हवा..." "बेटे तकलीफ तो होगी ही। निश्चित किये गये रास्ते को बदल देने से खराब हालत तो होंगे ही।" अपने पिता के व्यंग्य को शहजादे ने पहचान लिया। उसने बड़ी मासूमियत से कहा, "आपको कोई गलतफहमी..." "गलतफहती कैसी? हमारा पहला मकसद क्या था? पूना की ओर से शहाबुद्दीन कोंकण में पहुँच रहा था और आपको राजापुर पोलादपुर से होते हुए महाड़ पहुँचना था। वहाँ पर आप और शहाबुद्दीन को इकट्ठा होकर रायगढ़ पर आक्रमण करना था। यही निश्चित किया गया था।" "अब्बाजान पर्याप्त रसद न मिल पाने से सेना में अकाल पड़ गया। उस पुर्तगाली कांटसाहब ने हमें फँसाया।" "मुअज्जम, इन सारी बातों को यहाँ पर बन्द करो।" बादशाह गुर्राया- "खाली इतना बता दो कि कोंकण के बताये गये रास्ते को छोड़कर आपके पाँव रामदरा की ओर कैसे मुड़ गये?" "लेकिन जहाँपनाह...?" "आप अन्धे तो नहीं थे। फिर आपकी आँखों-पट्टी किसने बाँध रखी थी ? कौन? कौन था वह जादूगर? रायगढ़ पर रहने वाला? सम्भा?" औरंगजेब का स्पष्ट प्रश्न सुनकर शहजादा निराश हो गया। उसका मन हुआ कि बादशाह का पैर पकड़कर वह फूट फूट कर रोये। परन्तु इस समय उसके शरीर में उतनी भी शक्ति नहीं बची थी। रुआँसी आवाज में वह बोला, "अब्बाजान रहम कीजिए। हमारी जिन्दगी की यह दुर्दशा देखकर भी ऐसा जानलेवा मजाक न करें।" "बेटे जहाँ हवा भी नहीं पहुँचती वहाँ भी मेरे जासूस पहुँच जाते हैं। यह बात शहजादा होने के नाते आपको अवश्य मालूम होगी।" औरंगजेब ने उदासभाव से कहा, "वहाँ रहते हुए उस सम्भा के जासूस आपको दो-बार मिले थे।" "कबूल अब्बाजान। राजनीति में अपने दुश्मन को नष्ट करने के लिए हर कोई ऐसे खेल खेलता है बात इतनी-सी है कि ऐसे किसी लालच का शिकार आपका शहजादा नहीं हुआ।" "क्या पता!" "ऐसा कैसे हो सकता है अब्बाजान?" मुअज्जम की मीठी आवाज सन्तप्त हो गयी। उसने रुष्ट स्वर में कहा, "यदि सम्भा के दूतों का हमारे डेरे में आना आपको दिख जाता है तो जब पन्द्रह दिन तक हम रामदरा घाट चढ़ रहे थे, सम्भा के सैनिक हमारे ऊपर आक्रमण कर रहे थे, हमारी चमड़ी उधेड़ रहे थे, अपने बाणों से सम्भाजी :. 507